Friday, 11 December 2015

व्यक्त हो तुम ।

मेरे अव्यक्त
भीतर महसूसता तुम्हें
तुम व्यक्त हो
यह पर्दा झीना सा
छिपे हो
अव्यक्त हुए
सद्मवेशी हो तुम
मूल रूप
कहां साबित होता
छिपाव ही अस्तित्व
तुम्हारा
कि न दिखे असलियत
रहे हो अव्यक्त से
प्रकटते हो
अनेक रूप
अनेक माध्यम लिए
लेते हो नानारूप
भीतरी जान पहचान हैं हमारी
तुम बदलो शक्ल
छिपाओ पहचान
सच कहो
क्या यह बेढंगापन
मेरे अव्यक्त
तुम नहीं जीते
कभी दिखते हो
रूप सौन्दर्य लिए
कृत्रिम आवरण धरे
असलियत छिपाते
पाता हूँ तुम्हें
ईश्वरीय सौन्दर्य से लबालब
विमुक्त घना लावण्य
पर अव्यक्त हो तुम होनहार
मंजे हो कृत्रिम संस्कार तले
गढ देते हो नया
जोडते जाते
ओर अकारण ही
उलझ जाता हैं सत्य
कभी ढकते तुम
अपनी प्रकृति प्रद कुरूपता
जो मिली तुम्हें अज्ञात से
देते हो नया लावण्य
रंगते जाते
सतरंगी रंग
नया ताना बाना
ओर हो जाते हो
अतुलनीय
अब यह खेल तुम्हारा
असमझ ही सही
चमत्कार बना हैं
नित नयापन लिए
कि यथार्थ मिले भी कहां
ओर भी
निराशा के पल
जब उघड जाते चमत्कार
स्वयं सजने के
बनाते हो
गगन तुलनीय इमारतें
जो बनती आवासीय
अति आकर्षक
इसी बहाने
रंगत बनी रहे तुम्हारी
कभी अव्यक्त मेरे
व्यक्त होते तुम चित्रकारी मे
उभार देते हो ब्रह्मांड
समूची प्रकृति
अपने केनवास पर
जानते हो
शास्वत सौन्दर्य की झलक
मन की रमणियता लिए
उभरती हैं
मन का अंश
तनिक अपना अंश छोड़ ही देता
अनचाहे तुम्हारे
मेरे अव्यक्त
कभी बन जाते गहन गंभीर
भाव सौन्दर्य से डूबे
उठाते हो
उदात्तता से कलम
स्पर्श होती तुम्हारे हाथ
फिर वहीं उदातता
खेलती जाती तुम्हारे हाथों
नहीं हो पाते भाव
अछूये कृत्रिमता से
उसमें भी
कृत्रिमता की दुर्गंध बस पच जाती
मेरे अव्यक्त
व्यक्त होने निमित्त
कितना सुंदर तानाबाना तुम्हारा
नित्य बनाते
ढकते हो अपनी कुरूपता
भाव भी
विचार भी
शब्दों के हृदय स्पर्शी
तानो बानो से गुथ
बन जाते मेरे अव्यक्त
निर्मल रसधार
असलियत मेरी तुम्हारी
भीतर ही भीतर
हम दोनों जानते हैं ।
छगन लाल गर्ग।

No comments:

Post a Comment