Thursday, 10 December 2015

स्तंभित अभिव्यक्ति ।

क्यों रूक जाती हैं
अभिव्यक्ति
जब लाता हैं वक्त
मार्मिक वेदना का दौर
क्यों बाधित होता
अवरोध देता बान्ध देता
उफान लेते भावों का प्रवाह
अवाक रह जाती गिरा
शब्द थके से
नहीं लेते आकार
भावानुकूल
शायद शब्द यही विराम
लेते हैं
या नहीं दे पाये
पल के सत्य को शब्द
जब प्राण छोड़ देते
देह से संबंध
वहीं देह जिसे प्राण पण से चाहा
जीया सारे इमानो को
बलिदान किये
इच्छानुकूल देह सुख पाने मे
बान्धता रहा पापो की गठरी
नहीं हैं नियंत्रण
भाव ओर विवेक बीच
स्थगन क्रियाओं का
यह सत्य
अकल्पनीय
मुझे घेरता जाता
जीवन रहते भी
मृत्यु सा
जीवन तू बेबूझ
असामयिक मृत्यु मेरी
प्रवेश हुई घटना बन
जीवन तू सत्य हैं क्या
नही लगता
हम हैं
विचार हैं
सामर्थ्य हैं
कहां रहे हमारे
तमाम सिद्धांत
इस क्षण
सभी चिढाते जाते
विस्तृत हुआ सा स्वयं को
एकाधिकार पाता हूँ
अदृश्य का
सृष्टि पर संपूर्ण कब्जा
ओर जीया जीवन
निस्सारता के कुरूप आकार
खडा डराता मुझे
अब न शब्दों का साथ
न ही सिद्धांतो का
साथ निभाता
केवल रूदन
बताता जाता अनुभूति
मानव की औकात
पल की यह पीर
नहीं लेती अभिव्यक्ति
गहन चिन्तक
लंबी डिग्रीओ के स्वामी
नही रखते हैसियत
अभिव्यक्ति की
वक्त की नजाकत का बखान
अभिव्यक्ति का आवरण
उघडा हैं
कुरूप हुआ सत्य सारा
अभिव्यक्ति का
अकर्मण्य अस्तित्व
यही सत्य
रूदन ही सार जीवन
यही सत्य ।
छगन लाल गर्ग।

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