यह युग जन झंझावत झूझता रहता हैं ।
स्वार्थरत संघर्षों मे ही डूबता जाता हैं ।
उत्पन्न उसी कोख छल कपट होता हैं ।
मानव हृदय हीन हुआ विष नित पीता हैं ।।
पागलपन कहे इसे भी क्या समझाओ तुम ।
सुख चाहा धन जोड़ा क्या हैं धोखेबाज हम।
वासना नित बढती हमारी अब हैं हताश हम।
जीवन पायेगा संतुष्टि कभी आशा कहां तुम ।।
जीये कैसे डर का छाया नित मंडराता हैं ।
मानव डरता भी सुखहित कुकर्म करता हैं ।
रक्त संबंधी भी स्वस्वार्थ अस्तित्व जीते हैं ।
नहीं परवाह अपनों की बेमौत अपने मरते हैं ।।
अब हर कदम पर जिन्दगी जोखिम जीती हैं ।
जहाँ जाओ वहाँ अनहोनी कहानी मिलती हैं ।
भीतर चित मेरे गर्म जलती लकीर चीरती हैं ।
पावन चरित्र हो यह विश्वास अब हिलता हैं ।।
छगन लाल गर्ग।
स्वार्थरत संघर्षों मे ही डूबता जाता हैं ।
उत्पन्न उसी कोख छल कपट होता हैं ।
मानव हृदय हीन हुआ विष नित पीता हैं ।।
पागलपन कहे इसे भी क्या समझाओ तुम ।
सुख चाहा धन जोड़ा क्या हैं धोखेबाज हम।
वासना नित बढती हमारी अब हैं हताश हम।
जीवन पायेगा संतुष्टि कभी आशा कहां तुम ।।
जीये कैसे डर का छाया नित मंडराता हैं ।
मानव डरता भी सुखहित कुकर्म करता हैं ।
रक्त संबंधी भी स्वस्वार्थ अस्तित्व जीते हैं ।
नहीं परवाह अपनों की बेमौत अपने मरते हैं ।।
अब हर कदम पर जिन्दगी जोखिम जीती हैं ।
जहाँ जाओ वहाँ अनहोनी कहानी मिलती हैं ।
भीतर चित मेरे गर्म जलती लकीर चीरती हैं ।
पावन चरित्र हो यह विश्वास अब हिलता हैं ।।
छगन लाल गर्ग।
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