आओ ना तुम
प्रियतम मेरे
हृदय वीणा के स्वर लेकर
झृञ्कृत करो ना
राग मेरे खोये खोये
उफान उठता नित
पीर पीघली हुआ
पारावार प्रियतम
टूटी सीमा सारी
छाती सवार हैं
तट प्रियतम
पीर बुलबुले गर्माहट लेकर
ऊबल ऊबल कर
भाप बनते
आओ ना तुम
राहे नैनो की
थकी थकी अब
अहसास कोमल ऑसू के भी
जलन उठती
भरती कसक अब ऊर
आओ ना तुम
सुलग उठा रे
प्राण प्रियतम
स्मृतिओ का जाल घेरा
कसक देता
वेदना बन
टीस उठती
जल जाता रे स्पंदन
भूल भूलैया
बन चुका अस्तित्व
हूँ मैं क्या
नहीं कुछ भी बोध
आओ ना प्रियतम
दे दो ना बोध
लगने लगी अब
हर ओर विरान सृष्टि
फुल खुशबू
खो चुके हैं
बाग रौनक
खो चुके हैं
रात रोती जा रही अब
शबनबी बूँदो के ऑसू
आओ ना तुम
कि फूल खिले
रूदन दरिया
लहर उठे
कलियो मे स्पंदन हो ले
पल्लवन का राग छेडे
मंद अब रे राग मेरा
हृदय कोहरा हैं अंधेरा
नवल कोपल नेह
अब अंकुर ले ले
आओ ना तुम
रात रीती बात बीती
नवल प्रातः उषा बनो तुम
ऑगन बहो इस हृदय
जी भर
लज्जा सी लालिमा बनकर
आओ ना तुम
कि यह चित मेरा
सूखा दरिया
नेह रस का स्त्रोत बहे तो
झंकार नेह का गीत
हम गा ले
ओर फिर से
खंराश कंठ की
बार बार
दर्द भरी पुकारे
आओ ना तुम
भर चुका रे
प्रियतम मेरे
संचित नेह का
सारा सागर
शब्द बनकर अब
बहना चाहता
बहाऊ मैं कैसे
आओ ना तुम
संसर्ग तुम्हारा
स्मृति रमता
राग पीया अमंद
अधर विराग देता
अलको का छाया
तुम्हारा
मन फिर चाहता
गंध वहीं मलयज
हृदय भरना चाहता
स्पर्श का स्पंदन
रोम रोम बसता
आओ ना तुम
अब दे दो त्राण
उठने तो दो अब
अंतर मेरे
मधु की लहरे
हृदय भरे वहीं
टकराये रौर
चेतना मेरी अब
उन्माद डूबी प्रियतम
विलय चाहती रे
आओ ना तुम ।
छगन लाल गर्ग।
प्रियतम मेरे
हृदय वीणा के स्वर लेकर
झृञ्कृत करो ना
राग मेरे खोये खोये
उफान उठता नित
पीर पीघली हुआ
पारावार प्रियतम
टूटी सीमा सारी
छाती सवार हैं
तट प्रियतम
पीर बुलबुले गर्माहट लेकर
ऊबल ऊबल कर
भाप बनते
आओ ना तुम
राहे नैनो की
थकी थकी अब
अहसास कोमल ऑसू के भी
जलन उठती
भरती कसक अब ऊर
आओ ना तुम
सुलग उठा रे
प्राण प्रियतम
स्मृतिओ का जाल घेरा
कसक देता
वेदना बन
टीस उठती
जल जाता रे स्पंदन
भूल भूलैया
बन चुका अस्तित्व
हूँ मैं क्या
नहीं कुछ भी बोध
आओ ना प्रियतम
दे दो ना बोध
लगने लगी अब
हर ओर विरान सृष्टि
फुल खुशबू
खो चुके हैं
बाग रौनक
खो चुके हैं
रात रोती जा रही अब
शबनबी बूँदो के ऑसू
आओ ना तुम
कि फूल खिले
रूदन दरिया
लहर उठे
कलियो मे स्पंदन हो ले
पल्लवन का राग छेडे
मंद अब रे राग मेरा
हृदय कोहरा हैं अंधेरा
नवल कोपल नेह
अब अंकुर ले ले
आओ ना तुम
रात रीती बात बीती
नवल प्रातः उषा बनो तुम
ऑगन बहो इस हृदय
जी भर
लज्जा सी लालिमा बनकर
आओ ना तुम
कि यह चित मेरा
सूखा दरिया
नेह रस का स्त्रोत बहे तो
झंकार नेह का गीत
हम गा ले
ओर फिर से
खंराश कंठ की
बार बार
दर्द भरी पुकारे
आओ ना तुम
भर चुका रे
प्रियतम मेरे
संचित नेह का
सारा सागर
शब्द बनकर अब
बहना चाहता
बहाऊ मैं कैसे
आओ ना तुम
संसर्ग तुम्हारा
स्मृति रमता
राग पीया अमंद
अधर विराग देता
अलको का छाया
तुम्हारा
मन फिर चाहता
गंध वहीं मलयज
हृदय भरना चाहता
स्पर्श का स्पंदन
रोम रोम बसता
आओ ना तुम
अब दे दो त्राण
उठने तो दो अब
अंतर मेरे
मधु की लहरे
हृदय भरे वहीं
टकराये रौर
चेतना मेरी अब
उन्माद डूबी प्रियतम
विलय चाहती रे
आओ ना तुम ।
छगन लाल गर्ग।
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