Wednesday, 23 December 2015

तो अच्छा ।

नहीं खुलती ऑख
तो अच्छा
अनजानापन देता
एकरसता का बोध
ओर यह जीवन
हो जाता निरापद
सरल स्वाभाविक
यह ज्ञान अपरिमित
भरता हैं शंकाओ का अतिसार
ओर अधिक भ्रमित विवेक के
मकड जाल मे फसता जाता
हर बार हर शास्त्र
मात्र शंकाओ के शास्त्र ही कहूँ
देता जाता गहन व्यूहजाल
नहीं पाता कहीं किनारा
कि जिना कैसे हो सफल
नही बनता यह ज्ञान
कुन्जी जीने की
देता हैं नित अमानवीय प्रतिस्पर्धा
कि मूल नेह रीतता जाता
ओर मानव नहीं
हम हो चुके कर्ता
बिना सामर्थ्य के
सामर्थ्य रखते मात्र विचारों का
यही कसक बन चुकी
जीवन हुआ जाता निस्सार
मेघा की मार तले
दब चुकी मानवता
नहीं खुलती अगर ऑख
तो अच्छा ।
छगन लाल गर्ग।

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