जीवन तुम अभेद्दय हो
अछूये ही रीतते रहे
ओर मैं विकलता से ताकता रहा
तुम आते रहे
ओर घनी वेदना दिये
अनजाने ही ऑखो के ठीक
सामने जाते भी रहे
मैं फिर भी ठूठ सा
अभी भी हू
विकृत हुआ तिरस्कार सा
जीवंत हूँ
मेरे अस्तित्व का अंश
नवल कपोल उभरे
पले पुष्पाकार लेते ही
मुरझाये ताजापन लिए
ओर मै जर्जर अस्तित्व
बना हूँ रेगता जीता सा
प्राण रहते तो हैं
पर स्पंदन जाता रहा
अब तो भाप हूँ मैं
उबलता हुआ
मृत्यु सत्य नहीं स्वीकारा
मोह क्या केवल
मैं ही जीता रहा
ओर भी नही क्या
जीते हैं पुत्र मोह
अगर मैं भ्रम जीया पुत्र मोह
तो क्यों भरता था भीतरी कोना
संवेदना के जाल बार बार
नहीं जी पाता था
बगेर देखे उसका भोला मुखडा
पूर्णता पाता था अपनी
हे मेरे खालीपन
भरा ही क्यों तू
जब रहना ही था खाली तुझे
क्या हो मेरे जीवन तुम
जाना कि अभेद्दय हो
पर यह अहसास इतना घना
केवल मुझे क्यों
रे पुत्र सुख
तू होता हैं क्या
जीवन मे आता सुनता हूँ
साक्षात्कार हुआ नहीं
क्षणिक आभासित हुए
रहे कहां
क्या हैं आकार कि देखू तुम्हें
केवल अहसास का हल्का सा कतरा
ओर परिणाम अहसास
देते गये हो रूदन
तुम्हारा आना जाना
एक पल का ही सपना
फिर वशीभूत नेह तुम्हारे
क्यों कर गये
यह रूदन का दरिया
नित निर्झर सा बहता
पर न जाने रीतता क्यों नहीं
यह जीना तुम्हारा
ओर फिर परलोक गमन
गमन के पदचिन्ह
कहां हैं पुत्र
अभेद्दय तुम ओर अदृश्य तू भी
देखो तुम होंगे वहीं
जहां अदृश्य सृजक हैं
बहुत समीप होंगे तुम
कहो न मेरा भी
विनती करो ना मेरी ओर से
कि बुला दे अदृश्य मुझे
उस अ ज्ञात राह
जिससे तुम पहुँचे
देखो आवगनी की छूट लेना
करना संकेत
मुस्कान देना
भ्रमित अनुभव जिया हूँ
कहीं अदृश्य की राह
भटक न पाऊ
पहले पहुँचे हो न
पुत्र धर्म जरूर निभाना ।
छगन लाल गर्ग।
अछूये ही रीतते रहे
ओर मैं विकलता से ताकता रहा
तुम आते रहे
ओर घनी वेदना दिये
अनजाने ही ऑखो के ठीक
सामने जाते भी रहे
मैं फिर भी ठूठ सा
अभी भी हू
विकृत हुआ तिरस्कार सा
जीवंत हूँ
मेरे अस्तित्व का अंश
नवल कपोल उभरे
पले पुष्पाकार लेते ही
मुरझाये ताजापन लिए
ओर मै जर्जर अस्तित्व
बना हूँ रेगता जीता सा
प्राण रहते तो हैं
पर स्पंदन जाता रहा
अब तो भाप हूँ मैं
उबलता हुआ
मृत्यु सत्य नहीं स्वीकारा
मोह क्या केवल
मैं ही जीता रहा
ओर भी नही क्या
जीते हैं पुत्र मोह
अगर मैं भ्रम जीया पुत्र मोह
तो क्यों भरता था भीतरी कोना
संवेदना के जाल बार बार
नहीं जी पाता था
बगेर देखे उसका भोला मुखडा
पूर्णता पाता था अपनी
हे मेरे खालीपन
भरा ही क्यों तू
जब रहना ही था खाली तुझे
क्या हो मेरे जीवन तुम
जाना कि अभेद्दय हो
पर यह अहसास इतना घना
केवल मुझे क्यों
रे पुत्र सुख
तू होता हैं क्या
जीवन मे आता सुनता हूँ
साक्षात्कार हुआ नहीं
क्षणिक आभासित हुए
रहे कहां
क्या हैं आकार कि देखू तुम्हें
केवल अहसास का हल्का सा कतरा
ओर परिणाम अहसास
देते गये हो रूदन
तुम्हारा आना जाना
एक पल का ही सपना
फिर वशीभूत नेह तुम्हारे
क्यों कर गये
यह रूदन का दरिया
नित निर्झर सा बहता
पर न जाने रीतता क्यों नहीं
यह जीना तुम्हारा
ओर फिर परलोक गमन
गमन के पदचिन्ह
कहां हैं पुत्र
अभेद्दय तुम ओर अदृश्य तू भी
देखो तुम होंगे वहीं
जहां अदृश्य सृजक हैं
बहुत समीप होंगे तुम
कहो न मेरा भी
विनती करो ना मेरी ओर से
कि बुला दे अदृश्य मुझे
उस अ ज्ञात राह
जिससे तुम पहुँचे
देखो आवगनी की छूट लेना
करना संकेत
मुस्कान देना
भ्रमित अनुभव जिया हूँ
कहीं अदृश्य की राह
भटक न पाऊ
पहले पहुँचे हो न
पुत्र धर्म जरूर निभाना ।
छगन लाल गर्ग।
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