प्रकृति का गढा
प्राणों का स्पंदन चेतन
अनुभूति से संचलन
हर पल बढ़ता निरंतर
नव वर्ष समर्पण तुझमे
प्रति क्षण होता रहता
नव आँकाक्षाओ भरा
जीवन की क्षण भंगूरता बीच
नव सृजन का राग गाता
स्वागत करता हूँ तेरा
विगत का कडवा धुऑ
प्राणों का रस निछोड चुका
कोलाहल भरा जीवन
नहीं पाया कहीं विश्रान्ति
जीवन का रण
कभी नहीं जीता
नित पराजय झेले
नहीं हो सका अंश तेरा
स्वागत नव वर्ष
नव पल्लवित कपोले
नहीं पाती प्रभात की रश्मिया
चढती जाती भेट
सभ्यता के अतिसार मे
होती जीती अजीब हादसो
की शिकार
कि नहीं पाती यौवन
ओर संयोग मिलता जीवन
अरमानो की बलि देते
संताप जीवन मिलने का
झेलती पाती बूढ़ापा
असमय बढती मौत की ओर
नव सृजन का स्वप्न भी
आधा अधूरा जीती
कुम्लाहती हैं जिन्दगिया
प्रकृति थिर कहां
व्यतीत होती जाती
सृजन निमित्त
यह जीवन चक्रव्यूह बना
अस्तित्व मिटाने निमित्त
सार केवल मिट जाना
विलीनता ही उदय
यही संतुलन प्रकृति का
दंभ हमारा दावों तक
यही हैं क्षण का सार
विवश हारे जर्जर बिम्ब हम
समय की करवट से निर्मित
प्रकृति चेतन
देती रहती बार बार
नवाकार कभी कुसुम
कभी काँटे
छाया ओर धूप का खेल
चलता हैं ससीम जीवन
प्राणों की ऊर्जा
देती रहती चेतनता
विवेक मय भावों की
ओर हम तोलते रहते अनंत
रहस्यमय गुम्फन बीच
फैलाते जाते ज्ञान का कोहरा
धून्ध खायी रश्मिया
नहीं टटोल सकी
क्षण का रहस्य
आते जाते रहे नव वर्ष
अज्ञात घेरता रहा जिन्दगी
अब यह आता हैं फिर
नव वर्ष
फिर नमित हो करता स्वागत
एक रस्म की तरह
नहीं पालता जोखिम
आँकाक्षाओ की
पर समर्पित होने से पहले
आकाओ से गुहार
करना विवशता हमारी
न हो अकाल मृत्यु युवाओं की
घटे थोक मे होते हादसे
युवा पा सके जीने को काम
आओ नव वर्ष
ले चलो वहीं
जहां स्नेह का दरिया
प्राणों का राग बने
कोलाहल विश्रान्ति पाकर
समरस वीणा के स्वर बने
समर्पित हूँ नव वर्ष ।
छगन लाल गर्ग।
प्राणों का स्पंदन चेतन
अनुभूति से संचलन
हर पल बढ़ता निरंतर
नव वर्ष समर्पण तुझमे
प्रति क्षण होता रहता
नव आँकाक्षाओ भरा
जीवन की क्षण भंगूरता बीच
नव सृजन का राग गाता
स्वागत करता हूँ तेरा
विगत का कडवा धुऑ
प्राणों का रस निछोड चुका
कोलाहल भरा जीवन
नहीं पाया कहीं विश्रान्ति
जीवन का रण
कभी नहीं जीता
नित पराजय झेले
नहीं हो सका अंश तेरा
स्वागत नव वर्ष
नव पल्लवित कपोले
नहीं पाती प्रभात की रश्मिया
चढती जाती भेट
सभ्यता के अतिसार मे
होती जीती अजीब हादसो
की शिकार
कि नहीं पाती यौवन
ओर संयोग मिलता जीवन
अरमानो की बलि देते
संताप जीवन मिलने का
झेलती पाती बूढ़ापा
असमय बढती मौत की ओर
नव सृजन का स्वप्न भी
आधा अधूरा जीती
कुम्लाहती हैं जिन्दगिया
प्रकृति थिर कहां
व्यतीत होती जाती
सृजन निमित्त
यह जीवन चक्रव्यूह बना
अस्तित्व मिटाने निमित्त
सार केवल मिट जाना
विलीनता ही उदय
यही संतुलन प्रकृति का
दंभ हमारा दावों तक
यही हैं क्षण का सार
विवश हारे जर्जर बिम्ब हम
समय की करवट से निर्मित
प्रकृति चेतन
देती रहती बार बार
नवाकार कभी कुसुम
कभी काँटे
छाया ओर धूप का खेल
चलता हैं ससीम जीवन
प्राणों की ऊर्जा
देती रहती चेतनता
विवेक मय भावों की
ओर हम तोलते रहते अनंत
रहस्यमय गुम्फन बीच
फैलाते जाते ज्ञान का कोहरा
धून्ध खायी रश्मिया
नहीं टटोल सकी
क्षण का रहस्य
आते जाते रहे नव वर्ष
अज्ञात घेरता रहा जिन्दगी
अब यह आता हैं फिर
नव वर्ष
फिर नमित हो करता स्वागत
एक रस्म की तरह
नहीं पालता जोखिम
आँकाक्षाओ की
पर समर्पित होने से पहले
आकाओ से गुहार
करना विवशता हमारी
न हो अकाल मृत्यु युवाओं की
घटे थोक मे होते हादसे
युवा पा सके जीने को काम
आओ नव वर्ष
ले चलो वहीं
जहां स्नेह का दरिया
प्राणों का राग बने
कोलाहल विश्रान्ति पाकर
समरस वीणा के स्वर बने
समर्पित हूँ नव वर्ष ।
छगन लाल गर्ग।
No comments:
Post a Comment