यह होना
स्वयं संपूर्ण विसंगति
आधार होने का
कोई संगत प्रमाण
ढूँढता
व्यतीत होता हूँ नित
देह का होना भी
स्थिर कहां
ओर विचार कहां पाते
अपना अस्तित्व
नित बदलते समय के साथ
जीते बहते समय के प्रवाह
ओर जीने के मापदंड
शास्त्र सम्मत रहे कहां
युग की चाल संग
बढ़ाते जाते अपने कदम
धारणाओं का क्या
तर्को के मध्य
नित पिसती चकनाचूर हुई
जीवन कहां रहा
कोरा कागज
उल जलूल चित्र छपते जाते
अनचाहे
विवश हैं हम
कलम ओर लेखनी हमारी नहीं
समय ओर प्रकृति के हाथों
अंकित होते जाते चित्र
ऑके जाते हैं हम
ओर भीतर का अहं
बार बार हूँकारता कहता
विसंगति नहीं जीवन
मैने स्वयं गढा जीवन अपना
संघर्ष ताप झैले
तभी विकसित हुआ हूँ मैं
यह विसंगति संगति का खेल
अधूरा छोडना विवशता
समय के साथ विसर्जन की
अब बेबूझ हूँ
सत्य आधा अधूरा
पूरा कैसे हो
शायद सोचना कम
विलय सामजस्य करना ही
हार मे जीत हो।
छगन लाल गर्ग।
स्वयं संपूर्ण विसंगति
आधार होने का
कोई संगत प्रमाण
ढूँढता
व्यतीत होता हूँ नित
देह का होना भी
स्थिर कहां
ओर विचार कहां पाते
अपना अस्तित्व
नित बदलते समय के साथ
जीते बहते समय के प्रवाह
ओर जीने के मापदंड
शास्त्र सम्मत रहे कहां
युग की चाल संग
बढ़ाते जाते अपने कदम
धारणाओं का क्या
तर्को के मध्य
नित पिसती चकनाचूर हुई
जीवन कहां रहा
कोरा कागज
उल जलूल चित्र छपते जाते
अनचाहे
विवश हैं हम
कलम ओर लेखनी हमारी नहीं
समय ओर प्रकृति के हाथों
अंकित होते जाते चित्र
ऑके जाते हैं हम
ओर भीतर का अहं
बार बार हूँकारता कहता
विसंगति नहीं जीवन
मैने स्वयं गढा जीवन अपना
संघर्ष ताप झैले
तभी विकसित हुआ हूँ मैं
यह विसंगति संगति का खेल
अधूरा छोडना विवशता
समय के साथ विसर्जन की
अब बेबूझ हूँ
सत्य आधा अधूरा
पूरा कैसे हो
शायद सोचना कम
विलय सामजस्य करना ही
हार मे जीत हो।
छगन लाल गर्ग।
No comments:
Post a Comment