Friday, 4 December 2015

मुडो भीतर ।

बहुत हो गया
अब थोड़ा मुडो ना भीतर
छोड़ो भी अब
करना वर्गीकरण
विवेक सार को रहने दो
कि करता रहे विश्लेषण
परख तो हो
पदार्थ की प्रकृति
गुण दोषों का विश्लेषण
जितना कर पाओ
वक्त की रफ्तार के साथ
कदम भरते जाते
अच्छा हैं
पर लडखडाते क्यों हो
अपने आप से
जब मिलती हैं अजनबी चौट
प्रकृति की
यह विवेक मेरा अपना
यही दगा दे जाता हैं
अंतर लगी यह चौट
विवेक नहीं मिटा पाता
नहीं आता काम
तर्क विश्लेषण पदार्थो का
जीवन नहीं जीता विवेक
तरल भावो का जोखिम
नहीं लेता विवेक
कितना अजीब हैं
दो पाटो का यह जीवन
कि विपरीत पाटो बीच
फसा सा हैं यह मानव
जीने के रास्तों की तलाश मे
वक्त की रफ्तार बीच
घिसता जाता
मिटता जाता हैं प्रति पल
ओर चेतना के दीये
विवेक की चट्टानो मे
बिना तरल ईधन के
जले भी तो कैसे
अभिशाप हैं जीवन
कि तडप रहते भी
विवेक जीता विश्लेषण करता
रह जाता हैं खुद का विश्लेषण
हुए बिना अधूरा सा
नहीं पाता विपरीत समय मे
खुद का भी सहारा
नही हैं वस्तु जीवन
कि हम विवेक के पलडो से
तोल मोल करे
ऊँचा नीचा स्वयं को
बनाते मानते जाये
खुद भी अन्य भी
पैमाने खरे नहीं होते
वस्तुओं ओर विचारों का
जीवन भर का संकलन
बदलता जाता
नित रूप नये
प्रतिपल भ्रमित हुए
असलियत की तहे ढूँढते
विवेक की बैशाखी लिए
कि प्रकृति की हल्की सी करवट
ढहा देती हमारे विवेक के किले
ओर विवेक हमारा
करता जाता विश्लेषण
पदार्थ ओर प्रकृति रहस्यो का
ज्ञान का दंभ भाता हैं मुझे
विलग करता गरिमा देता
चढ़ता हूँ इस पर प्रति पल
इतराता भी हूँ
बड़ा अजीब हूँ मैं
ऊँचा नीचा भी होता हूँ
ऊहापोह जीता हूँ
पर कहो ना
यह जीना सत्य तो हैं
कि भीतर का रस पाये बिना
मेरा विवेक ठौस हुआ हैं
विवेक का स्त्रोत बाहर नहीं
पदार्थ नहीं
वर्गीकरण विश्लेषण नहीं
भीतर भरा हैं
भ्रमित हुआ सा बडप्पन लिए
विवेक का असत्य
जीता हूँ
मेरे विवेक जीवन रहते
मुडो भीतर ओर जीओ
शायद सत्य जीना
आ सके।
छगन लाल गर्ग।

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