अति सभ्यता
पक्के इरादों से
बदलती जाती
जिन्दगी के असभ्य मापदंड
जिनमें मर्यादा का होता
तनिक भी समावेश
हो जाता वहीं
दकियानूसी अनगढा गंवार
युग का नया अवतार
जीवन बनाता जाता
अति सभ्य
कि जिन्दगी अर्थ पाये
अपने होने का
विचारों का बहाव
होता रहे स्वच्छन्द
वाणी अपनी सार्थकता
कर सके सिद्ध
उलजलूल तर्को के आसरे
नहीं हो कहीं विराम
आखिर मानव जीवन
अनेको पुण्यो की बदोलत पाया
हो सके सामर्थ्य सीमा तक
सारी वर्जनाओ का निषेध
ओर जिन्दगी नहीं दिखा सके
अपनी असलियत
अब अति मुश्किल हैं
निश्छल जीना
हर शैष्टा देती जाती
घना तिरस्कार
मुँह छिपाता हैं असलीपन
ओर यह नकलीपन
हावी रहता हैं हर
असलियत पर
तन मन ओर आचरण
इठलाते जाते
हर प्रदर्शन बढाता हैं नूर
जिन्दगी तेरा
प्रकृति प्रदत हर सौन्दर्य
हो चुका हैं बेरौनक
यह हैं प्रसाधनो का युग
कृत्रिम
हमारी भावनाओ की तरह
जो अंतराल जीती
असीम
भीतर ओर बाहर
ओर हम तोलते जाते
अपने विवेक
मानव नहीं
प्रसाधनो की कीमत
यही सत्य
मानव की श्रेष्ठ हैसियत का
उधर सौन्दर्य भी
समझ चुका अपनी असलियत
वस्त्रों की कमी का महत्व
भीतरी सौन्दर्य का रहस्य
वस्त्रो का स्थान
घेरते जा रहे
अजीबोगरीब आकृति लिए
टेटू
चलो ओर भी बेहतर
हम सभ्य तो हैं ही
तरक्की हमारी
नित ऊँचाई लेती हैं ।
छगन लाल गर्ग।
पक्के इरादों से
बदलती जाती
जिन्दगी के असभ्य मापदंड
जिनमें मर्यादा का होता
तनिक भी समावेश
हो जाता वहीं
दकियानूसी अनगढा गंवार
युग का नया अवतार
जीवन बनाता जाता
अति सभ्य
कि जिन्दगी अर्थ पाये
अपने होने का
विचारों का बहाव
होता रहे स्वच्छन्द
वाणी अपनी सार्थकता
कर सके सिद्ध
उलजलूल तर्को के आसरे
नहीं हो कहीं विराम
आखिर मानव जीवन
अनेको पुण्यो की बदोलत पाया
हो सके सामर्थ्य सीमा तक
सारी वर्जनाओ का निषेध
ओर जिन्दगी नहीं दिखा सके
अपनी असलियत
अब अति मुश्किल हैं
निश्छल जीना
हर शैष्टा देती जाती
घना तिरस्कार
मुँह छिपाता हैं असलीपन
ओर यह नकलीपन
हावी रहता हैं हर
असलियत पर
तन मन ओर आचरण
इठलाते जाते
हर प्रदर्शन बढाता हैं नूर
जिन्दगी तेरा
प्रकृति प्रदत हर सौन्दर्य
हो चुका हैं बेरौनक
यह हैं प्रसाधनो का युग
कृत्रिम
हमारी भावनाओ की तरह
जो अंतराल जीती
असीम
भीतर ओर बाहर
ओर हम तोलते जाते
अपने विवेक
मानव नहीं
प्रसाधनो की कीमत
यही सत्य
मानव की श्रेष्ठ हैसियत का
उधर सौन्दर्य भी
समझ चुका अपनी असलियत
वस्त्रों की कमी का महत्व
भीतरी सौन्दर्य का रहस्य
वस्त्रो का स्थान
घेरते जा रहे
अजीबोगरीब आकृति लिए
टेटू
चलो ओर भी बेहतर
हम सभ्य तो हैं ही
तरक्की हमारी
नित ऊँचाई लेती हैं ।
छगन लाल गर्ग।
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