नहीं रहा
कभी रहा
परिदृश्य प्रति पल
बदल देता समूचा
अस्तित्व मेरा
दृश्य हूँ मैं
अब नहीं कर पाता
अन्तर्मन आभासित तुम्हारे
दृश्य सौन्दर्य की अनूठी
अभिव्यक्ति
नहीं दे पाता रस डूबे
शब्दों की अभिव्यक्ति
अब दृश्य बदला
तुम्हारा
कलोल कल्पनो का घेरा
नहीं घिरता हैं हृदय
कि दू कोई दिव्य उपमा
असाधारण व्यक्तित्व भरे
सौन्दर्य को
अब दृश्य बदला हैं
खूब कहा
रमणीयता का भंडार तुम्हें
भीतर तक पहुँचने का दावा
करता रहा
प्रकट कहां सत्य
छलावा ही देता रहा
तुम्हें भी
स्वयं को भी
सारी अभिव्यक्ति
बाहरी दृश्य की रही
यह नयी अनुभूति
दृश्य की नहीं
भीतर से महसूसता हूँ
मुश्किल हैं
क्या नाम दू इसे
फिर नाम देना भी
क्या सत्य होगा
बेनाम ही रहने दो
सत्य केवल अंश बना
उभरता जाता
कि अभिव्यक्ति मे प्रेम नहीं
छलावा हैं खुद जन्मा
आशक्ति का अधूरापन
निशब्द भीतर प्रवेश
अदृश्य की झलक पाता
जहां सत्य बदलता नहीं
दृश्य रज्जू के बिना ही
मेरे मित
आने दो भीतर
पाने दो किनारा
रहने दो अव्यक्त मुझे
यह दृश्य दूषित करता जाता
निश्छल सौन्दर्य
आधुनिक जीवन की तरह
मेरे मित
उभरता हैं अहो भाव
भीतर होता जाता प्रार्थना
होने दो
प्रेम यह
अदृश्य ही रहने दो।
छगन लाल गर्ग।
कभी रहा
परिदृश्य प्रति पल
बदल देता समूचा
अस्तित्व मेरा
दृश्य हूँ मैं
अब नहीं कर पाता
अन्तर्मन आभासित तुम्हारे
दृश्य सौन्दर्य की अनूठी
अभिव्यक्ति
नहीं दे पाता रस डूबे
शब्दों की अभिव्यक्ति
अब दृश्य बदला
तुम्हारा
कलोल कल्पनो का घेरा
नहीं घिरता हैं हृदय
कि दू कोई दिव्य उपमा
असाधारण व्यक्तित्व भरे
सौन्दर्य को
अब दृश्य बदला हैं
खूब कहा
रमणीयता का भंडार तुम्हें
भीतर तक पहुँचने का दावा
करता रहा
प्रकट कहां सत्य
छलावा ही देता रहा
तुम्हें भी
स्वयं को भी
सारी अभिव्यक्ति
बाहरी दृश्य की रही
यह नयी अनुभूति
दृश्य की नहीं
भीतर से महसूसता हूँ
मुश्किल हैं
क्या नाम दू इसे
फिर नाम देना भी
क्या सत्य होगा
बेनाम ही रहने दो
सत्य केवल अंश बना
उभरता जाता
कि अभिव्यक्ति मे प्रेम नहीं
छलावा हैं खुद जन्मा
आशक्ति का अधूरापन
निशब्द भीतर प्रवेश
अदृश्य की झलक पाता
जहां सत्य बदलता नहीं
दृश्य रज्जू के बिना ही
मेरे मित
आने दो भीतर
पाने दो किनारा
रहने दो अव्यक्त मुझे
यह दृश्य दूषित करता जाता
निश्छल सौन्दर्य
आधुनिक जीवन की तरह
मेरे मित
उभरता हैं अहो भाव
भीतर होता जाता प्रार्थना
होने दो
प्रेम यह
अदृश्य ही रहने दो।
छगन लाल गर्ग।
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