तरल जीवन की टीस
पाता हूँ
समर्पित प्रिय को
टहनिया
इनका सच
अप्रकट्य रहता
भोगती रहती मौन साधे
पीड़ा का अंबार
नहीं लेता कोई टोह
जानते भी
उपेक्षा कर जाते
माना हैं नियति इनकी
काम इनका
सृजन
कोमल कपोलो को
अपनी प्राण ऊर्जा देकर
ऊर्जा स्वयं की न सही
हो वितरण मात्र
संचय नहीं रखती
भीतर अपने खातिर
कि स्वयं हो सके
पुष्ट ओर सबल
नहीं हैं नसीब उसके
ओर अगर
पुष्टि की अभिलाषा
होती हैं विस्तृत
काट दी जाती हैं समूल
अस्तित्व संग कहीं
स्वयं की भावना
कि विस्तार स्वयं का हो
भूलना भाग्य हैं इनका
कार्य मात्र सृजन
कोमल कान्त पल्लव सहित
जन्म दे पुष्प व फल
जीवन मात्र
सृजन समर्पित
सृष्टि हैं स्वयं का बोध
स्वयं की इच्छा
ओर अस्तित्व
हाथों पराये
यह सच
रौदता जाता
हृदय की अस्मिता को
कि समाज हमारा
निर्दयी घना
रौदता जाता
नारी का सृजन
सृजक की पीडा की
गहरी कसक
टीस बनी सालती जाती
यह सच का चिन्तन
समाज को
स्वीकार करना होगा ।
छगन लाल गर्ग।
र
पाता हूँ
समर्पित प्रिय को
टहनिया
इनका सच
अप्रकट्य रहता
भोगती रहती मौन साधे
पीड़ा का अंबार
नहीं लेता कोई टोह
जानते भी
उपेक्षा कर जाते
माना हैं नियति इनकी
काम इनका
सृजन
कोमल कपोलो को
अपनी प्राण ऊर्जा देकर
ऊर्जा स्वयं की न सही
हो वितरण मात्र
संचय नहीं रखती
भीतर अपने खातिर
कि स्वयं हो सके
पुष्ट ओर सबल
नहीं हैं नसीब उसके
ओर अगर
पुष्टि की अभिलाषा
होती हैं विस्तृत
काट दी जाती हैं समूल
अस्तित्व संग कहीं
स्वयं की भावना
कि विस्तार स्वयं का हो
भूलना भाग्य हैं इनका
कार्य मात्र सृजन
कोमल कान्त पल्लव सहित
जन्म दे पुष्प व फल
जीवन मात्र
सृजन समर्पित
सृष्टि हैं स्वयं का बोध
स्वयं की इच्छा
ओर अस्तित्व
हाथों पराये
यह सच
रौदता जाता
हृदय की अस्मिता को
कि समाज हमारा
निर्दयी घना
रौदता जाता
नारी का सृजन
सृजक की पीडा की
गहरी कसक
टीस बनी सालती जाती
यह सच का चिन्तन
समाज को
स्वीकार करना होगा ।
छगन लाल गर्ग।
र
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