Tuesday, 29 December 2015

आ जाते हो।

बार बार प्रिय
स्मृति पटल पर
मुस्कान रसभरी
मधु महकती चितवन देते
आ जाते हो
करूण हृदय मे
बिसरी यादें
व्यथा भार बढ़ाती
रश्मि पाकर तुम्हारी
स्फुरण फिर फिर
मधु मृदुल मादक बन
लघु भार हृदय का
कर जाते हो
राग विराग अब
जर्जर तन मन
विकल हुआ नित
विरह जलन का
जीवन सार बन जाता
देह घुलने का अवसर आते
आ जाते हो
क्षुब्ध हृदय अब
हारा जीवन
बिछुड रही
चेतन क्षणिकाऐ
काल कणिकाये
घेरती जाती
रस रागिनी धारा
सुखती जाती
ऐसे मे करूण किरणों की
स्मृति लिए तुम
आ जाते हो।
छगन लाल गर्ग।



No comments:

Post a Comment