नहीं कारण
मेरे आंशिक बिम्ब
कि तुम नहीं आते
पास मेरे
नहीं होते सहारा
मेरे जर्जर बुढ़ापे का
ओर इसी कारण
हृदय उथला हो गया हैं
या कि मेरे स्नेह की हिलोरे
नहीं लेती अंगडाईया
नहीं हैं कारण
होता हैं यह सब
तुम्हारा अपना भी परिवार हैं
अपने लिए जीना
प्रवृत्ति हैं हर इन्सान की
यह सब
अच्छा लगता हैं
सोचना तुम्हारे बारे मे
तुम्हारी सेहत
तुम्हारा संघर्ष ओर मिले परिणाम
तुम्हारे बाल बच्चे
अटकता हैं मन
वहां भी
दूर हो तुम
यह अंतराल भी सालता हैं
तुम्हारी तरक्की की
रफ्तार का वेग
मुझ तक भी पहुँचता हैं
होता रहता हूँ तरंगित
ओर गरिमा पाता हूँ
अपने होने का
आभास भी
भीतर ही भीतर
संवेदित भी होता हूँ
बाहर नहीं हूँ मैं पात्र
तुम्हारी चर्चाओ मे
तुम्हारा रूतबा महसूसता हूँ मैं
पर दुनिया को बताऊ कैसे
तुमसे छोटा होने का भीतरी अहसास
दुनिया पुत्र समझती हैं मेरा
मैं मूल रहते भी
आज अमूर्त जीता हूँ
सागर की अनंत लहरे
आज घनी ऊँचाई पर हैं
जो अवहेलना करती जाती
सागर की
निहारता हूँ अपनी ही लहरों को
ऊँची उठी
मोहक लगती
सूर्य रश्मियो के
सतरंगी नजारो मे लिपटी
भाता हैं मुझे
हर दर्शक लेता रहता
सौन्दर्य बोध
पर नासमझ भीतर मेरा
सूना सा
शान्त सा
भूला सा
कि तुम कभी मेरे भी थे
ये सतरंगी हिलोरे
उपजी मेरे
विस्तार पायी मुझसे
चेतना का मूल रहा हूँ
मैं कभी
भूल चुके तुम
चौधिया रोशनी के सच तले
अच्छा लगता हैं
पर फिर भी
तुम्हारे न होने से
कारण इसी
विशाल जल पाये भी
ऑखे स्तम्भित
रोती नहीं हैं
मन का यह सागर
सुख गया हैं ।
छगन लाल गर्ग।
मेरे आंशिक बिम्ब
कि तुम नहीं आते
पास मेरे
नहीं होते सहारा
मेरे जर्जर बुढ़ापे का
ओर इसी कारण
हृदय उथला हो गया हैं
या कि मेरे स्नेह की हिलोरे
नहीं लेती अंगडाईया
नहीं हैं कारण
होता हैं यह सब
तुम्हारा अपना भी परिवार हैं
अपने लिए जीना
प्रवृत्ति हैं हर इन्सान की
यह सब
अच्छा लगता हैं
सोचना तुम्हारे बारे मे
तुम्हारी सेहत
तुम्हारा संघर्ष ओर मिले परिणाम
तुम्हारे बाल बच्चे
अटकता हैं मन
वहां भी
दूर हो तुम
यह अंतराल भी सालता हैं
तुम्हारी तरक्की की
रफ्तार का वेग
मुझ तक भी पहुँचता हैं
होता रहता हूँ तरंगित
ओर गरिमा पाता हूँ
अपने होने का
आभास भी
भीतर ही भीतर
संवेदित भी होता हूँ
बाहर नहीं हूँ मैं पात्र
तुम्हारी चर्चाओ मे
तुम्हारा रूतबा महसूसता हूँ मैं
पर दुनिया को बताऊ कैसे
तुमसे छोटा होने का भीतरी अहसास
दुनिया पुत्र समझती हैं मेरा
मैं मूल रहते भी
आज अमूर्त जीता हूँ
सागर की अनंत लहरे
आज घनी ऊँचाई पर हैं
जो अवहेलना करती जाती
सागर की
निहारता हूँ अपनी ही लहरों को
ऊँची उठी
मोहक लगती
सूर्य रश्मियो के
सतरंगी नजारो मे लिपटी
भाता हैं मुझे
हर दर्शक लेता रहता
सौन्दर्य बोध
पर नासमझ भीतर मेरा
सूना सा
शान्त सा
भूला सा
कि तुम कभी मेरे भी थे
ये सतरंगी हिलोरे
उपजी मेरे
विस्तार पायी मुझसे
चेतना का मूल रहा हूँ
मैं कभी
भूल चुके तुम
चौधिया रोशनी के सच तले
अच्छा लगता हैं
पर फिर भी
तुम्हारे न होने से
कारण इसी
विशाल जल पाये भी
ऑखे स्तम्भित
रोती नहीं हैं
मन का यह सागर
सुख गया हैं ।
छगन लाल गर्ग।
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