विडंबना हुआ जाता
मेरा जीवन
संवेदनाओ के रहते
हेय बना गुजारता जाता
जीवंत पल
नहीं पाता कोई ठौर
जहां मिलता संबल
उपेक्षित पाता हूँ स्वयं को
अपनों मे
कि जीना नहीं पाया
नही बन पाया
आदमी पूरा
नमित हुआ यह जीना
पुरुषार्थ नहीं
अभिमान का अंश जीए बिना
नहीं हो लायक
इन्शान कहला सको
जीता हूँ एक गहन विरानी
जहां मात्र
ऐतबार करते हैं कथित असभ्य
जिनके हर दर्द
समेटता बनता जाता हूँ
सहृदय उजला उनका सा
अब नहीं जकड पाता
सभ्य आचरण का धुऑ
कि भीतर प्रवेश करें
नये विचारों का गुम्फन
इतराता हैं इर्द गिर्द
ओर देता जाता
अपनी प्रभुता की झलक
ऐतबार नहीं होता
सरलता की विडंबना
भाती हैं जिन्दगी
बस करो अब
क्यों उलझाते हो
जटिल जिन्दगी मे
बहने दो जीवन
संवेदना के प्रवाह
ठीक हूँ मैं
सरल जीता हूँ
तुम्हारी दिशा
लुभावनी लगती हैं
दूर ही दूर
समीप आते ही कुरूपता
दुर्गन्ध का धुऑ
घूटता हैं श्वास मेरी
बेसहारो का ही साथ
मेरा अपना हैं
रहने दो
यह विडंबना ही सही
जीवन हुआ हैं मेरा
नहीं देते तुम संबल
न सही
छोडो मुझे
इस पीर का बहाव
बहता टूटता
आकार लेता हूँ
मानव का
महामानव का पात्र होना
मेरी औकात नहीं
साधारण हूँ
रहने दो
विडंबना का यह जीवन
मैंने चुना हैं
किसी की बख्शीस नहीं
मिटता हूँ
अकारण ही सही
मिटने दो।
छगन लाल गर्ग।
मेरा जीवन
संवेदनाओ के रहते
हेय बना गुजारता जाता
जीवंत पल
नहीं पाता कोई ठौर
जहां मिलता संबल
उपेक्षित पाता हूँ स्वयं को
अपनों मे
कि जीना नहीं पाया
नही बन पाया
आदमी पूरा
नमित हुआ यह जीना
पुरुषार्थ नहीं
अभिमान का अंश जीए बिना
नहीं हो लायक
इन्शान कहला सको
जीता हूँ एक गहन विरानी
जहां मात्र
ऐतबार करते हैं कथित असभ्य
जिनके हर दर्द
समेटता बनता जाता हूँ
सहृदय उजला उनका सा
अब नहीं जकड पाता
सभ्य आचरण का धुऑ
कि भीतर प्रवेश करें
नये विचारों का गुम्फन
इतराता हैं इर्द गिर्द
ओर देता जाता
अपनी प्रभुता की झलक
ऐतबार नहीं होता
सरलता की विडंबना
भाती हैं जिन्दगी
बस करो अब
क्यों उलझाते हो
जटिल जिन्दगी मे
बहने दो जीवन
संवेदना के प्रवाह
ठीक हूँ मैं
सरल जीता हूँ
तुम्हारी दिशा
लुभावनी लगती हैं
दूर ही दूर
समीप आते ही कुरूपता
दुर्गन्ध का धुऑ
घूटता हैं श्वास मेरी
बेसहारो का ही साथ
मेरा अपना हैं
रहने दो
यह विडंबना ही सही
जीवन हुआ हैं मेरा
नहीं देते तुम संबल
न सही
छोडो मुझे
इस पीर का बहाव
बहता टूटता
आकार लेता हूँ
मानव का
महामानव का पात्र होना
मेरी औकात नहीं
साधारण हूँ
रहने दो
विडंबना का यह जीवन
मैंने चुना हैं
किसी की बख्शीस नहीं
मिटता हूँ
अकारण ही सही
मिटने दो।
छगन लाल गर्ग।
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