Sunday, 27 December 2015

बीत रहा वर्ष ।

पगली जिन्दगी
संहाला कैसे अनुभव तूने फटा
बीत रहा वर्ष
देख ना जरा अंचल अपना
कितना आधी कितना भरा
भार लदा नहीं
संभाले रही क्या
वस्त्र तुम्हारा था जर्जर
फिर भी कुछ तो
संजोया होगा
दिखला दो ना वर्ष बीत रहा
अब फटा हैं वस्त्र तुम्हारा
अंचल दिखता रीता घना
क्या कुछ ज्यादा पा लिया क्या
जर्जर वस्त्र फटता रहा
जिन्दगी तडप खाती रही
वर्ष भर मंहगाई तले
ओर अधमरे  सपने
जीती रही बीत रहे वर्ष
यौवन का मतवालापन
सिमटता रहा जजबातो मे
सपने बिखर हवा हुए
ओर वर्ष कुण्ठित करता रहा
अब स्वागत हैं
नवल वर्ष तेरा
प्रभात लिए ही आना तुम
विगत का अंश मत लाना उषा
नव प्रभा बरसाना तुम
अन्यथा नहीं जी सकेगी जिन्दगी
फिर मत कहना कहा नहीं
सुन सको तो अभी सुनना
इसमें देरी मत करना तुम
नहीं दशा मे क्या होगा
यह समय नहीं पहले  कहता है
वक्त किसी का सगा नहीं
यह अनुभव हमारा कहता हैं
संक्रमण क्षण का अनुरोध
बीते रहे वर्ष
बोलता हैं
आओ असीम स्वागत हैं नव वर्ष
चेतनता लिए ही आना।
छगन लाल गर्ग।

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