Wednesday, 23 December 2015

प्यासा ही रहा।

प्यासा हूँ मैं
संतुष्ट जीवन नहीं
अनंत चाह रहते
नहीं हुआ अहसास कभी
कि स्पंदन हुआ सुखो से
भीतर तक का रस
अधिक असंतुष्टि का सागर
लहरता रहा
हर प्रयास का सत्य
हर बार तृप्ति की आस
हर नये मोड को
अपना वर्चस्व देती
ओर पाती जाती
अतृप्ति की असीम कसक
रेत सी शुष्कता का विस्तार
नहीं हैं जीवन रस का सागर
वितृष्णा का भयानक बियाबन
भटकन का भंवर जाल
समझा ही भ्रान्त जीवन
असलियत आज भी नहीं
वहीं प्यास ओर अधूरापन
ध्वनि ओर देह की मधुरता
लहरों का बिखराव
जो समय का मात्र उन्माद
सार हीन
नहीं कभी मेरा
समय का अंश मात्र
उसी पल का प्रवाह बना
जाता रहा
देता गया रिक्तता का अहसास
प्यासेपन के अवसाद
व्यतीत होता हैं काल
यह दुर्गति का सत्य
स्वीकारता हूँ मैं
ओर निसंकोच कहता हूँ
प्यासा ही रहा।
छगन लाल गर्ग।

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