Friday, 25 December 2015

रूकती हैं गली।

 आगे रूकती हैं गली
ढलान उतरती
हो जाती पगडंडी मे तब्दील
वहीं आकार लिए
देने लगती
पथिक को संकरापन का अहसास
बिना संकरी हुए
कि रूके भीड़
करे तोल अपना
असंतुलन से पहले
कि यह ढलान रहने देगा इन्सान
जहां बेचना होता हैं इमान
नहीं छंटती भीड़
करती इन्तजार बारी का
ढलान का अंदाज
समाते अपने मनोमस्तिष्क
उसी अनुरूप
तन मन की सामर्थ्य शक्ति
तोलते ओर उतरते ढलान
जहां बहती हैं नद
आँकाक्षाओ की
ढलान बहती आँकाक्षाऐ
तरोताजा युग का सत्य
अपनी पावनता ओर मर्यादाओ
को समर्पित करता
उतरता जाता ढलान
आस्था लिए
वासनाओ की तृप्ति निमित्त
ओर यह वेग ओर बढता
जब समाहित होती जाती
समर्पित होती प्राण्जल आस्थाऐ
सभ्यता की चमक लेती
यह जीवन नद बहती जाती
ओर यह भीड़ गहराती जाती
गली के अंतिम छोर
आ चुकी
मानवता की भीड़
रूकना समझना छोड़
बहना चाहती
समतल गली का मोह
नहीं देता
ढलान सी ऊँचाईया
बिना ढलान उतरे
आज के युग
ऊँचाईओ को पालना
मृगतृष्णा हुआ ।
छगन लाल गर्ग।

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