Saturday, 2 January 2016

राग विराग।

द्वेत हुआ जीवन 
तन व मन
 बन चुके अनमेल
नहीं रहा नियंत्रण 
विचार व भावों के बीच 
यह त्रासदी 
करती जाती
जीवन का विश्लेषण 
कि अभिप्राय रहा हूँ मैं 
साक्षी हुआ 
अब तक गुजरे क्षणो का
नहीं कर पाता अवलोकन 
विगत तेरा
घना व्यतीत 
धुन्धलका घेरता
कि छिपाता जाता
विभत्स दाग तेरे
होती हैं वितृष्णा घनी
अतीत की रंगीन कल्पनाऐ
कहां खाती मेल
अं श जीवन इस पल
सतरंगी उडानो के पंख
जर्जर हुए गति करते 
नासमझी का संग्रहण
हुआ पीडा की गठरी
नहीं पाता शीतल ठोर
कि करू विश्राम 
सर्द राते
अभिसार का संयोग नहीं 
अब घनी लंबवत हुई
दर्द व्याप्त हुआ जाता
कसक पीर
 नस नस देती व्याधि
दर्द भरती हैं हड्डिया
नहीं रही प्रवृत्ति अब
जन्मो से दौडने की
संग्रह सुखो निमित्त 
दौडना ओर हाफना
यही तो किया जीवन 
चलने की पीड़ा भी
ओर विश्राम पीड़ा भी
अजीब हूँ मैं 
अस्तित्व होना भी पीड़ा 
जिम्मेदारी ढोते ही
यह तन भी
यह मन भी
कंधे व पेर भी
दे चुके जवाब 
इस पर भी
देखता रहता
चलने ओर बोझे का सार
व्यर्थ हुआ जाता
संक्रमण की बेला 
न तो समाप्ति न प्रारंभ 
यह शायद 
विराग राग पनपा
समर्पित हुआ सा
स्नेह के सागर 
जीवन का यह 
अति सार हैं शायद 
राग का प्रतिलोम
दोनों भाव नहीं देते
पहचान मेरी
अद्वेत कहां रहा जीना।
छगन लाल गर्ग।



हैं नहीं ।

अब नहीं रहा
संतापो का ज्वार
असमझ बढ़ते
धुन्धलके मे विलुप्त हुआ
समझ का प्रकाश
गहन ऊर्जा पाती रही
विश्रान्ति का सार
समय जाते
अनुभव के पहिये
हुए गतिहीन
नहीं रहा काम
कि दोडते जाये
नव सृजन नहीं रखता
विश्वास अनुभव पर
हर पल दिखता वहीं
पर चेतन स्वयं से
तपन लिए जोडता विश्वास
प्रेम का पहिया
पवन वेग लेता
घिसता जाता जिन्दगी
कि नहीं भरता विराम
छत की चाह रही नहीं
उखडती श्वास
 नहीं चाहती विश्राम
सब खोता हुआ
इन्सान का स्वरूप
लेता जा रहा
 नव युग का बोध
शायद अपनत्व की तलाश
इस सभ्य नेह मे
हैं नहीं ।
छगन लाल गर्ग।

Friday, 1 January 2016

केवल शब्द ।

नहीं चलते
अब मनन चिन्तन
कि बन सके
कोई युग सार्थक सिद्धांत
कि धरातल पाये जिन्दगी
अब होता हैं व्यापार
भावनाओं का
शब्दों के उतार चढ़ाव
हुनर पाये लोगों से
कि फिसलन पा जाते
सारे मनोरथ
अर्थो के हित लिए
यही समझ देते हैं शब्द
नहीं बहती अब गीता
या कि इंसानियत की
भाव धारा की
पावन हो सके मानव चित
ओर युगों से बहती
पावन गंगा
अब अति स्थूलता से
गंदी बहती हैं
शब्दों की नदी
बाढ़ बनी बहाती जाती
इन्सानियत
ओर मूक हुआ आम
कातर हुआ
जी रहा
दहशत भरी जिन्दगी
नहीं होता अब मनन
परहित
स्वार्थ की राह बहते जाते
शब्दों के प्रवाह
लगता हैं विवेक
अपनी उम्र
व्यतीत कर चुका
पर अभी बिता कहां
समय का अस्तित्व
चेतन हुआ
शब्द घेरने लगा ।
छगन लाल गर्ग।



शुभ कामनाऐ।

नहीं कर पाये निन्द
रात भर
शुभ कामनाओ के रहते
बीतता हर पल
अतीत बन उभरता
जो जिया
संभावनाओ को लेकर
बेहतरीन जिन्दगी के हर सपने
समेटता बीत गया बीता वर्ष
ओर नये वर्ष की शुभ कामनाऐ
मिटाती जाती निन्द के पल
रीता झोला लिए आये
यही संभाले रहे
अब फटा तार तार हुआ
नहीं ठहर पाते अच्छे दिन
पेबन्द के टान्के भरने
कि नहीं रही गुन्जाइश
तन लिपटे अरमान के झोले की
ओर शुभ कामनाऐ
संक्रमण पलो से निरंतर
बढती बौछार सी
नहीं देती ख्वाहिशो को तसस्ली
कि प्रगति के दौर मे
अस्तित्व रह सके कायम
यह नया वर्ष
सोये जख्मो को
शुभ कामनाओ से
ओर करता रहा जख्मी
नहीं मेरे अपनों
यथार्थ को शब्दों के पर्दे
मत दो
व्यवस्था मे परिवर्तन हो
कुछ शुभ संकेत
ऐसे भी आने दो
अब केवल घोषणा
शुभ कामना सोने नहीं देगी।
छगन लाल गर्ग।