रस भरा अतीत
स्मृति नहीं छोडता
आता रहता
झलक अदृश्य देता
विभ्रान्ति का गहन झौका
छलता रहता संचित सुख
कहां रहे कदम
कि अनुकरण हो
घने झंझावत मध्य
स्नेहिल सुकुमार लावण्य
शिकार हुआ हादसे का
नहीं पाता संकेत कहीं
किसे सुनाऊ व्यथा
व्याधि देती वर्तमान को
नव नीड का क्या करू
अकेलेपन का सार
नीड नहीं संवेदना चाहता
नहीं यह नही हैं
स्वार्थ जीती इन्सानियत
खो चुकी यह राग
वीणा तार झृकृत नहीं
असंतुलित हुए
नेह स्वर रहा कहां
बीत गया।
छगन लाल गर्ग।
स्मृति नहीं छोडता
आता रहता
झलक अदृश्य देता
विभ्रान्ति का गहन झौका
छलता रहता संचित सुख
कहां रहे कदम
कि अनुकरण हो
घने झंझावत मध्य
स्नेहिल सुकुमार लावण्य
शिकार हुआ हादसे का
नहीं पाता संकेत कहीं
किसे सुनाऊ व्यथा
व्याधि देती वर्तमान को
नव नीड का क्या करू
अकेलेपन का सार
नीड नहीं संवेदना चाहता
नहीं यह नही हैं
स्वार्थ जीती इन्सानियत
खो चुकी यह राग
वीणा तार झृकृत नहीं
असंतुलित हुए
नेह स्वर रहा कहां
बीत गया।
छगन लाल गर्ग।
No comments:
Post a Comment