Thursday, 31 December 2015

अंधकार भी ।

यह अभी बेबूझ
अंधकार भी
रहस्यमय सत्य
रहते उसी के
उपजता हैं प्रकाश
नहीं प्रश्न
मिलन हो दोनों का
विपरीत सत्ता के स्वामी
अपने वर्चस्व के धनी
हार जीत का क्रम निरंतर
 समय देता पहचान
कि प्रकट करे
अपना विराट स्वरूप
ओर यह प्रकृति
स्थिर भाव देखती जाती
दोनों की औकात
यह ठीक
कि अंधकार देता विश्रान्ति
अचेतन की गहरी तन्द्रा
एक नव चेतन जिन्दगी
जीने के निमित्त
साबित होता परहित मकसद
अंधकार कहां हैं भार
यह हैं चेतना की पृष्ठभूमि
जहां विकसता हैं
तेजस्विता भरा नवल प्रकाश
एक झीना विरल पर्दा
रजनी ओढती जाती
कि रश्मिया का गुम्फन
ले सके ओजस्विता का तेज
ओर देखती जाती प्रकृति
अदृश्य रंगो की रश्मिया
लेती हुई आकार
यह अंधकार दुख नही
सुख का पनपता आधार स्तंभ
जिसमें अब ले रहा
नव वर्ष भी
अपने काल का सघन विस्तार
जहां हमारे सपने
करेगे जीवन की अनंत
मनोकामनाओ का साक्षात्कार
यह अंधकार भी
जीवन की गति का
पहिया हैं
नमन नव वर्ष तुम्हें
विश्रान्ति काल से सुख
लिए आते हो।
छगन लाल गर्ग।





नमन तुझे ।

विख्यात शिल्पी
स्वीकारो ना नमन मेरा
तेजस्विता समाती नहीं
चित मेरे
शब्दों का रहस्य
नहीं झेल पाता अर्थ
गुम्फित भावों का जाल
चक्रव्यूह बना फसाता मुझे
स्वीकारो ना नमन मेरा
खूब खेलते हो खूबसूरती से
भावों की क्रीड़ाऐ पाती हैं विस्तार
परमाणु से शरीर मे
फूँक देते हो प्राण
बिम्ब उतारते जाते सशरीर चित मेरे
कि नहीं हो पाता चेतन
डूबता हूँ अनंत के तल
निर्मोही बने निहारो ना मुझे
स्वीकारो ना नमन मेरा
भूतल घना निर्मम
अंगडाई लेती
घेरती तन्हाईयो मे
पिघलते प्राण मे
व्यथा कर जाते हो लघु
सौन्दर्य के छाये मे
सुला देते हो भाव मेरे
नहीं पाता फिर चेतना
अचेतन का राग बने तुम
आ जाते हो
स्वीकारो ना नमन मेरा
रहस्यमय जीवन के स्वामी
किस पाठ का स्तवन करते
शैली तुम्हारी आम नहीं
पर जीवन भी क्या
आम नहीं
किस माटी के गढे हो शिल्पी
स्थूल तुम्हारा तन भी नहीं
मन मर्म मानव होकर
जान ना पाऊ मेरे शिल्पी
कैसे जीवन मानव बनकर
जी लेते अब रहस्य यही
बार बार मिटने का शरणो मे
भाव गहराता अचेतन घना
स्वीकारो ना नमन मेरा
हाँ यह सत्य
नासमझ घना हूँ
राहे अलौकिक जहाँ चलते हो
मिट मिट अस्तित्व
चलना होता हैं
कडवे सारे घूट विष सम
जान बूझ कर पीने पडते हैं
तब कही तेजस्विता तुम्हारी
हम तक आकर
रश्मिया देती हैं
बडे त्यागी तपस्वी से तुम
मेरे शिल्पी
नमन तुझे ।
छगन लाल गर्ग।




समर्पित हूँ नव वर्ष ।

प्रकृति का गढा
प्राणों का स्पंदन चेतन
अनुभूति से संचलन
हर पल बढ़ता निरंतर
नव वर्ष समर्पण तुझमे
प्रति क्षण होता रहता
नव आँकाक्षाओ भरा
जीवन की क्षण भंगूरता बीच
नव सृजन का राग गाता
स्वागत करता हूँ तेरा
विगत का कडवा धुऑ
प्राणों का रस निछोड चुका
कोलाहल भरा जीवन
नहीं पाया कहीं विश्रान्ति
जीवन का रण
कभी नहीं जीता
नित पराजय झेले
नहीं हो सका अंश तेरा
स्वागत नव वर्ष
नव पल्लवित कपोले
नहीं पाती प्रभात की रश्मिया
चढती जाती भेट
सभ्यता के अतिसार मे
होती जीती अजीब हादसो
की शिकार
कि नहीं पाती यौवन
ओर संयोग मिलता जीवन
अरमानो की बलि देते
संताप जीवन मिलने का
झेलती पाती बूढ़ापा
असमय बढती मौत की ओर
नव सृजन का स्वप्न भी
आधा अधूरा जीती
कुम्लाहती हैं जिन्दगिया
प्रकृति थिर कहां
व्यतीत होती जाती
सृजन निमित्त
यह जीवन चक्रव्यूह बना
अस्तित्व मिटाने निमित्त
सार केवल मिट जाना
विलीनता ही उदय
यही संतुलन प्रकृति का
दंभ हमारा दावों तक
यही हैं क्षण का सार
विवश हारे जर्जर बिम्ब हम
समय की करवट से निर्मित
प्रकृति चेतन
देती रहती बार बार
नवाकार कभी कुसुम
कभी काँटे
छाया ओर धूप का खेल
चलता हैं ससीम जीवन
प्राणों की ऊर्जा
देती रहती चेतनता
विवेक मय भावों की
ओर हम तोलते रहते अनंत
रहस्यमय गुम्फन बीच
फैलाते जाते ज्ञान का कोहरा
धून्ध खायी रश्मिया
नहीं टटोल सकी
क्षण का रहस्य
आते जाते रहे नव वर्ष
अज्ञात घेरता रहा जिन्दगी
अब यह आता हैं फिर
नव वर्ष
फिर नमित हो करता स्वागत
एक रस्म की तरह
नहीं पालता जोखिम
आँकाक्षाओ की
पर समर्पित होने से पहले
आकाओ से गुहार
करना विवशता हमारी
न हो अकाल मृत्यु युवाओं की
घटे थोक मे होते हादसे
युवा पा सके जीने को काम
आओ नव वर्ष
ले चलो वहीं
जहां स्नेह का दरिया
प्राणों का राग बने
कोलाहल विश्रान्ति पाकर
समरस वीणा के स्वर बने
समर्पित हूँ नव वर्ष ।
छगन लाल गर्ग।





Wednesday, 30 December 2015

बीत गया।

रस भरा अतीत
स्मृति नहीं छोडता
आता रहता
झलक अदृश्य देता
विभ्रान्ति का गहन झौका
छलता रहता संचित सुख
कहां रहे कदम
कि अनुकरण हो
घने झंझावत मध्य
स्नेहिल सुकुमार लावण्य
शिकार हुआ हादसे का
नहीं पाता संकेत कहीं
किसे सुनाऊ व्यथा
व्याधि देती वर्तमान को
नव नीड का क्या करू
अकेलेपन का सार
नीड नहीं संवेदना चाहता
नहीं यह नही हैं
स्वार्थ जीती इन्सानियत
खो चुकी यह राग
वीणा तार झृकृत नहीं
असंतुलित हुए
नेह स्वर रहा कहां
बीत गया।
छगन लाल गर्ग।

तपती अवनी।

आँकाक्षाऐ गहरी हुई
चेतना नहीं हैं स्थिर
नहीं समा पाती अस्तित्व
सपनों की दुनिया
बिखरे से टूटे से
जीना होता यह जीवन
नहीं पाता
 ठावस भरी ठौर
हर पल
एक अधूरापन
महसूसता
जीता हूँ जिन्दगी तुझे
घर ओर बाहर
नहीं पाता अंतर
कि फर्क आये रफ्तार
बाहर से ज्यादा
ज्वलंत घर का कोलाहल
नित जिन्दगी
माँगती कीमत जीने की
परिवार मे रहने की
ओर बाहर
मिलती जाती
भीतर की मार
अफसरों की डाँट
ओर कारण बताओ नोटिस
अजीब तपन हैं
जिन्दगी तेरी
न घर न बाहर
कहीं भी स्वागत तेरा
लगता है
बढ़ती हैं नित
तपन अवनी की।
छगन लाल गर्ग।

Tuesday, 29 December 2015

अचेतन काल।

घनत्व घीरा मानव
विशाल चेतना का धनी
विवेक की अतिशयता जाल
घीरता जाता प्रतिपल
विस्तृत अवबोध
चिन्तन करता सिद्धांत
अवधारणाओ का निचोड देता
गूथता जाता विचारों की कड़ी
कि अहमियत बने
विश्लेषण किये विचारों का संपूट
दे अधिक गुम्फन जीवन को
ओर लगे जीवन अधिक विकट
जटिलतम सुलझते पाया पैनापन
नहीं आत्मसात स्वयं
विचार ओर जीवन
केवल समीक्षा तर्क का ताना बाना
नहीं होता जीवन संसर्ग
गहरा अंतराल विचार व जीवन
ओर चिन्तक भ्रमित स्वयं भी
पर मापता जाता असीम विचार
तारतम्य हीन
ओर यह जीवन बना देता
अधिक विषम ओर जटिल
नहीं बडा सरल हैं जीवन
अगर हम जीने दे सरलता
चेतन हैं  जीना जीवन
यथार्थ अनुभव ही सत्य
अचेतन विचार
भ्रमित करते मानव
कल्पनाओ के गगन से
चेतन धरातल जीना ही
जीवन हैं
छोडना होगा अगम्य
अचेतन काल।
छगन लाल गर्ग।

आ जाते हो।

बार बार प्रिय
स्मृति पटल पर
मुस्कान रसभरी
मधु महकती चितवन देते
आ जाते हो
करूण हृदय मे
बिसरी यादें
व्यथा भार बढ़ाती
रश्मि पाकर तुम्हारी
स्फुरण फिर फिर
मधु मृदुल मादक बन
लघु भार हृदय का
कर जाते हो
राग विराग अब
जर्जर तन मन
विकल हुआ नित
विरह जलन का
जीवन सार बन जाता
देह घुलने का अवसर आते
आ जाते हो
क्षुब्ध हृदय अब
हारा जीवन
बिछुड रही
चेतन क्षणिकाऐ
काल कणिकाये
घेरती जाती
रस रागिनी धारा
सुखती जाती
ऐसे मे करूण किरणों की
स्मृति लिए तुम
आ जाते हो।
छगन लाल गर्ग।



Monday, 28 December 2015

देता हूँ ।

देता हूँ आवाज
हो जाता हूँ नीरव घना
मन चेतना दोनों से
भीतर की रोशनी
हो जाती विलुप्त
बाहर भीतर का अंधकार
सम काल बना बहता
अंधकार साम्राज्य
मेरा अपना हो जाता
अचेतन मे आते तुम
रोशनी लिए
आभा का आकार बने
देखता हूँ तुम्हें
देता हूँ आवाज
नहीं होती गुन्जार कंठ से
रूड़घ जाता हैं गला
सूजन पाता हूँ कंठ
स्फूट स्वर नहीं बनता ध्वनि
उतरी सी जाती
भीतर ही भीतर
तुम्हारी आभामय आकृति
घेरती हो हृदय मेरा
विरह गाथा
कहता हूँ भीगी वेदना
देता हूँ आवाज
नहीं पाता कोई प्रत्युतर
प्राण का रूदन
हो जाता है सघन
शब्द नहीं बनते बिम्ब
पर यह अमूक स्वर
तुम्हारा ओर मेरा नहीं
हम दोनों का
जहां स्वर नही
भाव देते हैं अर्थ
ओर यह विराग काल
बन जाता
अमूल्य धरोहर हम दोनों का
मत सुनो
केवल दे दो संकेत
अहसास का
कि प्रेम
प्रार्थना बन जाय हमारा।
छगन लाल गर्ग।

आते हो।

आते हो
स्मृति पथ नित
स्नेह राग प्रतिछाया
बने तुम
दे जाते हो
सूने हृदय को
स्पंदन तंरगित वीणा स्वर
बज उठते नुपुर
रग रग मे फिर फिर
झंकार रस भरी घनी
भर देते हो
संगीत लय भरा स्वर
उभर उभर कंठस्थ चला
पाना चाहे राग वहीं
संयोग क्षणो का
अमन्द रागमय रस
संतुष्टि मे पिया नित नित
अधरो से रस का प्याला
होले होले
विरल गति मय
फिर भर देते हो
अलक तुम्हारे
घने मेघ बने
मलयज गंध का
सुरभित झौका
हृदय तल मे फिर
नासिका मग से
आता जाता
बन गया प्रियतम
श्वास अब मेरी
नित भरते हो
प्रियतम मेरे
दूर कहां हो
रमते ख्वाब बन
विराग काल को
विस्मृत नयनो से
पीते घने हो
अमन्द हृदय मे
चेतन भरते हो
नही नहीं रे
प्रियतम मेरे
चाहू मिलन अब
फिर चेतन मे
रहते रहते
अचेतन मन से
चल तो न दोगे
ठीक यही हैं
मितवा मेरे
चेतन अचेतन
मिल मिल जाते
स्मृति तुम्हारी
चित मे बसती
तृप्ति देती
स्मृति मे नित
रमते हो।
छगन लाल गर्ग।



Sunday, 27 December 2015

बीत रहा वर्ष ।

पगली जिन्दगी
संहाला कैसे अनुभव तूने फटा
बीत रहा वर्ष
देख ना जरा अंचल अपना
कितना आधी कितना भरा
भार लदा नहीं
संभाले रही क्या
वस्त्र तुम्हारा था जर्जर
फिर भी कुछ तो
संजोया होगा
दिखला दो ना वर्ष बीत रहा
अब फटा हैं वस्त्र तुम्हारा
अंचल दिखता रीता घना
क्या कुछ ज्यादा पा लिया क्या
जर्जर वस्त्र फटता रहा
जिन्दगी तडप खाती रही
वर्ष भर मंहगाई तले
ओर अधमरे  सपने
जीती रही बीत रहे वर्ष
यौवन का मतवालापन
सिमटता रहा जजबातो मे
सपने बिखर हवा हुए
ओर वर्ष कुण्ठित करता रहा
अब स्वागत हैं
नवल वर्ष तेरा
प्रभात लिए ही आना तुम
विगत का अंश मत लाना उषा
नव प्रभा बरसाना तुम
अन्यथा नहीं जी सकेगी जिन्दगी
फिर मत कहना कहा नहीं
सुन सको तो अभी सुनना
इसमें देरी मत करना तुम
नहीं दशा मे क्या होगा
यह समय नहीं पहले  कहता है
वक्त किसी का सगा नहीं
यह अनुभव हमारा कहता हैं
संक्रमण क्षण का अनुरोध
बीते रहे वर्ष
बोलता हैं
आओ असीम स्वागत हैं नव वर्ष
चेतनता लिए ही आना।
छगन लाल गर्ग।

खिचकते रिस्ते।

अपनत्व अंतिम पड़ाव
ढूँढता रहता अस्तित्व
कि कहीं स्नेह का कतरा
अवशेष मिल पाये अपनों से
कि होता रहे मन का कोना स्नेहिल
घनत्व अरमान नित देते अवरोध
नीजता लालायित संबंध
जहां स्वयं का मोह पालता सपने
अपने नीजी स्वार्थ के
नहीं हो पाता सामंजस्य
अपने रक्त संबधो बीच
भीतरी मनोमेल चढता जाता
मस्तिष्क ओर मन
ओर होने लगता
दिखावे का पाखण्ड
जहां रूटिन जीते रिस्ते
अपना अपना जीवन
जितने पास पास दिखते जाते
होते जाते भीतरी दूर उतने
एक लाचारी जीते हैं रिस्ते
नहीं रहा लगाव कोई
जो बन सके आलम्बन
सुख दुख पल झेलने
एक ऊपरी आवरण शब्द जीते
निभाने होते हैं रिस्ते
यह सीमा परम्परा तक
हृदय जगत हैं सूना सूना
गहरा अंतराल नहीं पाटता दूरिया
मतलब जीते मतलब निभते
आज के रिस्ते
लगता हैं निरंतर
खिचकते हैं रिस्ते।
छगन लाल गर्ग।




Saturday, 26 December 2015

सामर्थ्य मेरा।

अब अधिक महसूस होता
प्रकृति  सामर्थ्य
संभवतः जानने के बाद
सामर्थ्य मेरा
नकारता रहा हर तेरा रूप
अपनी सामर्थ्य की सीमा तक
इससे पहले भी
ओर जीता रहा लिए अवलम्ब
कृत्रिम संसाधनों का
पर आज
वहीं संसाधन होते जाते
नाकारा
नहीं दे पाते ऊर्जा भरा सामर्थ्य
भीतरी ऊर्जा की रिक्ततावस
ओर यह सर्द झोके
कर जाते प्रवेश
बंद कमरे के भीतर तक
बंद किया शरीर भी
आत्मसात हुआ जाता
तुमसे
अब हर सर्दी का पल
जीना होता
ठिठुरन भरा
प्रयासो का गणित
नहीं ले पाता हिसाब
विवशता मे उठाता जाता निगाहें
करता हूँ अवलोकन भी
पुनरावलोकन भी
ढूँढता हूँ छिद्र
जहां से सर्द हवाओं
प्रवेश होती मेरे भीतर
नही पाता सार
मात्र अहसास ठिठुरन
कि तुम हो
होना तुम्हारा साबित हुआ
बाहरी सूर्य रश्मिया
हो चुकी हैं तिरछी
लगता हैं घुली मिली हैं तुमसे
एक मौन समझौता
तुम दोनों का
केवल देते हो अहसास
अपने होने का
सर्द हवाओं
पहचानने लगा तुम्हें
महसूस करता हूँ तुम्हें
भीतर बहती हो
मेरी धड़कनो की तरह
स्वतः चेतना मयी
आया हूँ मिटाने तुम्हें
अलाव जलाये
बुझाने लगती हो आग
झपटो के बल
ओर पाता हूँ तुम दोनों के
बीच छिडता संग्राम
अधकच्चा प्रयास मेरा
नहीं दे पाता ठावस
कि ऊर्जा बटोरू
निकल आया हूँ
सूर्य की तिरछी किरणों बीच
आश्रय ढूँढता हूँ उष्मा का
अच्छा हैं
थोड़ा संतुष्ट हूँ
पर यह संतुष्टि
ठीक वैसी ही
जैसे ऑखो की काजल
सौन्दर्य देती
पर रोशनी नहीं
प्रकृति का यह रूप
नया कहां
हर बार का आना जाना
सर्दी के दिनों
नहीं शिकवा मेरा
कि क्यों हो तुम
शिकवा हैं जीवन से
कि तुम्हे जाने बिना
अहं जीता रहा होने का
वस्तुतः तुम भी तो
हो इसी प्रकृति का अंश
नहीं पृथक अस्तित्व
कि करते जाओ अहंकार
नीजता का।
छगन लाल गर्ग।



मेरे नेही।

मेरे नेही
मत स्वीकारो मुझे
मेरा होना ही
मूल बाधा मेरे नेह की
लिपट जाता हैं राग
द्वी अर्थ देता
कि रूक जाता हैं मिलन
ओर जीवन जलता
विरह की ताप
नेह धार हो जाती अवरुद्ध
दीवार बन जाता द्वेत
विलय हुआ भी
कहां हुआ एकरस
स्वीकार करो
यह नेह मिलन
 अधूरा अधूरा
काम भरा
नहीं हो पाता संतुष्ट
नहीं पाता संपूर्णता
जहां घेरती तल्लीनता
क्षण बनी
नहीं पाता आकार
ममत्व पात्र बने
नेह नहीं झेल पाता दुराव
मिट मिट जाता तन
यही लयबद्ध स्नेह का सच
यह नेह
हुआ चाहता घना विरल
अति सूक्षम
जहां रह जाते केवल
आभास के परमाणु
बंद ऑखो को
चिरती रौशनी की तरह
जहां अस्तित्व के धब्बे
सूक्षम आकार बनते
अपनी कालिमा लेते
नहीं चाहता
मेरा नेह कालिमा
अरूण आभा के रहते
नहीं रे नेह
रहने दो
मत स्वीकारो मुझे
स्वतः होने दो
अचेतन को समा लेने दो
चेतन मे
यह एकाकार
बनने दो निर्मल
जहाँ होता जाता
नेह निर्मल
अधिक उज्ज्वल
सृजन के बीज
बोने दो
कि सृष्टि पा जाये
अमूल्य स्नेह का राग
बहने दो नेह मेरा
इसी धार अटूट
कि मिट जाना मेरा
दे जाये
अद्वेत का सार।
छगन लाल गर्ग।



Friday, 25 December 2015

अच्छे दिन ।

अब यह भी
निर्धारण विवेक का
अच्छे ओर बुरे का
नहीं कोई संबंध जीवन से
अहसास भीतर का
अभिव्यक्ति भी कहां दे पाता
कि अच्छा हैं क्या
बदलाव का सत्य
सभी की एकरसता हो
संभव नहीं
पर शब्द अपने भाव
विभिन्न अर्थो को लिए
कहता गया
अपने अपने अच्छेपन को
जिसे यथार्थ का प्रवाह
नही देता अर्थ अपने
जो अच्छा लगे
असन्तुलन का यह जीवन
अच्छाई माने भी किसे
राज नेताओ का अच्छापन
बाधक हैं उनके धन्धे मे
फिर आम का जीवन
अच्छेपन की गुहार लगाये
यह ओछापन
अच्छे दिनों का इम्तिहान
क्यों हो
अब देखो ना
काटने  लगे हैं मच्छर
ऊभरी हुई सडको पर
पानी का बहाव
रूकेगा ही
यह चलना ओर गिरना
दोनों रहेगा ही साथ साथ
यह अनुभव हीनता हमारी
कि गचका खाये
गिरते उठते हैं
इसमें बुरा दिन कैसे
क्या सडके पहले से नहीं
गंदी नालिया
अब बस भी करो
जिन्दगी नहीं जुडी कभी
अच्छे दिनों से
व्याख्या मे गलती हमारी
अच्छा ही हैं
कि जीवन जीते हो
यह बदोलत
अच्छे दिनों के
आने से ही तो हुआ ।
छगन लाल गर्ग।


रूकती हैं गली।

 आगे रूकती हैं गली
ढलान उतरती
हो जाती पगडंडी मे तब्दील
वहीं आकार लिए
देने लगती
पथिक को संकरापन का अहसास
बिना संकरी हुए
कि रूके भीड़
करे तोल अपना
असंतुलन से पहले
कि यह ढलान रहने देगा इन्सान
जहां बेचना होता हैं इमान
नहीं छंटती भीड़
करती इन्तजार बारी का
ढलान का अंदाज
समाते अपने मनोमस्तिष्क
उसी अनुरूप
तन मन की सामर्थ्य शक्ति
तोलते ओर उतरते ढलान
जहां बहती हैं नद
आँकाक्षाओ की
ढलान बहती आँकाक्षाऐ
तरोताजा युग का सत्य
अपनी पावनता ओर मर्यादाओ
को समर्पित करता
उतरता जाता ढलान
आस्था लिए
वासनाओ की तृप्ति निमित्त
ओर यह वेग ओर बढता
जब समाहित होती जाती
समर्पित होती प्राण्जल आस्थाऐ
सभ्यता की चमक लेती
यह जीवन नद बहती जाती
ओर यह भीड़ गहराती जाती
गली के अंतिम छोर
आ चुकी
मानवता की भीड़
रूकना समझना छोड़
बहना चाहती
समतल गली का मोह
नहीं देता
ढलान सी ऊँचाईया
बिना ढलान उतरे
आज के युग
ऊँचाईओ को पालना
मृगतृष्णा हुआ ।
छगन लाल गर्ग।

Thursday, 24 December 2015

अंतिम पृष्ठ ।

अंतिम पृष्ठ लिखना
जिन्दगी तेरा
बाकी रहा
अतीत अब सफलता तेरी
समझा कि जी पाया तुझे
कि लिखना हुआ संभव
तेरे विभिन्न आयाम
गुजरा भी भोगा भी
ओर पाया मुकाम
ठहरा हूँ अंतिम पृष्ठ
लिखा नहीं जाता
यह अंतिम पृष्ठ
बाकी रहा
करता हूँ यत्न
कि लिख पाऊ
पर लिखना हिलाता जाता
संपूर्ण अस्तित्व
अनुभव की आस्था
बिखराव लेती घेरती हैं मुझे
कैसे समेटू
कि इकजाई हो
ओर तारतम्यता बने
पहले की तरह
अतीत जैसा ही पृष्ठ बने
संचित अनुभव
अब हो रहा नाकाफी
गहन सत्यता का बोध
उतरता आता है अंतिम पृष्ठ
कि योजित मान्यताऐ
ओर देखे सपने
बिखराव लिए विभत्स आकार
बरसते जाते
जिन्हें पाला समर्पण हुए
सामर्थ्य का बल असीम दिए
कि फूल महके
पर यह महक अपनत्व की नहीं
सभ्य विवेकमय नीजता की
मूल से अनजान
उसी को नकारती सी
ओर लिखे सारे पृष्ठ
मेरी इस जीवन पुस्तक के
इस अंतिम पृष्ठ से
मेल नहीं खाते
लगने लगा अब
नहीं हैं यह पृष्ठ
इस पुस्तक का
ओर ऐसे मे
मुश्किल होता जाता
अंतिम उपसंहार लिखना
यह बाकी ही रहा।
छगन लाल गर्ग।

चलता हूँ ।

चलता हूँ
गहरे निश्वास
कहता हूँ
माँ की खोयी खोयी ऑखे
शून्य गगन मे
निहारती हैं
ठीक हैं
अस्फूट शब्दों से
माँ की अनुमति के बोल
कानों मे गून्जते हैं
एक कतरा ऑसू
भीतर ही भीतर
उमडते महसूसता हूँ
नहीं आते बाहर
भीतर सूखते भी नहीं
तन की एक एक धमनी मे
प्रवाहित हुआ बहता हैं
माँ की बाहरी खटिया
छाया घेरती जाती हैं
सर्दी का समय
सर्द हवाओं के झौके
जर्जर तन चिरते होंगे
महसूसता ताकने लगता हूँ
अपने सूने मकान की ओर
देखता हूँ ताला लगा
शायद ही खुले
विवादित जिरह मे फसा
भाइयों के बँटवारे का सच
झेलता सूनापन
उधर पाता हूँ
घूरती हुई पत्नी
एकबार फिर
माँ से कहता हूँ
तुम चलो ना
हमारे साथ
माँ के स्वर डूबते जाते
कहीं दूर से पायी ऊर्जा बटोरते
नहीं यही रहने दो
मेरे पति की स्मृतियो तले
कैसे छोडू
अनचाही ठेठ भीतर से
निश्वास लिए भाइयों से कहता हूँ
देखभाल की
फिर अपना जीवन
अपने परिवार के साथ
जीने चलता हूँ
अपनी गाड़ी मे
बैठता हूँ
युग के सत्य से
कदमताल करती
रफ्तार लेती हैं गाड़ी
ओर मैं
महसूस करता हूँ
मेरी जिन्दगी की रफ्तार
थम सी ग ई हैं
माँ की तरह।
छगन लाल गर्ग।


Wednesday, 23 December 2015

तो अच्छा ।

नहीं खुलती ऑख
तो अच्छा
अनजानापन देता
एकरसता का बोध
ओर यह जीवन
हो जाता निरापद
सरल स्वाभाविक
यह ज्ञान अपरिमित
भरता हैं शंकाओ का अतिसार
ओर अधिक भ्रमित विवेक के
मकड जाल मे फसता जाता
हर बार हर शास्त्र
मात्र शंकाओ के शास्त्र ही कहूँ
देता जाता गहन व्यूहजाल
नहीं पाता कहीं किनारा
कि जिना कैसे हो सफल
नही बनता यह ज्ञान
कुन्जी जीने की
देता हैं नित अमानवीय प्रतिस्पर्धा
कि मूल नेह रीतता जाता
ओर मानव नहीं
हम हो चुके कर्ता
बिना सामर्थ्य के
सामर्थ्य रखते मात्र विचारों का
यही कसक बन चुकी
जीवन हुआ जाता निस्सार
मेघा की मार तले
दब चुकी मानवता
नहीं खुलती अगर ऑख
तो अच्छा ।
छगन लाल गर्ग।

प्यासा ही रहा।

प्यासा हूँ मैं
संतुष्ट जीवन नहीं
अनंत चाह रहते
नहीं हुआ अहसास कभी
कि स्पंदन हुआ सुखो से
भीतर तक का रस
अधिक असंतुष्टि का सागर
लहरता रहा
हर प्रयास का सत्य
हर बार तृप्ति की आस
हर नये मोड को
अपना वर्चस्व देती
ओर पाती जाती
अतृप्ति की असीम कसक
रेत सी शुष्कता का विस्तार
नहीं हैं जीवन रस का सागर
वितृष्णा का भयानक बियाबन
भटकन का भंवर जाल
समझा ही भ्रान्त जीवन
असलियत आज भी नहीं
वहीं प्यास ओर अधूरापन
ध्वनि ओर देह की मधुरता
लहरों का बिखराव
जो समय का मात्र उन्माद
सार हीन
नहीं कभी मेरा
समय का अंश मात्र
उसी पल का प्रवाह बना
जाता रहा
देता गया रिक्तता का अहसास
प्यासेपन के अवसाद
व्यतीत होता हैं काल
यह दुर्गति का सत्य
स्वीकारता हूँ मैं
ओर निसंकोच कहता हूँ
प्यासा ही रहा।
छगन लाल गर्ग।

Tuesday, 22 December 2015

सेवा निवृत्ति ।

सेवा निवृत्ति
हर व्यक्ति का नहीं हक
केवल राजकीय कार्मिक
हो जाता अकाम
जब पाता एक पड़ाव
उम्र का
यह पैमाना
होता हैं निश्चित
सरकारों द्वारा
उनकी सुविधा से
अकथनीय थकान
निवृत्ति का आदेश पाते ही
महसूस करता
उधर सहकर्मी संवेदना मे
करते सतरंगी
एक भव्य आयोजन
ओर कार्मिक
दुखी हृदय होता
सेवा निवृत्त
बड़ा अजीब हैं यह
भाषणों का दौर भी
अमानवीय दैविक गुणों का
अवतार साबित करने मे
लगती जाती
होडा होड़
कि असलियत उसकी
लुप्त होकर बन जाता
उस पल का महापुरुष
यह दिन
शायद उसकी खुशकिस्मती का
होता हैं आखिरी दिन
फिर शुरू होता
एक नया अध्याय
जहां हर दिन
आता हैं रात लिए
बेकाम करेगा क्या
वहीं खटिया
जिसे बड़ी मुश्किल से
निन्द लेने का
अवसर देती
आज वहीं उसकी छाया
संगिनी
यकायक मिला यह जीवन
भीतर से तौडता जाता
बेकाम व्यक्ति
मृत्यु से पूर्व
भीतर की मार मरता रहता
चुभता हैं अब घर
कान्टे की तरह
फिर शुरू होती हैं दीवारें
बेकाम ओर काम की
बेकाम बेकार को
सरकाया जाता
घर के एक कौने मे
वहीं घर
जिसका निर्माण तिल तिल
वेतन से
किस्तो पर किया
आज वह खुद
किस्त का अंश बना
घर का
नकारा सदस्य
आफत से कम कहां ।
छगन लाल गर्ग।





बदले हैं मापदंड ।

अति सभ्यता
पक्के इरादों से
बदलती जाती
जिन्दगी के असभ्य मापदंड
जिनमें मर्यादा का होता
तनिक भी समावेश
हो जाता वहीं
दकियानूसी अनगढा गंवार
युग का नया अवतार
जीवन बनाता जाता
अति सभ्य
कि जिन्दगी अर्थ पाये
अपने होने का
विचारों का बहाव
होता रहे स्वच्छन्द
वाणी अपनी सार्थकता
कर सके सिद्ध
उलजलूल तर्को के आसरे
नहीं हो कहीं विराम
आखिर मानव जीवन
अनेको पुण्यो की बदोलत पाया
हो सके सामर्थ्य सीमा तक
सारी वर्जनाओ का निषेध
ओर जिन्दगी नहीं दिखा सके
अपनी असलियत
अब अति मुश्किल हैं
निश्छल जीना
हर शैष्टा देती जाती
घना तिरस्कार
मुँह छिपाता हैं असलीपन
ओर यह नकलीपन
हावी रहता हैं हर
असलियत पर
तन मन ओर आचरण
इठलाते जाते
हर प्रदर्शन बढाता हैं नूर
जिन्दगी तेरा
प्रकृति प्रदत हर सौन्दर्य
हो चुका हैं बेरौनक
यह हैं प्रसाधनो का युग
कृत्रिम
हमारी भावनाओ की तरह
जो अंतराल जीती
असीम
भीतर ओर बाहर
ओर हम तोलते जाते
अपने विवेक
मानव नहीं
प्रसाधनो की कीमत
यही सत्य
मानव की श्रेष्ठ हैसियत का
उधर सौन्दर्य भी
समझ चुका अपनी असलियत
वस्त्रों की कमी का महत्व
भीतरी सौन्दर्य का रहस्य
वस्त्रो का स्थान
घेरते जा रहे
अजीबोगरीब आकृति लिए
टेटू
चलो ओर भी बेहतर
हम सभ्य तो हैं ही
तरक्की हमारी
नित ऊँचाई लेती हैं ।
छगन लाल गर्ग।




Monday, 21 December 2015

दो ना भुलावा।

दो ना भुलावा
नादान घना हूँ
स्नेह निर्झर मे
नहाया नहीं हूँ
मन चाही लहर कभी
हृदय सागर मे
उमडी नहीं हैं
तन की यह गागर
नित रीती रही हैं
दो ना भुलावा
नादान घना हूँ
मुस्कान तुम्हारी
तडित बन चुभती
रीते हृदय मे
लहर सी हलचल भरती
स्नेह बिना का चित हैं मेरा
हाव भाव से रहा अनजाना
भेद यह पाता
विस्मृति देता
आह मेरे मितवा
कैसा रे जादू
हृदय धरातल
पिघला पिघला
उठ उठ दौडे
कोलाहल  कैसा
गागर चित यह
सागर हुआ कैसे
स्नेह राग अब
बहता जाता
लगने लगा रे
स्नेह सरिता बहती
दो ना भुलावा
नादान घना हूँ
प्रेम कथा यह
गहराई झील सी
सुमन बनी तुम
या अरूण रवि रश्मि
मुख मंडल तेरा
आभा देता
शोभा किरण बन
चित मे रमती
कोमल कोमल
गात पंखुरी
हृदय गगन मे
उषा सी लालिमा भरती
दो ना भुलावा
नादान घना हूँ
प्रियतम मेरे
तुम क्या आये
प्राण प्रेममयी
मदिरा लाये
प्यासा घना चित
कैसे पीये रे
स्पर्श आह मादक
तन होती पुलकन
प्रबल सिराये
स्फूटन लेती
नेह वेग घना रे
प्रियतम मेरे
बाढ हुआ नेह
मुझे बहाता
कर दो ना उपाय
वर्चस्व मेरा तुममे
विलय हो जाय
गंध तुम्हारी
मदभरी नशीली
दे रही मदहोशी
बचना नहीं चाहूँ
देह पीघल कर
नीर बनी अब
सागर हो रसीली
खुद मे समा लो
दो ना भुलावा
नादान घना हूँ
राग उभरा प्रेमिल
भूला रे भूला
विराग काल भी
लौकिक नेह का
यह नजारा
देता जाय
भीतर रश्मि बन
अलौकिक स्नेह का
हल्का किनारा
मीठास जब तेरी
भाती घनेरी
परम स्नेह की
पावन मदिरा
होगी कितनी अनूठी
राह यही रे
प्रेमी मेरे चल चख थोड़ा
संसार हैं जीना
राह फिर जाना
उसी डगर रे
जहां निश्छल प्रेम
गगन कहता हैं
अब दो ना भुलावा
प्रियतम मेरे
नादान घना हूँ ।
छगन लाल गर्ग।







Sunday, 20 December 2015

भीतरी धुऑ।

 कचोटता कथन
सुसंस्कृत की अभिव्यक्ति
नहीं बनता
गरिमा व्यक्तित्व दोनों
खंडित करता हैं
ओर इसी संयम मे
यथार्थ अनदेखा किये
हमारी सभ्यता
विस्तार पाती हैं
पर यह विस्तार
क्या दमन का दूसरा
अकथनीय
भीतरी विस्तार लेता
दानव नहीं
जो मानवता का शोषण करता
फलता फूलता
सभ्य संस्कृत बना
वैभव जीता हैं
प्रश्न विषमता का
मूल बना
हमारे प्रबुद्धो को
मंथन शायद दे
प्रजातंत्र का यह सोच
ओर आम आदमी का
रेगता सरकता जीवन
जहां दिखता रहता
जीने की कसमकस मे
भीतरी अरमानो का
सुलगता जलता सा धुऑ
असंख्य नौकरी की तलाश मे
भटकते हमारे युवा
रोटी की जुगाड मे
काम ढूंढता मजदूर
ओर पाले की मार मरती फसले
खाद की मंहगाई झेलते किसान
व्यवस्था का कहीं कोई
न इरादा न इन्तजाम
क्या हो
चुनावी समय होता
शायद कुछ घोषणाओ की किस्त
मे टुकड़ों का बँटवारा होता
हैं तो बहुत अशोभनीय
पर यथार्थ भी
शायद वैभव के इरादों मे
हमदर्दी पनपे ।
छगन लाल गर्ग।



रीती जिन्दगी ।

नही बहाव
 सरित सा
अब रीती जिन्दगी
संताप त्याग अब
शान्त हो जा
भावना का भार
मत ले
कामना का
भंवर तज दे
शान्त सागर बन
सार पा ले
जिन्दगी अब
शान्त हो जा
अंबर सा विस्तृत
भाव ले ले
तारिका सम
रश्मि हो जा
चतुर चाल तेरी
अब त्याग दे तू
किसलय सम कोमल
चित कर ले
अंचल सम लहराये
राग तेरा
नवल मधुरस की
मुकुल गागर ढुलकने दे
जिन्दगी तू
अब शान्त हो जा
अलौकिक प्रियतम निहारे
अमंद अधरो से
स्मरण नाम ले ले
अवशेष जीवन
सार ले ले
सत्य भोगा
सत्य रह गया
झूठ का आडम्बर
हट रहा
सत्य का कुछ
सार कह दे
खिलते कुसुम की
मुस्कान भर दे
नवोदित नमन का
रसपान कर ले
निश्छल स्नेह का निर्झर
बहे रे
प्राण ऊर्जा
समाहित कर ले
संगम ससंर्ग होने को आया
निश्छल नेह के
बीज बो दे
अंकुर नव कपोल कंपित
पवन लहर भर
चंचल कर दे
प्राण रस अब
अंकुर लेता
रस पात्र रीता
लबालब भर ले
उन्माद उछले
पराग कण सा कोमल
चित तेरा
प्रियतम तन का
अवलंबन ले ले
प्राण छोड़ अब
ओर ढीला
पवन गति से
बंध प्रियतम
झूलने दे झौका बन रे
झूला प्रियतम
बन गये रे
मत सिपट अब
तन जीवन छाया
तोल खुद का
मोल रे अब तू
सत्य जीया वहीं
काम ले अब तू
मन कुसुम संग
छोड रे अब तू
अवरोध सारे
छोड रे अब तू
अनमोल पल है
तोल रे अब तू
रीती रे जिन्दगी
अब शान्त हो जा ।
छगन लाल गर्ग।




Saturday, 19 December 2015

नहीं भाता।

नहीं भाता
 घना अंधकार
डराता जाता
अंधेरे का यथार्थ
अकेलेपन का अहसास
जकडता जाता
संपूर्ण अस्तित्व
शून्यता का विकराल सत्य
बर्बरता से
रौदता हैं बार बार
जीवन के सारे
विवेक का भ्रम
असलियत लिए
काम्पता रहता
नहीं हैं
तर्क ओर चर्चा का सत्य
अंधकार की खोये
अपना वर्चस्व
ओर यह यथार्थ
जीवन का
लगता हैं विभत्स रूप
अंतहीन प्रवृत्ति लिए
यह पल जीत लेना
जीवन की अनुभूति पाना
हर रजनी
 अपने आवरण
मोटे गात मे
नवल प्रभात का सुनहरा
उजियारा लिए
अपनी प्रभुता का
अहंकार
बतलाती जाती हैं
एक महिन
 समय का पर्दा
जीवन के सुख
छिपा देता
तथ्य तो सत्य हैं
पर यह अंधकार
नहीं भाता।
छगन लाल गर्ग।



कहने दो।

वह ठीक कहता हैं
कहने दो
शब्द मैल धोते हैं
पवित्र होने दो
संगीत सुर अखरता हैं
पर राग झरने दो
अंधेरा काला घना हैं
छिपी रौशनी आने दो
नारकीय पीड़ा आती हैं
उसी ताप निखरने दो
धन मद चमकता घना हैं
मद मार से बचने दो
सता मोह अंकुर लेता हैं
भक्ति नमन पनपने दो
वर्चस्व साबित प्रबल चाह हैं
नहीं हूँ का भाव आने दो
प्रसिद्धि चाह की हलचल हैं
जीवंत कर्म परामर्थ होने दो
छल कपट जंजाल घेरता हैं
आत्मावलोकन शुद्धि होने दो
बनावट प्रदर्शन तन मन छाया हैं

जैसे भी हो।

यह होना
स्वयं संपूर्ण विसंगति
आधार होने का
कोई संगत प्रमाण
ढूँढता
व्यतीत होता हूँ नित
देह का होना भी
स्थिर कहां
ओर विचार कहां पाते
अपना अस्तित्व
नित बदलते समय के साथ
जीते बहते समय के प्रवाह
ओर जीने के मापदंड
शास्त्र सम्मत रहे कहां
युग की चाल संग
बढ़ाते जाते अपने कदम
धारणाओं का क्या
तर्को के मध्य
नित पिसती चकनाचूर हुई
जीवन कहां रहा
कोरा कागज
उल जलूल चित्र छपते जाते
अनचाहे
विवश हैं हम
कलम ओर लेखनी हमारी नहीं
समय ओर प्रकृति के हाथों
अंकित होते जाते चित्र
ऑके जाते हैं हम
ओर भीतर का अहं
बार बार हूँकारता कहता
विसंगति नहीं जीवन
मैने स्वयं गढा जीवन अपना
संघर्ष ताप झैले
तभी विकसित हुआ हूँ मैं
यह विसंगति संगति का खेल
अधूरा छोडना विवशता
समय के साथ विसर्जन की
अब बेबूझ हूँ
सत्य आधा अधूरा
पूरा कैसे हो
शायद सोचना कम
विलय सामजस्य करना ही
हार मे जीत हो।
छगन लाल गर्ग।


Friday, 18 December 2015

अब आओ ना।

अब आओ ना
प्रेम भरा चित कलश तुम्हारा
रीता पड़ा हैं
हृदय हमारा
भरा स्नेह नीर उथलाओ ना
क्षुब्ध हुआ व्यथा भार से
प्रेमिल छटा अलको की छाया
मधुकर सी अधरो की मदिरा
जी भर कर चखाओ ना
अब आओ ना
पुलकित हृदय कर जाओ ना
डूब रहा रे दर्द सरोवर
रज्जू डोर स्नेह बन
कतरा भर आस
तिनका बनकर
सूने हृदय की तंरग झंकृत हो
बज जाओ ना
करूण शून्य बना
अस्तित्व तुम बिन
कमनीय करो से
संबल समरस स्नेहिल मादक
स्पर्श साकार सहलाओ ना
अब आओ ना
भाव भंगिमा भाती भरती
स्नेह शाश्वत सृजन लेता
चित सागर मे सिरहन देता
मीठी मादक मोह की लहरे
कल्पित कामना बन
कंपन देती
साकार स्नेह का बिम्ब बनकर
नयनो से नेह पवन बनी तुम अइ
चुपके चुपके
चित छायी हो
अब आओ ना
जर्जर जीवन
जाल जकडा रे
समय सिपाही पकड़ रहा रे
घोर घनेरा घेरा डाला
काल कालिमा
घनीभूत घबराऊ
हृदय हारा सा
हहराता जाय
शून्य सृष्टि विसर्जन चाहे
प्राण अटकता
पगडंडी निहारे
अब आओ ना
चित चुराती
स्मृति फिर फिर
निशा निहारती
अपना समझे
निगाह हैं नाशक
यौवन उन्माद लिए
मुग्धा नायिका बन
आलिगंन चाहती
विलय होती रे
मुझमें निर्मम
अब आओ ना
अचेतन आवरण
तन तना तनावमय
कर्मणीय अंग सब
छोडी क्रियाऐ
छलना छा रही
रागिणी ना हो विस्मृत
प्राण रहे तक
स्पंदन रहे तक
आ जाओ ना
नेह निर्झर
बरसा जाओ ना
अब आओ ना।
छगन लाल गर्ग।





Thursday, 17 December 2015

नीरस कान्त काल।

अजीब ऊहापोह छाया हुआ हैं कुण्ठित मन
कुछ हैं क्या हैं क्या नहीं कहो न थोड़ा रे मन
खामोशी हैं बाहर भीतर हलचल मे हैं तडपन
अनेको होंगे कारण दोष किसे दू कहो तो मन।
बवंडरो का जोर हुआ वेगमय
छिप जा रे कहीं तू करूणामय
बच रहा तो ही झेलेगा तनमय
विरह जनित हैं कसक रे हृदय ।
लय से सूनापन पसरता विस्तृत हैं
भय कातर होते अजनबी अपार हैं
क्षय से विपुल सृष्टि सृजन तत्पर हैं
नीरस कान्त काल देता यही संकेत हैं ।
अनजाने भी कब परिचय देंगे
काल थोड़ा कब विस्तार लेंगे
अहंकार छाया क्या मुक्ति लेंगे
शाश्वत किरण क्या चित लेंगे ।
मिले जो अनमिले हो रहे हैं
खिले वे मुरझाते जा रहे हैं
रीते नव रस भरे जा रहे हैं
भरे भार ढो विकल हो रहे हैं ।
सार जग कब कैसे जान पाया
तार वीणा टूटे कब जोड़ पाया
हार जीत भ्रम कोन छोड पाया
डार टूटी पेड़ कोन जोड़ पाया।।
छगन लाल गर्ग।



नसीब का ठौर।

कहां होता हैं नसीब
हर किसी के जीवन
की चमक
कि हृदय झील मे
खिल खिल उठे कुसुम
संपूर्ण लावण्यता के
कि महक उठे
ऑगन भावनाओं का
ओर यौवन का दरिया
हिडोलित हुआ
दे अनंत सी उताड़ग लहरे
नहीं रे मन
नहीं हैं जीवन नसीब का ठौर
ओर यदि
यह महसूसता भी
तो पीर के पारावार मे
जहां किलोल करते
वासनाओ के फूल
मुरझाने लगते
बनावटी दृश्यो से
वहीं दृश्यमान होते
उभरने लगते हैं
कृत्रिम शोभा बने
सभ्य पात्र
अभिनय करते नसीब ठौर का
वे नहीं होते आदमी
त्रासदी का दंश
विषेला
डंक चुभोता जाता
हर संवेदना को
यह टीस हैं
नसीब न होने की
कि प्रकटी हैं जहर बनी
प्रतिकूलता को
अनुकूल बनाने की
इन्सानियत को रौदती हुई
यह अकारण नहीं
कहीं गहरे भीतर से उठी
टीस को ठेलती
अहं का आकार लेती
करना चाहती
वर्चस्व साबित
वहीं कारण
पथ के साथी
नाता जोडे
ओर दे अपने भी हसीन पल
कि रस बिखेरे जिन्दगी
बाहर बाहर
यह हर्ष का कतरा
शास्वत कहां
हल्का सा आभास
भीतरी रस का
जो सत्य नहीं
केवल बनावट का संचय
कि भाव बहते
कहते रस हैं यह
असलियत कुछ ओर
जो नित मरती जाती
भीतर ही भीतर
यह जिन्दगी
एक नीरस पतझड
जो हल्की सी
बेदर्द हवा के झौके
काम्पती ठिठूरती
पर हम
अहं की दीवार बनाते जाते
दावा करते
सर्वौच्चता का
ओर यह भी
केवल सामर्थ्य तक
जब तक की
झंझावत न आये
अनुभव झेलता स्वाभिमान
टूटता बिखरता
कान्च की माफिक
बनती जिन्दगी कुण्ठा का धुऑ
लगता जाता
हर मुस्कान के पीछे
दुख की रजनी
यह हर्ष का आवरण
विकसा सा
नवल प्रभात सा
नसीब नहीं
संवेदना हैं
मानव मन की
जो अप्रकटता चाहती
नसीब हमारा
भौतिकता का संग्रहण नहीं
भीतर का अंकुरण हैं
युग का सच
बहुत डरावना हो उठा
नसीब बना अब
दीवा स्वप्न
आओ ना
तलाशे उम्मीदें
कि भीतर हो
अंकुरित सुख
ओर यह
निस्पृश्यता से
खुद मे डूबे ही
शायद मिले
चलो तलाशे
नसीब का ठौर।
छगन लाल गर्ग।


Wednesday, 16 December 2015

छाया कहां हैं ।

तपन क्या सत्य हैं
पिघलना कसक हैं
जतन जीवन कम हैं
लगन भीतर तडप हैं ।
दमन नियंत्रण हारा हैं
बेकरार घना हृदय हैं
बदन भिगा दर्द भार हैं
ताप बढा छाया कहां हैं ।
बंधन कब तक तनाव झेल सका हैं
कसक कसाव सहना सामर्थ्य ही हैं
एकाग्र अस्तित्व संकल्पित लडा हैं
जिन्दगी पिघल बंधन घनीभूत हुआ हैं ।
उजडा उजडा जीवन तेरा
व्यर्थ रहा हैं जन्म का फेरा
पाया सब कुछ रहेगा तेरा
खो रहा जीवन जो था तेरा ।।
छगन लाल गर्ग।

दम लेने दो।

रोक देते हो मुझे  तभी हताश होता हूँ
टोक देते हो खुद की पहचान खोता हूँ
इस युग जीना कैसे अभी सिखता हूँ
दम लेने दो तैयारी जीने की करता हूँ ।
अधूरा ही सही कहाता आदमी तो हूँ
अनमना ही सही अपनों मे जीता तो हूँ
सागर लहरों को ऊँची लहराते देखा हूँ
गागर भरा नीर भी उफनते मैं देखा हूँ ।
किनारे मिलते हैं कहां सामर्थ्य बिना
अंधेरे मिटते कहां भीतर रोशनी बिना
नजारे लुभाते कहां चित शान्ति बिना
सितारे चमकते भी कहां अंधेरे बिना ।
भार उठा रहा हूँ घना उठाने तो दो
सार समझा हूँ जरा सा कहने तो दो
पार होना चाहूँ  किनारे जाने तो दो
जीया जी भर मर्जी दम लेने तो दो।।
छगन लाल गर्ग।

मानव हूँ ।

मानव हूँ
पूछता अपने से
जवाब नहीं पाता
हाँ सच यह
आकार मानव सम
रूप सौन्दर्य निखरा सा
पर संचय
हृदय  करता
विवेक नहीं करता
कहता जाता
हाँ अति सभ्य
सुसंस्कृत हूँ मैं
नहीं कोई तर्क
जो नकारे मानवता
पर यह विरोधी हृदय
कहां मानता
परख तो उसी की
स्वयं का अहसास
आत्मावलोकन उसी का
नहीं मानव नहीं मैं
गिर चुका
मानवता से
यह युग विवेक भरा
हृदय संवेदना नहीं जीता
यह पुरानपंथी बनाता
असभ्य ही रखता
आज मैं
विवेकी हूँ
अपना हित सर्वोत्तम
पर हित का प्रश्न
विवेक नहीं मानता
झिझकता नहीं कहता
अब मैं
मानव हूँ
कह देता हूँ
मैं हूँ सभ्य
मैं हूँ विकसित
मैं हूँ प्रगतिशील
नहीं जीता मानवता
कैसे कह दू
मानव हूँ ।
छगन लाल गर्ग।

आशा कहां तुम ।

यह युग जन झंझावत झूझता रहता हैं ।
स्वार्थरत संघर्षों मे ही डूबता  जाता हैं ।
उत्पन्न उसी कोख छल कपट होता हैं ।
मानव हृदय हीन हुआ विष नित पीता हैं ।।
पागलपन कहे इसे भी क्या समझाओ तुम ।
सुख चाहा धन जोड़ा क्या हैं धोखेबाज हम।
वासना नित बढती हमारी अब हैं हताश हम।
जीवन पायेगा संतुष्टि कभी आशा कहां तुम ।।
जीये कैसे डर का छाया नित मंडराता हैं ।
मानव डरता भी सुखहित कुकर्म करता हैं ।
रक्त संबंधी भी स्वस्वार्थ अस्तित्व जीते हैं ।
नहीं परवाह अपनों की बेमौत अपने मरते हैं ।।
अब हर कदम पर जिन्दगी जोखिम जीती हैं ।
जहाँ जाओ वहाँ अनहोनी कहानी मिलती हैं ।
भीतर चित मेरे गर्म जलती लकीर चीरती हैं ।
पावन चरित्र हो यह विश्वास अब हिलता हैं ।।
छगन लाल गर्ग।

Tuesday, 15 December 2015

आओ ना तुम ।

आओ ना तुम
प्रियतम मेरे
हृदय वीणा के स्वर लेकर
झृञ्कृत करो ना
राग मेरे खोये खोये
उफान उठता नित
पीर पीघली हुआ
पारावार प्रियतम
टूटी सीमा सारी
छाती सवार हैं
तट प्रियतम
पीर बुलबुले गर्माहट लेकर
ऊबल ऊबल कर
भाप बनते
आओ ना तुम
राहे नैनो की
थकी थकी अब
अहसास कोमल ऑसू के भी
जलन उठती
भरती कसक अब ऊर
आओ ना तुम
सुलग उठा रे
प्राण प्रियतम
स्मृतिओ का जाल घेरा
कसक देता
वेदना बन
टीस उठती
जल जाता रे स्पंदन
भूल भूलैया
बन चुका अस्तित्व
हूँ मैं क्या
नहीं कुछ भी बोध
आओ ना प्रियतम
दे दो ना बोध
लगने लगी अब
हर ओर विरान सृष्टि
फुल खुशबू
खो चुके हैं
बाग रौनक
खो चुके हैं
रात रोती जा रही अब
शबनबी बूँदो के ऑसू
आओ ना तुम
कि फूल खिले
रूदन दरिया
लहर उठे
कलियो मे स्पंदन हो ले
पल्लवन का राग छेडे
मंद अब रे राग मेरा
हृदय कोहरा हैं अंधेरा
नवल कोपल नेह
अब अंकुर ले ले
आओ ना तुम
रात रीती बात बीती
नवल प्रातः उषा बनो तुम
ऑगन बहो इस हृदय
जी भर
लज्जा सी लालिमा बनकर
आओ ना तुम
कि यह चित मेरा
सूखा दरिया
नेह रस का स्त्रोत बहे तो
झंकार नेह का गीत
हम गा ले
ओर फिर से
खंराश कंठ की
बार बार
दर्द भरी पुकारे
आओ ना तुम
भर चुका रे
प्रियतम मेरे
संचित नेह का
सारा सागर
शब्द बनकर अब
बहना चाहता
बहाऊ मैं कैसे
आओ ना तुम
संसर्ग तुम्हारा
स्मृति रमता
राग पीया अमंद
अधर विराग देता
अलको का छाया
तुम्हारा
मन फिर चाहता
गंध वहीं मलयज
हृदय भरना चाहता
स्पर्श का स्पंदन
रोम रोम बसता
आओ ना तुम
अब दे दो त्राण
उठने तो दो अब
अंतर मेरे
मधु की लहरे
हृदय भरे वहीं
टकराये रौर
चेतना मेरी अब
उन्माद डूबी प्रियतम
विलय चाहती रे
आओ ना तुम ।
छगन लाल गर्ग।





यह नेह।

यह नेह
अंतर का स्पंदन
धमनियों का तीव्र उतेजना प्रवाह
ऊर्जा का घनत्व
बहता रहता नेह
तेरी ओर
संपूर्ण अस्तित्व ही
अपनत्व लिए
घनाकार हुए
 प्रतिफलन चाहता
नेह तेरा
कि इस ऊर्जा का उफान
झेले पात्र
उसी घनत्व घेरे
भाव देह ओर मन
यह अतिरेक
विस्फोट सा प्रवाहित
सारे राग एकाकार हुए
जीवन धारित मनोभाव
गुम्फन हुआ
गुजरने लगा हैं मध्य
अंतराल मिटाता
हृदय बीच
दोनों ओर
यह नेह पुञ्ज
अदृश्य करता जाता
दब जाते अन्य भाव
अहसास पाता परिमल
नेह का
पल उभरा हैं नेह बस
पावन परम प्रार्थना सा
कतरे दबे
द्वन्द घृणा अहं के भी
नहीं प्रकट प्रतीती
पर हैं अंश
मरे कहां
हैं इसी मे अंतर्लीन
यह पल हैं शास्वत
पर संसारी प्रकृति
मिटता भी हैं
फिर देता जाता
अपनी असली पहचान
जिसमें हैं राग द्वेष
छिपी छिपी घृणा
यही तो हैं
मेरे संसार का नेह
शुद्ध पावनता देता
आवेशित पल
चाहे हो गरज भरी
पर अहसास
वहीं वहीं शास्वत नेह का
वहीं पल जीवन
पकड आता नहीं
समर्पण हुआ यदि हृदय
बन जाता
जीवन हमारा पावन
यह पल की घटना
यदि बहे मानव मन
नित झरे
गति भरे
अंतर स्पंदन चले
प्रभु की प्रार्थना हैं यही
रस अंबार
परम नेह भीगे जीवन
जीवन सार केवल
यही नेह का पल ।
छगन लाल गर्ग।




Monday, 14 December 2015

स्वीकार्य ।

मेरे अंतर
निढाल हुआ
अब नहीं कोई ऊहापोह
न अति
न महत्वाकांक्षा
जगह नहीं रही
परिणाम सारे पा चुका
सार हीन सारा पाया
प्यास वहीं की वहीं
सुख आया गया
अतृप्ति का घडा अभी भी खाली
ओर हूँ क्या
अभी भी अज्ञात
चाहत गुम्फन मे उलझा उलझा
अनजान इच्छाओ की बेतहाशा तडप
रहता हूँ भार लदा
एक उतरते ही
ओर आ जाता
महत्वाकांक्षा का विचार
ओर इसे क्या विचार कहूँ
नहीं यह हैं वासना
नहीं जीता विचार युग
कहां हैं ठहराव
दौड ओर संघर्ष
बेभान हुआ जाता जीना
सत्य केवल जीत
तरीका नहीं सच्चाई
यह जीवन नहीं रहा गाँधीवादी
या कि अहिंसावादी
कोई वादो का जाल नहीं
महत्वाकांक्षाओ का जीवन
उठा पटक ओर चालाकी का सत्य
यही तो जीया
पर दौडा दौडी के इस खेल
खूब हाँफता रहा
पाया भी नकारा हुआ
पाते ही पाये की चमक
फीकी
कीमत जाती रही
जो भी पाया
रंगत फीकी
पर यह भीतर रहा
हमेशा खाली
इस खालीपन के चक्रव्यूह
तमाम मानवीयता
भूलता रहा
दौडता रहा
पाया न बहुत
 बेसकिमती
पर हाथ आते ही
होता रहा कद्रहीन
भरता रहा वस्तुएँ
होता जाता नित शून्यमय
अंतहीन निराशा लिए
आज भी भरा नहीं
न नेह न गेह ओर न देह
हारा थका जीवन
ओर अंतर
अब तू जैसा भी
स्वीकार्य मुझे ।
छगन लाल गर्ग।




Sunday, 13 December 2015

सपने थे।

सपने थे
बिखर गये
उम्मीदें थी
टूट गयी
नन्हे से फुल मेरे
सुकुमार गात तुम्हारा
आज भी यादो मे हैं
नटखटापन कहां भूला
हृदय का जुड़ाव
कहां विलग कर पाया
अबोधता तुम्हारी
निश्छलता भोली सी
समझ आते ही
तुम मेरे से अधिक
दुनिया समझ गये
सूझबूझ तुम्हारी
शुभ रही
तुम्हारा जीवन निखरा
प्रतिष्ठित हुए तुम
पर टीस भर गये
अप्रत्यक्ष ही कहो
कहीं न कहीं
मेरा छाया तुम्हारे साथ
जरूर रहा होगा
आज केवल मैं बचा
मेरा छाया नहीं
तुम हो
अहसास हैं दुनिया का
पर अब तुम मेरे नहीं रहे
जो थे कभी
मेरे अंश मेरे तत्व
मुबारक हो तुम्हारी दुनिया
तुम्हारी खुशियाँ
बुलाया था मुझे
अपने सपनों की नीव
खोदने से पहले
जहां बनना था तुम्हारी
खुशियों का आशियाना
जानता हूँ
आग्रह कर बुलाया था मुझे
कि लोग देखे मुझे भी
ओर तुम्हें उलहाना न मिले
मैं टुकुर टुकुर ताकता
देखता था तुम्हें
जब पंडित के मंत्रोंच्चार मे
तुम पालथी मारे
मेरे विसर्जन का मंत्र
पढ़ रहे थे
समझा था मैं
अब नहीं रहे तुम मेरे
तुम्हारा परिवार
बड़ा खुश था
तुम्हारी जीवन संगिनी
विभोर थी
केवल कहीं विलगता का दंश
झेलता दुखी था तो
मेरा हृदय
तुम्हारी नयी दुनिया से
बहुत दूर
फैका जा रहा था मुझे
मैं अभी कहां भूला था
मेरे जवान पुत्र की
असामयिक मौत
तुम्हारे छोटे भाई की
स्मृति मे खुदी जा रही नीव
आशाओ का खजाना
तुम बने थे
अब निरह सा बना
बिखरते टुकड़े आशाओ के
लहराते चौट करते  जाते
मेरे हृदय मे
चलो यह संसार का मेला
कहते हैं क्षणिक हैं
पर तुम्हें कहीं ओर
अपनी जड़ से कट कर
आशियाना बनाना सूझा
पर अंश हो मेरे
कभी तो हवा का झौका बनकर
मेरी तरफ बहो
जर्जर हो चुका मैं
केवल जड़ बना हूँ
नहीं होता पोषण
नहीं हैं चौकीदार
सूखता जाता
ओरो का कारण नहीं
निज अंश के रहते
अब नीर बह चुके
अपवाद बना हूँ
रहते जिन्दगी नहीं समझा
जितना समझे तुम
चलो यही सही
निश्वास लेता जाता हूँ
हर बार की तरह
शायद ईश्वर तक पहुँचे।
छगन लाल गर्ग।


अभेद्दय हो ।

जीवन तुम अभेद्दय हो
अछूये ही रीतते रहे
ओर मैं विकलता से ताकता रहा
तुम आते रहे
ओर घनी वेदना दिये
अनजाने ही ऑखो के ठीक
सामने जाते भी रहे
मैं फिर भी ठूठ सा
अभी भी हू
विकृत हुआ तिरस्कार सा
जीवंत हूँ
मेरे अस्तित्व का अंश
नवल कपोल उभरे
पले पुष्पाकार लेते ही
मुरझाये ताजापन लिए
ओर मै जर्जर अस्तित्व
बना हूँ रेगता जीता सा
प्राण रहते तो हैं
पर स्पंदन जाता रहा
अब तो भाप हूँ मैं
उबलता हुआ
मृत्यु सत्य नहीं  स्वीकारा
मोह क्या केवल
मैं ही जीता रहा
ओर भी नही क्या
जीते हैं पुत्र मोह
अगर मैं भ्रम जीया पुत्र मोह
तो क्यों भरता था भीतरी कोना
संवेदना के जाल बार बार
नहीं जी पाता था
बगेर देखे उसका भोला मुखडा
पूर्णता पाता था अपनी
हे मेरे खालीपन
भरा ही क्यों तू
जब रहना ही था खाली तुझे
क्या हो मेरे जीवन तुम
जाना कि अभेद्दय हो
पर यह अहसास इतना घना
केवल मुझे क्यों
रे पुत्र सुख
तू होता हैं क्या
जीवन मे आता सुनता हूँ
साक्षात्कार हुआ नहीं
क्षणिक आभासित हुए
रहे कहां
क्या हैं आकार कि देखू तुम्हें
केवल अहसास का हल्का सा कतरा
ओर परिणाम अहसास
देते गये हो रूदन
तुम्हारा आना जाना
एक पल का ही सपना
फिर वशीभूत नेह तुम्हारे
क्यों कर गये
यह रूदन का दरिया
नित निर्झर सा बहता
पर न जाने रीतता क्यों नहीं
यह जीना तुम्हारा
ओर फिर परलोक गमन
गमन के पदचिन्ह
कहां हैं पुत्र
अभेद्दय तुम ओर अदृश्य तू भी
देखो तुम होंगे वहीं
जहां अदृश्य सृजक हैं
बहुत समीप होंगे तुम
कहो न मेरा भी
विनती करो ना मेरी ओर से
कि बुला दे अदृश्य मुझे
उस अ ज्ञात राह
जिससे तुम पहुँचे
देखो आवगनी की छूट लेना
करना संकेत
मुस्कान देना
भ्रमित अनुभव जिया हूँ
कहीं अदृश्य की राह
भटक न पाऊ
पहले पहुँचे हो न
पुत्र धर्म जरूर निभाना ।
छगन लाल गर्ग।

Saturday, 12 December 2015

वाहन का पहिया ।

स्थिर मूर्त गोलाकार
वाहन का पहिया
अस्त होते सूर्य की किरणों से
लेते हैं लम्बोतरी छाया
फिर भी झलकता जाता
छाया मे भी खुद के
अस्तित्व का असली आकार
मूल आकार से मिलता हुआ
आती हैं पहचान
कि छाया हैं यह पहिया की
पर यही पहिया
लेता हैं जब गति अपनी
पहिये का स्वरूप
अपना आकार छोड़ देता
स्वरूप बनता हैं गति का
गोलाकार छाया बनती जाती
गति सी लम्बी लकीर
अब नहीं रहे पहिये
एक लकीर बने उभरे
गति की रफ्तार कहते
अंकित भी करते जाते
चित्रवत छाया अपनी
वहीं जहां हैं कच्चापन
सड़को का
वहीं दौडते पहिये
बना जाते हैं लकीर
अपनी गति की
पर जहां हैं पक्की सड़के
नहीं छोड़ पाते अपनी लकीर
हमारी पहियो की प्रगति के पहिये
चलते हैं पक्की राहो
जहां लकीर उभरती नहीं
छायाऐ दिखती हैं
क्षणिक
कच्ची राहो पर प्रगति के पहिये
चलना नहीं करते पसंद
उबड खाबड रास्ते
पहियो की चमक फीकी होती जाती
ओर अस्तित्व का जोखिम
प्रगति बाधक बना
पक्की सडको सी सुविधा
मखमली रास्ते
मोहित करते दौडाते हैं वहीं
अब इन्तजार करना होगा
कच्चे रास्तों को
योजना को आकार लेने दो
अलग बात हैं
कि विवादों मे योजनाओं के
पृष्ठ फाडे जायेगे
आस्था रखो जीवन सी
अभी
प्रगति के पहियो को
पक्की सड़को पर चलने दो ।
छगन लाल गर्ग ।

मेघा मन मेरे ।

क्यों नहीं स्वीकारते
मेघावी मन अपनी तुच्छता
अवान्छित ज्ञान के पुञ्ज
दंभ का आवरण तुम्हारा
बहुत हैं ढीला
अनेको छिद्र झान्कते हैं भीतर
ओर वहीं से प्रवेशता अंधकार
ओर मिटाते जाते हो तुम
चतुराई भरे
चमक देते शब्दों से
सत्य का भीतरी आकार
ढाकते जाते हो तर्को के जाल
दावे शब्दों के भरते हैं हूकार
करते वहीं हो जो होता
तुम्हारे हित
भीतर तुम्हारा खोखला सा
निराधार
प्रकृति के तनिक से वार
वाकशक्ति तुम्हारी भौथरा जाती
फिर ढूँढते हो आधार
तर्को का
पुस्तकें बनती हैं साथी
देते रहते अनर्गल तर्क
सर्वज्ञता का दंभ
 कहां छोडते हो मेरे मन
प्रकृति ओर मेघा की
छिपा छिपी का खेल
सरकती जाती हैं जिन्दगी
स्वीकार करो ना
तुच्छता अपनी
कि कठपुतली हो तुम
समय का पहेलु बदलते
बदल जाती अनुभूतिया
तुम्हारी
तुम केवल स्पंदन हो समय का
जीवन्त रूप तुम्हारा
तुम्हारे चाहे का नहीं
प्रकृति की चमक हो
तुम्हारी तार्किक अभिव्यक्ति
अधूरी अपरिमार्जित
मेघा निर्मित मापदंड
विशाल विराट का केवल अंश
रजनी का अंधकार
जाने बिना
मेरे मन तुम्हारी मेघा
सवेरा चाहती
यह होगा कैसे
क्यों नहीं स्वीकारते
मेरे मेघावी
अपनी तुच्छता।
छगन लाल गर्ग।




Friday, 11 December 2015

व्यक्त हो तुम ।

मेरे अव्यक्त
भीतर महसूसता तुम्हें
तुम व्यक्त हो
यह पर्दा झीना सा
छिपे हो
अव्यक्त हुए
सद्मवेशी हो तुम
मूल रूप
कहां साबित होता
छिपाव ही अस्तित्व
तुम्हारा
कि न दिखे असलियत
रहे हो अव्यक्त से
प्रकटते हो
अनेक रूप
अनेक माध्यम लिए
लेते हो नानारूप
भीतरी जान पहचान हैं हमारी
तुम बदलो शक्ल
छिपाओ पहचान
सच कहो
क्या यह बेढंगापन
मेरे अव्यक्त
तुम नहीं जीते
कभी दिखते हो
रूप सौन्दर्य लिए
कृत्रिम आवरण धरे
असलियत छिपाते
पाता हूँ तुम्हें
ईश्वरीय सौन्दर्य से लबालब
विमुक्त घना लावण्य
पर अव्यक्त हो तुम होनहार
मंजे हो कृत्रिम संस्कार तले
गढ देते हो नया
जोडते जाते
ओर अकारण ही
उलझ जाता हैं सत्य
कभी ढकते तुम
अपनी प्रकृति प्रद कुरूपता
जो मिली तुम्हें अज्ञात से
देते हो नया लावण्य
रंगते जाते
सतरंगी रंग
नया ताना बाना
ओर हो जाते हो
अतुलनीय
अब यह खेल तुम्हारा
असमझ ही सही
चमत्कार बना हैं
नित नयापन लिए
कि यथार्थ मिले भी कहां
ओर भी
निराशा के पल
जब उघड जाते चमत्कार
स्वयं सजने के
बनाते हो
गगन तुलनीय इमारतें
जो बनती आवासीय
अति आकर्षक
इसी बहाने
रंगत बनी रहे तुम्हारी
कभी अव्यक्त मेरे
व्यक्त होते तुम चित्रकारी मे
उभार देते हो ब्रह्मांड
समूची प्रकृति
अपने केनवास पर
जानते हो
शास्वत सौन्दर्य की झलक
मन की रमणियता लिए
उभरती हैं
मन का अंश
तनिक अपना अंश छोड़ ही देता
अनचाहे तुम्हारे
मेरे अव्यक्त
कभी बन जाते गहन गंभीर
भाव सौन्दर्य से डूबे
उठाते हो
उदात्तता से कलम
स्पर्श होती तुम्हारे हाथ
फिर वहीं उदातता
खेलती जाती तुम्हारे हाथों
नहीं हो पाते भाव
अछूये कृत्रिमता से
उसमें भी
कृत्रिमता की दुर्गंध बस पच जाती
मेरे अव्यक्त
व्यक्त होने निमित्त
कितना सुंदर तानाबाना तुम्हारा
नित्य बनाते
ढकते हो अपनी कुरूपता
भाव भी
विचार भी
शब्दों के हृदय स्पर्शी
तानो बानो से गुथ
बन जाते मेरे अव्यक्त
निर्मल रसधार
असलियत मेरी तुम्हारी
भीतर ही भीतर
हम दोनों जानते हैं ।
छगन लाल गर्ग।

समय घिरा सूर्य ।

अब कहो
सूर्य तुम्हारी तेजस्विता
समय के हाथों
धूली धुलायी नहीं
अब तुम प्रखर तापी
क्यों नहीं रहे
ठंडक का मिजाज
क्या अच्छा भाता तुम्हें
या विवशता तुम्हारी
कि फिक्र करते
ठंडी के अस्तित्व की
रहे वह भी
साबित करे होना अपना
समदर्शी भावों का
बीज तो नहीं बोते
कि मानवता परिमार्जन पाये
वहीं करते हो
समय बद्ध
केवल भावों मे त्याग के मोती लिए
समेटते हो अपनी ऊर्जा
पर देखते हो हमें
पल्लवित हैं तुमसे
होना ही काफी तुम्हारा
बदला रूप ही सही
तुम हो
आभास ही जीवन हमारा
उदित होते ही
चाहत लिए
भीतर तक नहाना चाहते
ऊर्जा तुम्हारी
फिर नहीं चाहत
ओरो की छाया
जो ठोस कर दे हमें
नितान्त खुलापन भाता
जहाँ बिखरी हैं रश्मिया तुम्हारी
कोमलता से इठलाती
सेकती हैं हमें
भीतरी चेतना का प्रवाह
प्राण तन समाता जाता
नहीं हैं उबाल की विकलता
समरसता का यह ताप
अनसीखी सीख भरता
संतुलन देता
बहता नस नस
दिगभ्रान्त जीता जन जीवन
क्या पल की इस ठौर
रूकेगा
समय का पहिया
खींच ले जीवन
समरसता का पाठ
सूर्य सी उष्मा देगा
तनिक हमें भी
समय सीख भरे।
छगन लाल गर्ग।


Thursday, 10 December 2015

खाई का अंतराल ।

प्रवाह की आधारशिला
खाई का चिर अंधकार
अमिट रहा
अनवरत घेरे जाता हैं
अंधकार मुझे
संपूर्ण अस्तित्व  ही कसूरवार
कि अंकुरित हुआ
पौधा हुआ हूँ खाई का
निर्झरो की
निर्मल प्रवाहित धारा का
जल पीकर
पल्लवन हुआ हैं मेरा
निखारता रहा हूँ स्वयं को
खाई की
असीम चिर छाया मे भी
तलाशता जाता हूँ
स्वयं की छाया
जो सूक्ष्म बनी
प्रवाहित हैं तन की
महीन सिराओ बीच
बाहरी स्थूल तन
कहते हैं देता हैं छाया
रश्मिया सूर्य से स्पर्श पाकर
पर खाई ने नहीं पाई
जीवन काल
सूर्य की रश्मिया
तलाशता रहा बहते पानी मे
नहीं पाया
खुद की छाया
कभी कभी
दोपहरी मे
रश्मि का कोई कतरा
आ जाता भूला सा
इठलाता सा
ढूँढता मुझे
बौनेपन मेरे भी कर जाता
स्पर्श
उसी पुलकन की स्मृति मे
थोड़ी सी ऊर्जा का कतरा
पाये पनपा हूँ
लघुता लिए
पाना चाहता
पूर्णाकार
मिले जब रश्मिया
आज तक नहीं हो पाया
मन की आस्था का अंत
मेरा धरातल नीचा
खोह कन्दरा भरा
अंतिम धरातल का
सतही पौधा हूँ
पेड़ का आकार पाने की आस
हर पौधे की तरह
संजोता जीता हूँ
ओर यह जिन्दगी
सरकती जाती
ओर अंतिम अंधरो की ओर
पूछता हूँ
ऊपरी धरातल के पौधों से
जिन्होंने रश्मिया पायी
ऐठते नहीं कहते
अजीब हूँ मैं
जीवन भी
समता होते भी
धरातल का अंतराल
बदनसीब भी
नहीं पाया रोशनी
ऊष्मा से अपरिचित
पौधा तो हूँ पर नकारा
पछताता हूँ
कास ऊपरी हिस्से का
पौधा होता
थोड़ी ऊँचाई पर स्थित
उनकी तरह
जो हैं दिखते
इतराते हुए
रश्मिया मिलती
समान होते भी
धरातल का अंतराल
बाधक रहा
ओर यह खाई
ओर गहरी होती जाती
बहते निर्झर
बीतते समय के संग
अंधेरा घना हैं
खाई खाती हैं अस्तित्व
प्राण कंठ लिए
बचाता हूँ अस्तित्व
न जाने कब
अति प्रवाह बाढ़ बने
घेरे संपूर्ण खाई
कचोटे भीतर भीतर
विलय ही होना हैं
संपूर्ण अस्तित्व
ओर ये अंधेरे
ओर घने होते
घनी छाया तले
डूबो देते
अगर प्रश्न लेता हैं जन्म
तो करिश्मा ही हैं
खाई धरातल मे पनपे पौधे
रश्मियो के हकदार हैं
पहुँचने देंगे रश्मिया
उन तक
ऊँचाई स्थित विशाल पेड़
नहीं जानता
अंत हीन अंतराल का दंश
सत्य भी हैं
मिटेगा भी
वक्त के गर्भ का सत्य
आकार लेता हैं ।
छगन लाल गर्ग।




स्तंभित अभिव्यक्ति ।

क्यों रूक जाती हैं
अभिव्यक्ति
जब लाता हैं वक्त
मार्मिक वेदना का दौर
क्यों बाधित होता
अवरोध देता बान्ध देता
उफान लेते भावों का प्रवाह
अवाक रह जाती गिरा
शब्द थके से
नहीं लेते आकार
भावानुकूल
शायद शब्द यही विराम
लेते हैं
या नहीं दे पाये
पल के सत्य को शब्द
जब प्राण छोड़ देते
देह से संबंध
वहीं देह जिसे प्राण पण से चाहा
जीया सारे इमानो को
बलिदान किये
इच्छानुकूल देह सुख पाने मे
बान्धता रहा पापो की गठरी
नहीं हैं नियंत्रण
भाव ओर विवेक बीच
स्थगन क्रियाओं का
यह सत्य
अकल्पनीय
मुझे घेरता जाता
जीवन रहते भी
मृत्यु सा
जीवन तू बेबूझ
असामयिक मृत्यु मेरी
प्रवेश हुई घटना बन
जीवन तू सत्य हैं क्या
नही लगता
हम हैं
विचार हैं
सामर्थ्य हैं
कहां रहे हमारे
तमाम सिद्धांत
इस क्षण
सभी चिढाते जाते
विस्तृत हुआ सा स्वयं को
एकाधिकार पाता हूँ
अदृश्य का
सृष्टि पर संपूर्ण कब्जा
ओर जीया जीवन
निस्सारता के कुरूप आकार
खडा डराता मुझे
अब न शब्दों का साथ
न ही सिद्धांतो का
साथ निभाता
केवल रूदन
बताता जाता अनुभूति
मानव की औकात
पल की यह पीर
नहीं लेती अभिव्यक्ति
गहन चिन्तक
लंबी डिग्रीओ के स्वामी
नही रखते हैसियत
अभिव्यक्ति की
वक्त की नजाकत का बखान
अभिव्यक्ति का आवरण
उघडा हैं
कुरूप हुआ सत्य सारा
अभिव्यक्ति का
अकर्मण्य अस्तित्व
यही सत्य
रूदन ही सार जीवन
यही सत्य ।
छगन लाल गर्ग।

Wednesday, 9 December 2015

विडंबना हैं जीवन ।

विडंबना हुआ जाता
मेरा जीवन
संवेदनाओ के रहते
हेय बना गुजारता जाता
जीवंत पल
नहीं पाता कोई ठौर
जहां मिलता संबल
उपेक्षित पाता हूँ स्वयं को
अपनों मे
कि जीना नहीं पाया
नही बन पाया
आदमी पूरा
नमित हुआ यह जीना
पुरुषार्थ नहीं
अभिमान का अंश जीए बिना
नहीं हो लायक
इन्शान कहला सको
जीता हूँ एक गहन विरानी
जहां मात्र
ऐतबार करते हैं कथित असभ्य
जिनके हर दर्द
समेटता बनता जाता हूँ
सहृदय उजला उनका सा
अब नहीं जकड पाता
सभ्य आचरण का धुऑ
कि भीतर प्रवेश करें
नये विचारों का गुम्फन
इतराता हैं इर्द गिर्द
ओर देता जाता
अपनी प्रभुता की झलक
ऐतबार नहीं होता
सरलता की विडंबना
भाती हैं जिन्दगी
बस करो अब
क्यों उलझाते हो
जटिल जिन्दगी मे
बहने दो जीवन
संवेदना के प्रवाह
ठीक हूँ मैं
सरल जीता हूँ
तुम्हारी दिशा
लुभावनी लगती हैं
दूर ही दूर
समीप आते ही कुरूपता
दुर्गन्ध का धुऑ
घूटता हैं श्वास मेरी
बेसहारो का ही साथ
मेरा अपना हैं
रहने दो
यह विडंबना ही सही
जीवन हुआ हैं मेरा
नहीं देते तुम संबल
न सही
छोडो मुझे
इस पीर का बहाव
बहता टूटता
आकार लेता हूँ
मानव का
महामानव का पात्र होना
मेरी औकात नहीं
साधारण हूँ
रहने दो
विडंबना का यह जीवन
मैंने चुना हैं
किसी की बख्शीस नहीं
मिटता हूँ
अकारण ही सही
मिटने दो।
छगन लाल गर्ग।



Tuesday, 8 December 2015

लिखने मे तो आओ।

मूर्त प्राण आये
संबल बनकर
अंश मेरे
ओर मैं बसाता रहा
रंगीन दुनिया भीतर
स्वार्थो की
स्वाभाविक चेतन जीवन
आसरा तुम्हारा
चाहत की घनी बागडोर थामे
अर्पित हुआ तुममे
जीता रहा
विडंबना हैं मेरा जीवन
कि तुम बीच मंझधार
मुझे
तडप जीने को
अकेले छोड़
चल दिये अनंत
अब नहीं हो तुम मूर्त
पर मैं अभी
ठूठ बना जड जीता हूँ
अमूर्त ही सही
तुम हो
महसूसता हूँ हर पल
अपने मे
अब नहीं हो पाती तुमसे
अभिव्यक्ति
लिखने तो दो
चार पंक्तियाँ
तुम्हारे लिए
बिखरावो का दरिया
समेटना चाहता थोड़ा
स्मृति बने हो
कहने दो थोड़ा
अभिव्यक्ति का ढंग
बदलता हूँ
लिखने तो दो
कहने दो कुछ बोल
बहुत अर्सा बिता
प्रत्यक्ष न सही
आमने सामने का
वार्तालाप
अब सपने मे होगा
इतना लिखने दो
तुम बसते हो प्राण मेरे
भीतर ही
नहीं जाते तुम
चेतना से
अचेतन मे भी देते हो
सहारा
कि रहता हूँ नींद मे भी
साथ ही
संसर्ग तुम्हारा
जीवन निधि बना मेरा
चेतन गतिविधियों मे
कहां हो दूर
नहीं पाता हूँ
यादों की असुविधा
हर क्रिया मेरी
पाती हैं स्पंदन तुमसे
सवेरे नहाने का पानी
गर्मी की उष्मा
पाता हैं तुमसे
हो जाता हैं गुनगुना
तुम्हारी याद से
आकार लेते हो तुम
वाष्प बनकर
होता रहता हूँ
पावन वाष्प तुम्हारी
ऊर्जावान निखरता हूँ
स्मृति तुम्हारी
अमूर्त ही सही
मेरे जीवन
छाया हो तुम
यही सबूत मेरा
कि जिन्दा हूँ मैं
भीतर कहां हैं
खालीपन
भरा भरा हैं हृदय मेरा
हर पल
सूक्ष्म अति सूक्ष्म
परमाणु से
रचते बसते
मेरे अंग प्रत्अंग
नहीं हुआ तनिक भी
अस्तित्व तुम्हारा कम
अभिव्यक्ति के अतिरिक्त
अब यह वेदना भी
दूर करो
मेरे अंश
लिखने दो
चार पंक्तियाँ कि
टीस भरे भावों को
आने दो कागज पर।
छगन लाल गर्ग।


Monday, 7 December 2015

अनुतरित प्रश्न ।

अनजान व्यक्ति
ठिठुरता सा
राह रोकता हैं मेरी
साहब चाय पिला दो
रूका सा
ठिठुरता तन
नाम मात्र के कपडो से
अध ढका शरीर
तेज हवा का प्रहार
ठिठुरता सा देखता हूँ उसे
अचकचा जाता हैं वह
जब उतारने लगता हूँ
खुद का पहना गर्म कोट
कदम पीछे हटते उसके
देखता हूँ मैं
खुले बटन बंद करता अपने
असमझ मे हूँ
हवाऐ चिरती जाती
भीतर तक
कैसे जी लेते हैं ये लोग
ठंडी का प्रबल वेग
कैसे सह जिन्दा बसे
भीतरी हिम्मत जुटा
दे देता हूँ अपना पहना कोट
भौचक्का सा
पथराई ऑखो से देखता
ऑखो से बहते ऑसू
देखता हूँ
बिना कुछ कहे
बढता हूँ
बेठता हूँ रिक्शा
ओर सोचता जाता हूँ
मेरा यह अनुग्रह
सारी ठिठुरती जिन्दगियो के
काम आयेगा
विषमता का यह कुरूप सत्य
बिन्धता जाता
भीतर भीतर
विषम जीवन क्या
जन्म लेता हैं
कैसे मानू
कि कुछ व्यक्ति
कोट सूट पहने
जन्म लेते हैं
ओर कुछ व्यक्ति
वस्त्र विहिन ठिठुरते
क्या इस सत्य पर
कोई विद्वान अन्वेषण करेगा
फिर लेगा पी एच डी की उपाधि
प्रश्न अनुतरित हैं ।
छगन लाल गर्ग।


Sunday, 6 December 2015

पिरोया धागा।

पिरोया  धागा हूँ मैं
सुई के खीचते तनाव के साथ
बढ़ता जाता हूँ
देता जाता हूँ क्षमता का बलिदान
कपडो को छेदती सुई
मुझे पिरोती जाती
गूथती रहती छेदो बीच
बड़ा अजीब हैं जीवन
बान्धता जाता हूँ
टूटे अपनों के जर्जर रिस्ते
परिवार के भी मानवता के भी
अर्पित करता जाता नीजपन
ओर लेने लगता हैं आकार
कि बनते हैं पहनने के वस्त्र
ढकते हैं शरीर
बचाते हैं तन की आबरू
मेरे प्राणों का धागा
ठीक सरकता हुआ
अर्पित मानवता
मानव की विकृति  के बिखरे  टुकड़े
जोडता जाता
कि सौम्य रूप ले सके
मनुष्य की मानवता
यह धागे सा अस्तित्व
अति महिन
नमनीयता संग
सर्वाग अर्पित करता
बनाता हैं भावमय संसार
कि मानव की दैत्यता
नहीं ले पाये असली स्वरूप
यह सुंदर भावों की सिलाई
निमित्त बने मानवता
कि श्वास टूटे विकृत मानसिकता की
ससीम हैं धागे का विस्तार
फिर मशीनी युग झटके
नही कह सकता
कितना हो पाऊगा सफल
पर अभी हूँ
ओर होने का अहसास
गति देता हैं
निरंतर
धागे ओर भावों की
शात्विक साम्यता
जीवन रहते ।
छगन लाल गर्ग।

Saturday, 5 December 2015

रोकी हैं अभिव्यक्तिया।

यह अध्ययन
किताबों का
अनवरत गढता जाता विद्वानो को
ओर होती रहती हैं
नित नयी नयी समीक्षाऐ
मिलती जाती हैं नित नयी किताबों से ज्यादा
व्याख्याऐ
ओर विद्वान हमारे करते जाते हैं शौध
जीवन का नहीं
किताबों का
जिनके सत्य
आज के जीवन से बेमेल
करते जाते हैं अनुभूतियों पर
नित नये प्रहार
ओर जीवन खोया खोया
ढूँढता जाता अपना यथार्थ
कहीं नहीं पाता खुद को
न किताबो मे ओर न ही
शोध प्रबंधो मे
अब हर जीवन छटपटाहट लिए
जीता जाता अधूरा अधूरा
हर अनुभूति नहीं पाती
अभिव्यक्ति
ओर होते जाते हैं विवश
घुटने को भीतर ही भीतर
अभिव्यक्ति के आधार
मापदंड पुख्ता चाहिए
करना होता हैं साबित
प्रसिद्ध ग्रंथ का अन्वेषण
किए बिना
साबित तगमा पाये बिना
अभिव्यक्ति हो जाती निरर्थक
यह साबित होना
बहुत कुछ हैं निर्धारित
पहचान ओर रूतबा
सीढ़ीया निर्धारित
बहुत कुछ मिल जाता हैं
सब बहुत व्यवस्थित
मापदंड हैं पूर्व निर्धारित
कि सामान्य अभिव्यक्ति
नहीं उतरती खरी
सीढ़ी बन जाती सपना
ओर घूटती जाती
भीतर की भीतर
ओर टूटता जाता अभिव्यक्ति का दम
सामान्य की अनुभूति
मरती रहती बेमोत
यह कसक बहुत कम
अनुभूत करते हैं मापदंड
उन्हें खतरा हैं
अपने अस्तित्व का
शाश्वत जीवन भाता नहीं
बदलाव अस्मिता मिटाता हैं
पर यह क्या होगा
कि शाश्वत झुठलाया जाये
लेना होगा परिमार्जन का खतरा
स्थापित ढकोसले जर्जर हुए
फिर भी जी तोड़ करते हैं विरोध
देते जाते तर्क
मापदंडों का
संघर्ष गहराता हैं
सत्य अनुभूति के भाव
रेखाओं का आकार चाहते हैं
अपना मौलिक अस्तित्व लिए
तोड़ने होंगे सीमाओ के मापदंड
यान्त्रिक बनी किताबें
नहीं देती सत्य
यह युग चाहता हैं
अपना अस्तित्व अपना व्यक्तित्व
उपक्रमों का सत्य
पूर्णता का मापदंड कभी नहीं रहा
मापदंडों की चट्टाने तोड़
सामान्य व्यक्ति की अभिव्यक्ति
बहना चाहती हैं
धरातल तलाशती।
छगन लाल गर्ग।



Friday, 4 December 2015

अंतर हैं ।

अंतर हैं सत्य तलाश मे
अनेक भ्रम गूथे हैं सत्य
अमिट सत्य की
मात्र पहचान जानता
विभ्रान्त हुआ हूँ
दो भिज्ञ सत्यो बीच
जीवन ओर मृत्यु का सच
बीच का अंतराल
कहता हूँ खालीपन
जीवन नहीं हैं यह
सत्य की पहचान विहीन
केवल जीना
भ्रान्तियो का बियावन हैं यह
ओर यह खालीपन
जीवन ओर मृत्यु बीच
जीवन का अर्थ तलाशता
भ्रमित जीता जाता हूँ
वे पल नहीं पाता
कि साक्षात्कार हो
सत्य का
ऐसे अकाट्य पल
कि कोई अर्थ पाऊ
कि जीता किस कारण हूँ
कोई सार मिलता नहीं
विमोहित हुआ हूँ
यहाँ बहते हैं घने
तृष्णाओ के झरने
करते जाते आशक्त मुझे
कि लगाता हूँ नित्य
जीवन का दाव
बहते झरनो की तरलता
आमंत्रण देती हैं मुझे
आओ मिलो गले
भिगो ना
मादकता के रस
नहीं ठहरा जाता
सम्मोहन से आशक्त
उतर जाता हूँ घने नीर
जहाँ अजनबी तृष्णाऐ
डालती हैं घेरा चारों ओर
फैलाती जाती जाल
कसता जाता चिकंजा
छटपटाहट होती दम घूटता सा
संघर्षरत हूँ
नहीं पाता हूँ किनारा
अब डूबना ही नियति मेरी
आकंठ भराव जल का
भीतर घूटता हैं
मृत्यु का जल
श्वास रूकी हैं मेरी
अब अदृश्य हुआ हूँ
कदम बढते हैं अदृश्य की ओर
खालीपन से छूटता जाता विमोह
विवश हुआ बढता हूँ
मृत्यु के सत्य की ओर
अब कसमकस नहीं रही
जीने की
निढाल हुआ जाता हूँ
अंतिम यात्रा सत्य की
शायद सत्य की गुन्जाईश का
यह आखिरी सोर
सत्य पाया सा
बढता हूँ अंतिम सत्य की ओर।
छगन लाल गर्ग ।

मुडो भीतर ।

बहुत हो गया
अब थोड़ा मुडो ना भीतर
छोड़ो भी अब
करना वर्गीकरण
विवेक सार को रहने दो
कि करता रहे विश्लेषण
परख तो हो
पदार्थ की प्रकृति
गुण दोषों का विश्लेषण
जितना कर पाओ
वक्त की रफ्तार के साथ
कदम भरते जाते
अच्छा हैं
पर लडखडाते क्यों हो
अपने आप से
जब मिलती हैं अजनबी चौट
प्रकृति की
यह विवेक मेरा अपना
यही दगा दे जाता हैं
अंतर लगी यह चौट
विवेक नहीं मिटा पाता
नहीं आता काम
तर्क विश्लेषण पदार्थो का
जीवन नहीं जीता विवेक
तरल भावो का जोखिम
नहीं लेता विवेक
कितना अजीब हैं
दो पाटो का यह जीवन
कि विपरीत पाटो बीच
फसा सा हैं यह मानव
जीने के रास्तों की तलाश मे
वक्त की रफ्तार बीच
घिसता जाता
मिटता जाता हैं प्रति पल
ओर चेतना के दीये
विवेक की चट्टानो मे
बिना तरल ईधन के
जले भी तो कैसे
अभिशाप हैं जीवन
कि तडप रहते भी
विवेक जीता विश्लेषण करता
रह जाता हैं खुद का विश्लेषण
हुए बिना अधूरा सा
नहीं पाता विपरीत समय मे
खुद का भी सहारा
नही हैं वस्तु जीवन
कि हम विवेक के पलडो से
तोल मोल करे
ऊँचा नीचा स्वयं को
बनाते मानते जाये
खुद भी अन्य भी
पैमाने खरे नहीं होते
वस्तुओं ओर विचारों का
जीवन भर का संकलन
बदलता जाता
नित रूप नये
प्रतिपल भ्रमित हुए
असलियत की तहे ढूँढते
विवेक की बैशाखी लिए
कि प्रकृति की हल्की सी करवट
ढहा देती हमारे विवेक के किले
ओर विवेक हमारा
करता जाता विश्लेषण
पदार्थ ओर प्रकृति रहस्यो का
ज्ञान का दंभ भाता हैं मुझे
विलग करता गरिमा देता
चढ़ता हूँ इस पर प्रति पल
इतराता भी हूँ
बड़ा अजीब हूँ मैं
ऊँचा नीचा भी होता हूँ
ऊहापोह जीता हूँ
पर कहो ना
यह जीना सत्य तो हैं
कि भीतर का रस पाये बिना
मेरा विवेक ठौस हुआ हैं
विवेक का स्त्रोत बाहर नहीं
पदार्थ नहीं
वर्गीकरण विश्लेषण नहीं
भीतर भरा हैं
भ्रमित हुआ सा बडप्पन लिए
विवेक का असत्य
जीता हूँ
मेरे विवेक जीवन रहते
मुडो भीतर ओर जीओ
शायद सत्य जीना
आ सके।
छगन लाल गर्ग।

Thursday, 3 December 2015

अमिट यथार्थ ।

भीतर हूँ कमरे मे
मोटी दीवारों का पुराना कमरा
सभ्य बनाया हैं मैने
छत पक्की कर आया हूँ सभ्यो की कतार मे
खपरे  तले गुजारा जीवन
थोड़ा शोभा पाया हैं
कमरे की तरह
पर महँगाई की मार झेलता जीवन
नही खोल पाया खिड़किया
विवश हूँ धूप बिना की सीलन
झेलना कमरे की
बाहर से पक्के मकान से
गरिमा पाता हूँ
ठंडक हैं भीतर
कंपकंपी छूटती हैं
परिवार के आवागमन से
दरवाजा खुला हैं
मच्छर काटते हैं
चुभन होती हैं खुजलाता जाता हूँ
नही मिटती चुभन
ठीक वैसे जैसे
भीतर के सत्यो को
तर्को के मच्छर काटते
चुभन देते हैं
सत्य की तिलमिलाहट के साथ
बाहर देखता हूँ
प्रखर दोपहरी की धूप
निकल आता हूँ बाहर
पाता हूँ सूर्य की प्रखर रश्मिया
मच्छरो की चुभन
शिथिल हुई हैं
यह प्रखर उष्मा भाती हैं
ठीक वैसे ही
जैसे अमिट सत्य
भागते दिखते हैं
तम तर्क ओर अहंकार के मच्छर
चेतन जगाता सा
प्रखर ताप
ठावस पाता हूँ
विजय को शास्वता से
मिटना ही होता हैं
असत्य के मच्छरो को
सत्य के ताप से
मिथ्या तर्क ओर अहंकार के बीज
सत्य ताप से मिटते
साबित होता हैं
अमिट हैं सत्य का यथार्थ ।
छगन लाल गर्ग।

गंदला पानी ।

झिझकता नहीं
कह देता हूँ
जो हूँ आवरण भीतर
चुभते हैं
वाचिग मशीन का पानी हूँ
गंदला हुआ
सामर्थ्य समाया मैल लिए
रंग बदलता सा
बहने लगा हूँ
सड़क के किनारे
परिवार के सारे कपड़े
साफ किये
गंदगी भरा हूँ
साफ़ किए कपड़े चमक देते
सुखते हैं
सूर्य रश्मियो से
निखरते चमक देने लगे हैं
ओर मैं
गंदगी पूरी लिए
बहता हूँ नीचे की ओर
काम अपनों का
अशुद्धता पहने नीचे की दिशा
अस्तित्व समाप्ति की ओर
हाथों मे झाडू लिए
सफाई करती सभ्यता रानी
देती हैं झटके झाडू के
सड़क साफ़ का उद्योग करती हुई
राष्ट्रीय सफाई अभियान की तरह
मुझमें मिली अपनों के तन कपडो की गंदगी
फैल चुकी हैं सड़क पर
सड़क को नम किए
नही हैं अब अस्तित्व मेरा
हूँ आभास मात्र
खूब हुआ उपयोग मेरा
ओर चमक देता रहा
मेरे आश्रित परिवार को
आज हुआ हूँ अशुद्ध
अस्तित्व खोया सा
उपेक्षित हूँ अपनो से
झटके झाडू के खाता
गुजारता हूँ बुढ़ापा
एक अवशेष हूँ समय का
मिटता जाता हूँ
समय के साथ ।
छगन लाल गर्ग।


ख्यात सृजक।

नहीं हूँ ख्यात
अभी नयापन भी ओर नौसिखियापन
डरता हूँ अभिव्यक्ति देने से
प्रयास मे ही पडते हैं हथोडे
भावनाओं पर
ओर चौट खाती जाती अभिव्यक्ति 
बिना पहचान 
अभिव्यक्ति की गुणवत्ता के
बदल जाते हैं मापदंड 
निरर्थक हो जाती सत्यता भी
अनुभूति की
यह एकाधिकार सृजको का
देता जाता दंश
ओर नहीं हो पाते
चौटिल अस्तित्व के भीतरी भाव
अभिव्यक्त
जब तक की नामचीन सृजक 
नही 
हजारों यथार्थ देती आहे
तौडती हैं दम
बिना अभिव्यक्त हुए
मेरी तरह
सामान्य व्यक्ति का दर्द 
अभिव्यक्ति देने का हकदार नहीं 
उनकी अभिव्यक्ति का सत्य 
सत्य नहीं 
नक्कार खाने की तूती 
नकारा आवाज करती
परिपक्वता न सही 
सत्य तो हैं 
अब सुनना इसका
अपनी अस्मिता का सौदा हैं 
हमारी आहो का दर्द 
सामान्य कैसे 
असामान्य सृजक हम
हमारी आहे काबिल हैं 
अभिव्यक्ति की हकदार भी
बौने व्यक्ति का अनुभव 
ओर अभिव्यक्ति 
समझ मे नहीं आती
हम हैं ना परिपक्व 
अर्से से इनकी आहो की
अभिव्यक्ति तो करते हैं 
यही तो हैं सत्य 
इनकी आहो के दम पर बनती 
हमारी आहे
अन्यथा हमें कहां पहचान 
क्या होते हैं दर्द 
अभिव्यक्ति का हक हमारा
हमारे पास हैं तरकीबे
भावों के अनुरूप
सजाते हैं पोस्टर
उभारते हैं भाव
कविता का क्या 
देती रहेगी भाव
पोस्टर के सहारे
नामचीनो की यही तो खासियत
अब ये नोसिखिए 
अरे भाई हम हैं 
कर लेंगे 
कविता वविता
पहले पाठक बनो हमारे 
वैसे ही आजकल 
पाठक मिलते नहीं 
तुम मत घिसो शब्दों को
हम हैं ।
छगन लाल गर्ग।

Wednesday, 2 December 2015

उड़ान ।

ऊँचा उठा हूँ मैं
निगाहों मे आता कम हूँ
छोटे ओर बौनो की पहुँच से हुआ हूँ पार
हुआ हूँ समय के पंखों पर सवार
उडता हूँ अंतरिक्ष
देता हूँ पहचान
तुम्हारे अस्तित्व की
कितने अविकसित हो तुम
यह उड़ान हम सी
नसीब नहीं तुम्हारे
बलिदान दिये हैं हमने
तभी उठे हैं ऊँचे इतने
ओर हो सके सवार
समय के पंखो पर
ऐसे बलिदान खरीदने होते हैं
खरीद पाओगे तुम
बिकते हैं भारी किमत
चुकानी होती हैं अस्मिता
मानवता का गुमान
बनना होता हैं गुलाम
तभी मिलती हैं असली पहचान
हुआ जाता हैं सवार
समय के पंखो पर
नहीं जरूरत
विवेक या गुणवत्ता
इन्हें केवल शब्दों से कंठस्थ किये
उगलना हैं
यही बलिदान हैं
पृष्ठभूमि हैं यह
इसी योग्यता से तय होता हैं
उड़ान का रास्ता
अब वक्त तो लेगा
सोचना होगा दस बार
प्रयास का बलिदान भी होगा
तलाशने होगे समूह
प्रशंसकों के
सभी तरीके लेने होंगे काम
भीतरी संघर्ष झेलना होगा
संवेदना मिट जाय
समर्पण भी करना होगा
तन मन ओर धन का
तभी पाओगे असली प्रशंसक
तैयार होगी भूमिका
जहाँ से उड़ान ले सको
आज की उड़ान का
असलीपन
शायद इसी रास्ते बिकता हैं ।
छगन लाल गर्ग।


Tuesday, 1 December 2015

बेभान हैं घाव।

बेभान हैं घाव मेरे
सीमा पार हुआ रिसते रिसते
अब बिना रिसे बढ़ जाता हैं
घावो का दर्द
यह सिलसिला बना हैं जीवन का
बन चुका हूँ ठोस धरातल
अहसास जाता रहा
बन चुका हूँ पूल
कि ठीक बीच मे नीचे
बहता बहता जाता स्त्रोत
बिना भिगोये मेरा अस्तित्व
बन बैठा हूँ कठोर धरातल सा
कि आवागमन होता रहे
ऊपर मेरे
दौडती रहे गाड़ियाँ
अपनी रफ्तार के साथ
लगातार देती रहे
गति का परिचय
ओर पुरा करें
अपना सफर
गुजरते रहे भार वाहन
सामर्थ्य से अधिक भार लादे
दौड़ते रहे सामर्थ्य बल के साथ
ओर घिसते रहे मेरा तल
माध्यम तो हूँ
छाती काम तो आती हैं
कि पाये मंजिल रफ्तार लिए
अच्छा हैं
निराशा के कदम भी
छूते हैं मुझे
एक गहरी हताशा लिए
गुजरते जाते हैं मुझ पर
जिन्दगी की नई सुबह
 पाने की आस लिए
आधार हूँ उनका भी
संभलते चलते
हताशा भरी जिन्दगी
सौन्दर्य चाह के रसिक
उन्माद लिए पकडते हैं कान मेरा
मजबूत हाथों से
कि कहीं गिरे नहीं
सौन्दर्य धारा मे
निहारते जाते
बहती सरिता की गति
निर्मल नीर प्रेरणा सौन्दर्य  लिए
समन्वित हुआ आकार पाता
चित उनके
लहरा उठते हैं भाव
मन व जल की गति के साथ
कई बार अंकुर लेते हैं नेह बीज
होते जाते हैं घने
ओर बन जाते हैं
जीवन के संबल
अलबत्ता घाव मेरे ही रिसते हैं
बेभान सा धरातल बना हूँ
पर नहीं हैं वेदना
तस्सली पाता हूँ
सार्थक हुआ जाता
निर्थक घिसना मेरा
जीवन की गरिमा से ओतप्रोत
सार्थक पर मिटता जीता
अस्तित्व पाता हूँ
रिसने दो घाव
बैभान जीवन मेरा
भाव देने लगा हैं
जीवन की सार्थकता का ।
छगन लाल गर्ग।




संदर्भों का सच।

संदर्भों का सच
प्रकट करता हैं जीवन
क्रिया प्रतिक्रिया मे
जब जीने की सार्थकता देते हैं संदर्भ
ओर खीचते हैं लकीर
संयमित आचरण
 जीवन जीने की
हर आचरण को संयमित
 ओर
संदर्भों से जीने की शैष्टा
नहीं हो पाती फलीभूत
एक अंतहीन कसमकस बीच
गुजरता जाता हैं जीवन
कारणों की सच्चाई
संचय जाल मे गूथी सी
नहीं दे पाती तर्क
गहराई तलाशता गूथ जाता हूँ
स्वयं भावनाओ की श्रृखला मे
कि समझ नहीं आता
कारण
संदर्भों की असत्यता
या कि यथार्थ की जटिलता
संदर्भ घनीभूत होते जाते
वक्ताओं के प्रवचनो मे
ओर पाते हैं प्रति क्रिया
तालियो की गडगडाहट ध्वनि घनी
या कि सुबह शाम
आराध्य की आराधना निमित्त
कथा वाचको के प्रवचन तक
जहां अनमने श्रौता
आस्तिकता का प्रदर्शन करते
ऊघते आकुलाते
भाव विभोर होने की दशा का
करते जाते तमाशा
असत्य ही सही
करते हैं देखा देखी का सत्य
असलियत भाव
कहां पाता हूँ संदर्भों मे
पहचान बिखेरे शब्द
होते जाते हैं मृत
जीवन यथार्थ नहीं लेते
संदर्भों का सत्य
जीवन बन साक्षी बने तो
शायद निखरना हो जीवन का
परिवर्तन बेहोशी भरा हैं यह
हो रही हैं
नये अर्थ तलाश की खोज
संदर्भ शब्दों की
बदलती भाव धारा
असली अर्थो को धत्ता बताती
देती जाती नये अर्थ
ओर आते हैं नये संदर्भ
तथ्य ओर साक्ष्य लिए
जीवन का हर पल
अपना बनता अपना सत्य जीता
आज का अति प्रबुद्ध मानव
भूलने की सभ्यता तले
सिसकते हैं संदर्भ
ओर बनती जाती जिन्दगी
बोझिल ओर बेहोश
शब्दों की चमक
फिकी हुई हैं पर मिटी नहीं हैं
असलियत यह हैं कि
शब्द चमक तो हैं
पर जिन्दगी नहीं देते
यह ससीम जीवन
न गूजरे उलझनों के भंवर
जीता हूँ पल
जैसा मिला स्वीकारता
ओर ढूँढता हूँ
असलियत के बीज
कि अंकुरित हो जीवन का पौधा
हरा रहे
करता हूँ सामर्थ्य का बलिदान
ओर पाता हूँ अपना सच
जो नहीं मेल खाता
संदर्भों से
पर देता हूँ आदर संदर्भों को
रखता हूँ हृदय के पास
कमीज की जेब मे
उपयोगी बनते हैं
जब साबित करना होता हैं
स्वयं को विवेकी आस्थावान
इस्तेमाल कर लेता हूँ
यह हैं संदर्भों का सच
अनेको प्रश्न देता हुआ ।
छगन लाल गर्ग।






Monday, 30 November 2015

उघडे नहीं हो।

उघडे नहीं हो
सुरक्षित रहे हो
बाहर की तपन
हवा ओर बरसात का बरसना
छुआ नहीं तुम्हें
बना हूँ आवरण
मैं तुम्हारा
मोटा हूँ
अहसास नहीं होने देता तुम्हें
ताप वर्षा ओर तपन का
सहता हूँ मैं
कि तुम्हारी चमक कायम रहे
नये ताजे बने रहो
आवरण हूँ मैं तुम्हारा
पर अब लंबे अर्से बाद
जर्जर हुआ हूँ
कट फट गया हूँ
कहां छोड़ते हो मुझे
उघड रहा हूँ मैं
अस्तित्व उपयोगी नहीं रहा मेरा
पर ओढा हैं अब भी तुमने
अंतिम श्वास तक इस्तेमाल का इरादा तुम्हारा
गिनती श्वास लिए
विपदाओ से झूझता हूँ
तुम्हारे लिए
हर बार की तरह
सहन हो पाएगा
प्रखर आती हैं ऑधी
विनाश लिए
मिटना तय हैं
पर तुम भरोसा कहां छोड़ते हो
तुम्हारा अस्तित्व
सोचते काम्पता हूँ
क्या होगा
तुम्हारी चमक तुम्हारा सौन्दर्य
भर जाता हैं मन
भीतरी जीना तुम्हारा
कैसे हो पायेगा
कहां से आयेगा विश्वस्त आवरण
अच्छा होता
आवरण नहीं होता मैं य
स्वयं झुझते परिपक्व होते
परिपक्व हुए बिना
अबोध मिट जाना
क्या त्रासदी नहीं हैं मेरी
सुनो अगर जीवन चाहते
आवरण हटाओ
जीवन खुद के संघर्ष तले जीओ
समय रहते सुविधा जीना छोड़ो
बनो खुद के लिए
खुद ही आवरण
निकलो बाहर
उघडो संपूर्ण अस्तित्व के साथ
जीओ खेत के अनाज की तरह
यह जीना ही सार्थक होगा
अस्तित्व साबित किए बिना
जीवन जीना कैसे कहूँ ।
छगन लाल गर्ग।


Sunday, 29 November 2015

जला दी भावनाएँ ।

जलते देखा मैंने
भावनाओं को
मेरी अपनी
हृदय का बिखरापन समेटे
जीती रही
बिखरे कागजो मे
सिमटी सिमटी
झिझकती रही
अभिव्यक्ति पाने से
विवश रही अव्यक्त रही
अधूरापन लिए भी
जीना चाहती रही
विकल दशा मे भी
करती रही पूर्णता पाने का अभ्यास
हृदय के कोरे कागज पर
अमिट हुई
अंकित हुई
समूचा सतह घेरे जमी रही
कैसे मिटती
मुश्किल था मिटा देना
हृदय का कागज
नष्ट होता
यदि प्रयास मिटाने का होता
लंबा अर्सा बिता
अंकित भावों को इकजाई करने मे
पर हर भावना रखती अस्तित्व
प्रथक अपना
स्थाई अस्थाई भावों का मेल
बेमेल बनता
जुडने का परिणाम कैसे पाता
होता रहता
नित संघर्ष एक दूसरी के साथ
भीषण बंवडर
उमडने का भय
बोझिल हुआ जाता कि जी सकू
थोड़ा सा
खूब आजमाता रहा
पिरोने मे एक लय होने मे
समूचा अस्तित्व
कि पा जाऊ भावनामय
जिन्दगी
हो जाय जीवन कविता मय
अधूरा ही रहा मैं
ओर मेरा प्रयास
न हो सका सपना पूरा
नेह भी प्राण भी अस्तित्व भी
समर्पित करता रहा
काम नहीं आया
भावनाएँ अपूर्ण रही
जिन्दगी कविता नहीं हुई
विवेक उभरता रहा
अस्तित्व बताता
देता जाता मुझे संबल
नया रंग नया रूप
कि बन जाय मिसाल
विवेक भावना का समन्वय
संगम हो घना
तोल मोल बिना का
न हो सका
हारा सा
स्वीकार था अपूर्णता जीऊ
आधी अधूरी भावना संग
जीना चाहता था मैं
पर यह विवेक
वर्चस्व लिए चाहता हैं जीना
चकाचौंध भरी जिन्दगी
समय बंध प्रयास के पल
बख्शे मुझे
ओर अब हारा हूँ भावना से भी
विवेक से भी
जडवत हैं अस्तित्व
दर्द संजोये
अपने ऑखो के सामने
विवेक जलाता जाता
मेरी आधी अधूरी भावनाएँ
भावनाओं के जलते पुलिन्दे की तपन
भीतर तक सेकती हैं
मुस्कराते विवेक को देखता हूँ
यह तपन ओर बढती हैं
असंभित हूँ मैं
कि जीता भी हूँ ।
छगन लाल गर्ग।



संकेत अनंत आता।

संकेत अनंत आता
अन्तराल शून्य भरता आता
उठने लगे अब ओर विस्तृत
बादलों का साम्राज्य लेकर
भाव देते रहस्य कहते
सिलसिले हैं अनंत के सब
श्याम वर्ण रंगे घने हैं
बादलो के रूप लेकर
कोई स्थिर कोई भार गंभीर
चंचल चित उमड ढकते तन चले अब
घेरते जाते उछाह भर
चित सागर के किनारे
उछाह भरी लहरों को धूमिल करते
बना रहे अब खुद के अनुरूप
चित सागर किनारे आकर
श्वेत सत उछाल देते बन जाते फेन
ढकते जाते उफान सीमा बन
संकेत आता अब किनारों को
रिसते हैं पिघलन सागर से
तरल अस्तित्व बन जाता प्रति पल
अचेतन गति अदृश्य बहती
स्थिर रहे इस भूतल मे
जन्म पाती यह गति
स्थिरता के आँगन मे
इसी आँगन से मिलती ऊर्जा
तरल बन उभरती आसमानो मे
घटा बन अब संकेत घना
रसधार बरसाती रेत हुए तन मे
चित दरिया बन बन निखर उठा हैं
विलय निमित्त अनंत तुझमे
ओर भी हुए हैं क्या
विलिन चिन्ह चित देख रहा
पदचिन्ह खोते रहे क्या
अनंत तेरे आगोश मे
हो रहा हूँ
मिट रहा हूँ पदचिन्ह पहचानता
ओर बन रहा हूँ
मैं अनंत
नहीं हैं यह करूणालय
रसानन्द का सागर बहता
न हूँ मैं
न कोई आभास भी
यह प्रकृति होती जाती
विलिन मुझमें मैं उसमें
मिट जाता हूँ मैं
अनंत का संकेत
नहीं अब मैं हुआ जाता हूँ अनंत ।
छगन लाल गर्ग।




Saturday, 28 November 2015

अचेतन मेरे ।

अचेतन मेरे
निर्मलता का घनापन छिपाये
रहते हो भीतर
अथाह पायी हैं गहराई
सागर सी
रहस्यमय हो तुम
अव्यक्त हैं अस्तित्व
संकेत देते जाते
ओर अनुकरण का अनुगामी बना
मैं तलाशता जाता हूँ
जीवन के मायने
रह रह जाता हूँ अबूझ
चेतन संसार के आशक्ति मे फसा
रहस्य का बिम्ब उभरता
अति सूक्ष्म
भीतरी दृश्य महसूसता हूँ मैं
परमाणु बन लेते हो आकार
अति कोमल सुगंध निर्मित
तन मन हो जाता सुरभित मेरा
असीम सौन्दर्य का पारावार
लहराता देता हैं भावनाओं  की तंरग
खिलते जाते अनंत कुसुम
असीम सौन्दर्य लिए
हो जाता अस्तित्व मेरा
द्रव्य सा नमनीय
तभी पाता हूँ मैं व्यक्तित्व का आकार
राग विराग मंथन लेता हैं अंकुर
देता जाता जीवन नवनीत
ओर उभरने लगते हैं राग
वहीं देते मुझे जीवन लय
लेने लगता प्राण ऊर्जा
उतरने लगता हैं घना संगीत
हो जाता हूँ अति विरल
द्रव्य सा
उठती जाती सतरंगी हिलोरे
मादकता गाती रस मदमाती
ऊँचाई नापती अनंत की
दीदार करती हैं दिव्य का
बाहरी बिम्ब होते रहते धूमिल
परिवर्तित होते अलौकिक आकार
निर्लिप्त हो जाता मेरा चेतन संसार
अचेतन मेरे
बान्धता जाता हूँ डोर तेरी
स्थूल सृष्टि से
ओर होता जाता स्थूल भी
अलौकिक सौन्दर्य आगार
यह दृष्टि
अचेतन पल निधि मेरी
कि हो जाता हूँ मैं सृष्टि पार
डूबता हूँ विरल नेह सागर
गून्थता जाता हूँ
पावन भावों का संसार
हो जाता हूँ ससीम पार
पर यह चेतन घेरता
बार बार
परिणिति का आभास
देता जाता तुम्हारा ही
विराग राग
महसूस होता फिर
हुआ जाता हूँ मैं
अस्तित्व विहिन
न देह न सृष्टि
अपरिमित पसरा घना
सन्नाटा
सार हीन अर्थ हीन
हो जाता हूँ
अचेतन तेरा विराग बिम्ब
उमडा संसार रीता हो जाता
नहीं पाता हूँ ठौर
हल्का हुआ बहता हूँ
पवन संग
नापने लगता
चेतन अन्तराल
मिट मिट जाता अस्तित्व
अचेतन हुआ हैं
मेरी चेतना का राग
उभरने लगी रे संगीत वीणा
राग लहरियो मे
खो खो जाता अस्तित्व मेरा
मेरे अचेतन आओ
कि जले
मन मंदिर के पावन दीप
ना घेरे चेतन मुझे
राग महासागर मिलू
अचेतन ले चलो मुझे ।
छगन लाल गर्ग।






Friday, 27 November 2015

संध्या आमन्त्रण ।

आओ संध्या
असीम कालिमा लिए
प्रवेश करो धीरे धीरे
आने दो धुन्धलापन
घर के भीतर
सूर्य की रश्मियो का मद
उतरता जाता
उतरने दो
फैलाओ धुन्धलका
करो अपने काल अंधेरे को साकार
पर मैं बूझने नहीं दूँगा
प्राणों का दीया
लघु अस्तित्व ही सही
अपनी गरिमा देता
जल उठेगा मेरा रोशन  दीया
नहीं रखता अपनी ज्वाला
तो क्या हुआ
अस्तित्व क्षमता रखता
जगाता हैं भीतरी रोशनी
नहीं करता प्रखरता का दावा
पर रखता हूँ दम
मिटाता हूँ भीतर का अंधकार
मेरे घर की कालिमा
बाहर के अंधेरे
नहीं डरा पाते मुझे
नही क्षमता
बाहर अंधकार मिटाऊ
तो क्या हुआ
संकेत हूँ मैं
तुम्हारे नाश का
देखते हो रूप मेरा
निखरा सा कंचन सा
जलता हुआ
तुम्हें जलना निखरना कहां आया
फर्क हैं
हम दोनों बीच
साफ साफ़ सतही
मेरा जलना उष्मा बनती
प्राणों की
टिमटिमाना मेरा संघर्ष
तुमसे
रोशनी जिन्दगी हैं मेरी
अंधेरे का खेल कहां
केवल सन्नाटा तुम्हारा
मौत सा
जीवन के लक्षणो से हीन
जड हो तुम
तुम्हारी क्रिया केवल एक
अंधकार
मैं हूँ क्रिया
संघर्ष ओर जीवन का चेतन
हारता कहां मेरा उजाला
आंशिक ही सही
देता हूँ चुनौती तुम्हें
जो करती हैं भयभीत तुम्हें
मैं हूँ
प्रकृति सूर्य का अंश
मानव चेतना का दीपक
मुझसे ही तपीस पाता हैं मानव
मिटाता जाता जीवन का अंधेरा
सूर्य के इन्तजार तक
देखो मेरा संघर्ष
एक काल सीमा के उजाले का बिम्ब
अंधेरे को मिटाते
सूर्य के अंश मे
रूपान्तरित होता हूँ
फर्क हैं ना
मेरे तुम्हारे का।
छगन लाल गर्ग।

कहां हो तुम ।

  कहां हो तुम
पद चिन्हो को तलाशता
मिथ्या हुआ मेरा चेतन
भ्रमित जीवन पवन सा
टकरता जाता शैल अचेतन बना
निस्सारता गहन बीहड का भटकाव झेले
निहारता जाता हूँ
सामर्थ्य की सीमा तक सृष्टि का हर कोण
कहीं बिम्ब दिखता नहीं
कहां तुम
आ पहुँचा हूँ सागर तट
जहां विरल हिलोरे
उमडती हैं अनंत की ओर
अपार हलचल बीच
अटक अटक जाता हैं चेतन मेरा
तन भिगोता हैं लहरों का नीर
यह उठाव ठहरा सा बसता जाता
चित मेरे
हाथों की अंजलि बीच
भरता जाता हूँ  सागर का विस्तार
सामर्थ्य को नकारता सा
बसाता जाता हूँ हृदय स्थल
यह भराव अनूठा तजूर्बा देता मुझे
नासमझी की समझ बनाता जाता अपनी
कहीं इस रूप तो नहीं हो तुम
द्रवित हूँ मैं
वेदना की अतिशयोक्ति का प्रमाण बना
हुआ हूँ विरल
बनना चाहता हूँ हम रूप तुम्हारा
विलय चाहता हूँ
जहां तुम हुए
चेतना को लिए लहरों का सौन्दर्य
भाया था तुम्हें
मेरे प्राण अपने मूल से प्रथक
विलग हुए एकलय नीर संग
मेरे जीवन की अविस्मरणीय
त्रासदी का सूत्र धार बने
ढूँढता हूँ तुम्हें
कहां हो तुम
सागर की लहरे ऊँची उठती
गगन छूती
मेरे अंश तुम साथ ही हो
लहरों भीगे बादल घेरना चाहते हैं मुझे
ऐसा तुम्हारे होने से होता हैं
आओ इसी रूप आओ
मिलो मुझे
एकमेक करो मुझे भी
लो तुम्हारे संग
बिना तुम्हारे अस्तित्व
अकारण हैं मेरा
देखते हो हवाओं का बहना
तुम्हें साथ लिऐ
ओस ढकती जाती मुझे
मेरे चेतन को
घनीभूत हुए हो तुम
प्रकृति के हर अंश मे समाहित
नहीं हूँ चेतन स्वरूप
मिला हूँ तुमसे
एकाकार हुआ हूँ
अंतराल मिटा मिटा सा
नहीं होता बिखराव
मेरा कि तुम्हारा
स्वप्नवत मैं भी
तुम सा।
छगन लाल गर्ग।



Thursday, 26 November 2015

विवेक रस ।

यह अच्छा हुआ
नहीं जीता अंतर्द्वंद
नहीं हैं मार
संवेदनाओ की भीतर
कि विवेक ओर आशक्ति बीच
होता रहे संघर्ष
श्रम तो झूझा
पर अब काबू मे हूँ
सपाट भाता हैं जीना
यह राग संवेदना
नहीं बहता भीतर
उलझन मिटी
स्त्रोत रोका हैं मैंने
अब निश्चित
विवेक जीता हूँ
अपनी क्षमताऐ जानने लगा हूँ
विचारों का
जगमगाता पूञ्ज
रोशनी के कतरे
चारों ओर से प्रकाशित
घेरे हैं मुझे
पहुँच पहुँच हुआ हूँ
ऊँचाई के शिखर
अभ्यास से पार हुआ
संवेदनाओ के जाल से
नहीं होता अब
लाचारो के शोषण का दर्द
विवेक की चिन्गारिया
जलती हुई
उजाडती जाती बस्तियों
गरीबों की
संतोष होता हैं अपने विवेक पर
तर्को का सामर्थ्य
बसाता जाता नये भव्य भवन
चर्चित हुआ बेखटके
घनी आबरू जीता हूँ
अब तुम्ही सोचो
स्मार्ट क्या यूँ ही होंगे
बिना गरीबों को नष्ट किये
विवेकियो का अन्वेषण
हो चुका
मानव सुविधा ऐसे ही आती हैं
मानव की बली पर
दिव्य होने का सपना
विवेक ही करेगा
तुम्हें सीखने होंगे गुर
सभ्यता के
अभी वक्त माहोल बना हैं
मानवता का
आओ जीए तब तक विवेक
जब तक जागरण न हो
आम का
भीतरी सत्य जानने मे
समय मत लगाओ
अंधेरा रहने दो यहाँ
अन्यथा विवेक रस
जल जाएगा
संसार संजोया बनावटी विवेक
मिथ्या करोगे क्या
पागल मत बनो
स्वार्थ रस मीठा
विवेक रस पीओ
निन्द खुलने तक ही सही ।
छगन लाल गर्ग।



Wednesday, 25 November 2015

बदलता दृश्य ।

नहीं रहा
कभी रहा
परिदृश्य प्रति पल
बदल देता समूचा
अस्तित्व मेरा
दृश्य हूँ मैं
अब नहीं कर पाता
अन्तर्मन आभासित तुम्हारे
दृश्य सौन्दर्य की अनूठी
अभिव्यक्ति
नहीं दे पाता रस डूबे
शब्दों की अभिव्यक्ति
अब दृश्य बदला
तुम्हारा
कलोल कल्पनो का घेरा
नहीं घिरता हैं हृदय
कि दू कोई दिव्य उपमा
असाधारण व्यक्तित्व भरे
सौन्दर्य को
अब दृश्य बदला हैं
खूब कहा
रमणीयता का भंडार तुम्हें
भीतर तक पहुँचने का दावा
करता रहा
प्रकट कहां सत्य
छलावा ही देता रहा
तुम्हें भी
स्वयं को भी
सारी अभिव्यक्ति
 बाहरी दृश्य की रही
यह नयी अनुभूति
दृश्य की नहीं
भीतर से महसूसता हूँ
मुश्किल हैं
क्या नाम दू इसे
फिर नाम देना भी
क्या सत्य होगा
बेनाम ही रहने दो
सत्य केवल अंश बना
उभरता जाता
कि अभिव्यक्ति मे प्रेम नहीं
छलावा हैं खुद जन्मा
आशक्ति का अधूरापन
निशब्द भीतर प्रवेश
अदृश्य की झलक पाता
जहां सत्य बदलता नहीं
दृश्य रज्जू के बिना ही
मेरे मित
आने दो भीतर
पाने दो किनारा
रहने दो अव्यक्त मुझे
यह दृश्य दूषित करता जाता
निश्छल सौन्दर्य
आधुनिक जीवन की तरह
मेरे मित
उभरता हैं अहो भाव
भीतर होता जाता प्रार्थना
होने दो
प्रेम यह
अदृश्य ही रहने दो।
छगन लाल गर्ग।










टहनियो की टीस।

 तरल जीवन की टीस
पाता हूँ
समर्पित प्रिय को
टहनिया
इनका सच
अप्रकट्य रहता
भोगती रहती मौन साधे
पीड़ा का अंबार
नहीं लेता कोई टोह
जानते भी
उपेक्षा कर जाते
माना हैं नियति इनकी
काम इनका
सृजन
कोमल कपोलो को
अपनी प्राण ऊर्जा देकर
ऊर्जा स्वयं की न सही
हो वितरण मात्र
संचय नहीं रखती
भीतर अपने खातिर
कि स्वयं हो सके
पुष्ट ओर सबल
नहीं हैं नसीब उसके
ओर अगर
पुष्टि की अभिलाषा
होती हैं विस्तृत
काट दी जाती हैं समूल
अस्तित्व संग कहीं
स्वयं की भावना
कि विस्तार स्वयं का हो
भूलना भाग्य हैं इनका
कार्य मात्र सृजन
कोमल कान्त पल्लव सहित
जन्म दे पुष्प व फल
जीवन मात्र
सृजन समर्पित
सृष्टि हैं स्वयं का बोध
स्वयं की इच्छा
ओर अस्तित्व
हाथों पराये
यह सच
रौदता जाता
हृदय की अस्मिता को
कि समाज हमारा
निर्दयी घना
रौदता जाता
नारी का सृजन
सृजक की पीडा की
गहरी कसक
टीस बनी सालती जाती
यह सच का चिन्तन
समाज को
स्वीकार करना होगा ।
छगन लाल गर्ग।





नहीं कारण।

नहीं कारण
मेरे आंशिक बिम्ब
कि तुम नहीं आते
पास मेरे
नहीं होते सहारा
मेरे जर्जर बुढ़ापे का
ओर इसी कारण
हृदय उथला हो गया हैं
या कि मेरे स्नेह की हिलोरे
नहीं लेती अंगडाईया
नहीं हैं कारण
होता हैं यह सब
तुम्हारा अपना भी परिवार हैं
अपने लिए जीना
प्रवृत्ति हैं हर इन्सान की
यह सब
अच्छा लगता हैं
सोचना तुम्हारे बारे मे
तुम्हारी सेहत
तुम्हारा संघर्ष ओर मिले परिणाम
तुम्हारे बाल बच्चे
अटकता हैं मन
वहां भी
दूर हो तुम
यह अंतराल भी सालता हैं
तुम्हारी तरक्की की
रफ्तार का वेग
मुझ तक भी पहुँचता हैं
होता रहता हूँ तरंगित
ओर गरिमा पाता हूँ
अपने होने का
आभास भी
भीतर ही भीतर
संवेदित भी होता हूँ
बाहर नहीं हूँ मैं पात्र
तुम्हारी चर्चाओ मे
तुम्हारा रूतबा महसूसता हूँ मैं
पर दुनिया को बताऊ कैसे
तुमसे छोटा होने का भीतरी अहसास
दुनिया पुत्र समझती हैं मेरा
मैं मूल रहते भी
आज अमूर्त जीता हूँ
सागर की अनंत लहरे
आज घनी ऊँचाई पर हैं
जो अवहेलना करती जाती
सागर की
निहारता हूँ अपनी ही लहरों को
ऊँची उठी
मोहक लगती
सूर्य रश्मियो के
सतरंगी नजारो मे लिपटी
भाता हैं मुझे
हर दर्शक लेता रहता
सौन्दर्य बोध
पर नासमझ भीतर मेरा
सूना सा
शान्त सा
भूला सा
कि तुम कभी मेरे भी थे
ये सतरंगी हिलोरे
उपजी मेरे
विस्तार पायी मुझसे
चेतना का मूल रहा हूँ
मैं कभी
भूल चुके तुम
चौधिया रोशनी के सच तले
अच्छा लगता हैं
पर फिर भी
तुम्हारे न होने से
कारण इसी
विशाल जल पाये भी
ऑखे स्तम्भित
रोती नहीं  हैं
मन का यह सागर
सुख गया हैं ।
छगन लाल गर्ग।

Tuesday, 24 November 2015

ऑसू मेरे ।

ऑसू मेरे
छोड़ो भीतर
उफान घनेरा
झेल न पाऊ
दुनिया देखे
बहना छोड़ो
रहो भीतर पर
बिन देखे ही
बहना जानो
विरल हृदय
मत छोड़ो रीता
उपजो नित नित
हृदय समाओ
भाव उफानमय
झिलमिल करते
समाओ घनेरे
जीवन मेरे
आमंत्रण नहीं यह
मेरे अपने
जीवन मेरा
तरल मोती बनाओ
विपदाओ के सागर मेरे
लहरों से नित
उन्माद भरो रे
मत रहना तुम
दुख से उपजे
अति सुख मे भी
चेतन बन जाओ
व्याकुल चित मत
करो बसेरा
भाव विभाव मे
बहते जाओ
निर्मल होता
आते जब हो
विनम्र हृदय हुआ
तनिक द्वार खुलने दो
अस्तित्व बसो तुम
प्रार्थना बन जाओ
उभरो घनेरे
अलौकिक बनो रे
जीवन जब तक
बरसो जी भर
कहां जुदा हो
मेरे बने हो
मुझको नित
पिघलाते जाओ
रहे ना जरा भी
अहंकार की शिला
हिम खंड यह जीवन
पिघलाते जाओ
द्वार खोलो मेरी
पावनता का
बसू करू विश्राम घनेरा
ऑसू मेरे
हो तुम सुख देय
दुनिया ले रही
प्रतीक हैं दुख के
तुम हो विवेकी
झुठलाते जाओ
प्रभु विरह का
माध्यम रहो तुम
घेरो रे घेरो
हृदय जगत का
द्रव्य भरी इन
महिन धारो मे
मिलता दिखता
मुझे किनारा
पहुँच पहुँच हुआ हूँ
पावनधार सहारे तेरे
द्वार प्रभु तक
ऑसू मेरे
छोड़ो भीतर ।
छगन लाल गर्ग।