कहां होता हैं नसीब
हर किसी के जीवन
की चमक
कि हृदय झील मे
खिल खिल उठे कुसुम
संपूर्ण लावण्यता के
कि महक उठे
ऑगन भावनाओं का
ओर यौवन का दरिया
हिडोलित हुआ
दे अनंत सी उताड़ग लहरे
नहीं रे मन
नहीं हैं जीवन नसीब का ठौर
ओर यदि
यह महसूसता भी
तो पीर के पारावार मे
जहां किलोल करते
वासनाओ के फूल
मुरझाने लगते
बनावटी दृश्यो से
वहीं दृश्यमान होते
उभरने लगते हैं
कृत्रिम शोभा बने
सभ्य पात्र
अभिनय करते नसीब ठौर का
वे नहीं होते आदमी
त्रासदी का दंश
विषेला
डंक चुभोता जाता
हर संवेदना को
यह टीस हैं
नसीब न होने की
कि प्रकटी हैं जहर बनी
प्रतिकूलता को
अनुकूल बनाने की
इन्सानियत को रौदती हुई
यह अकारण नहीं
कहीं गहरे भीतर से उठी
टीस को ठेलती
अहं का आकार लेती
करना चाहती
वर्चस्व साबित
वहीं कारण
पथ के साथी
नाता जोडे
ओर दे अपने भी हसीन पल
कि रस बिखेरे जिन्दगी
बाहर बाहर
यह हर्ष का कतरा
शास्वत कहां
हल्का सा आभास
भीतरी रस का
जो सत्य नहीं
केवल बनावट का संचय
कि भाव बहते
कहते रस हैं यह
असलियत कुछ ओर
जो नित मरती जाती
भीतर ही भीतर
यह जिन्दगी
एक नीरस पतझड
जो हल्की सी
बेदर्द हवा के झौके
काम्पती ठिठूरती
पर हम
अहं की दीवार बनाते जाते
दावा करते
सर्वौच्चता का
ओर यह भी
केवल सामर्थ्य तक
जब तक की
झंझावत न आये
अनुभव झेलता स्वाभिमान
टूटता बिखरता
कान्च की माफिक
बनती जिन्दगी कुण्ठा का धुऑ
लगता जाता
हर मुस्कान के पीछे
दुख की रजनी
यह हर्ष का आवरण
विकसा सा
नवल प्रभात सा
नसीब नहीं
संवेदना हैं
मानव मन की
जो अप्रकटता चाहती
नसीब हमारा
भौतिकता का संग्रहण नहीं
भीतर का अंकुरण हैं
युग का सच
बहुत डरावना हो उठा
नसीब बना अब
दीवा स्वप्न
आओ ना
तलाशे उम्मीदें
कि भीतर हो
अंकुरित सुख
ओर यह
निस्पृश्यता से
खुद मे डूबे ही
शायद मिले
चलो तलाशे
नसीब का ठौर।
छगन लाल गर्ग।
हर किसी के जीवन
की चमक
कि हृदय झील मे
खिल खिल उठे कुसुम
संपूर्ण लावण्यता के
कि महक उठे
ऑगन भावनाओं का
ओर यौवन का दरिया
हिडोलित हुआ
दे अनंत सी उताड़ग लहरे
नहीं रे मन
नहीं हैं जीवन नसीब का ठौर
ओर यदि
यह महसूसता भी
तो पीर के पारावार मे
जहां किलोल करते
वासनाओ के फूल
मुरझाने लगते
बनावटी दृश्यो से
वहीं दृश्यमान होते
उभरने लगते हैं
कृत्रिम शोभा बने
सभ्य पात्र
अभिनय करते नसीब ठौर का
वे नहीं होते आदमी
त्रासदी का दंश
विषेला
डंक चुभोता जाता
हर संवेदना को
यह टीस हैं
नसीब न होने की
कि प्रकटी हैं जहर बनी
प्रतिकूलता को
अनुकूल बनाने की
इन्सानियत को रौदती हुई
यह अकारण नहीं
कहीं गहरे भीतर से उठी
टीस को ठेलती
अहं का आकार लेती
करना चाहती
वर्चस्व साबित
वहीं कारण
पथ के साथी
नाता जोडे
ओर दे अपने भी हसीन पल
कि रस बिखेरे जिन्दगी
बाहर बाहर
यह हर्ष का कतरा
शास्वत कहां
हल्का सा आभास
भीतरी रस का
जो सत्य नहीं
केवल बनावट का संचय
कि भाव बहते
कहते रस हैं यह
असलियत कुछ ओर
जो नित मरती जाती
भीतर ही भीतर
यह जिन्दगी
एक नीरस पतझड
जो हल्की सी
बेदर्द हवा के झौके
काम्पती ठिठूरती
पर हम
अहं की दीवार बनाते जाते
दावा करते
सर्वौच्चता का
ओर यह भी
केवल सामर्थ्य तक
जब तक की
झंझावत न आये
अनुभव झेलता स्वाभिमान
टूटता बिखरता
कान्च की माफिक
बनती जिन्दगी कुण्ठा का धुऑ
लगता जाता
हर मुस्कान के पीछे
दुख की रजनी
यह हर्ष का आवरण
विकसा सा
नवल प्रभात सा
नसीब नहीं
संवेदना हैं
मानव मन की
जो अप्रकटता चाहती
नसीब हमारा
भौतिकता का संग्रहण नहीं
भीतर का अंकुरण हैं
युग का सच
बहुत डरावना हो उठा
नसीब बना अब
दीवा स्वप्न
आओ ना
तलाशे उम्मीदें
कि भीतर हो
अंकुरित सुख
ओर यह
निस्पृश्यता से
खुद मे डूबे ही
शायद मिले
चलो तलाशे
नसीब का ठौर।
छगन लाल गर्ग।
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