तपन क्या सत्य हैं
पिघलना कसक हैं
जतन जीवन कम हैं
लगन भीतर तडप हैं ।
दमन नियंत्रण हारा हैं
बेकरार घना हृदय हैं
बदन भिगा दर्द भार हैं
ताप बढा छाया कहां हैं ।
बंधन कब तक तनाव झेल सका हैं
कसक कसाव सहना सामर्थ्य ही हैं
एकाग्र अस्तित्व संकल्पित लडा हैं
जिन्दगी पिघल बंधन घनीभूत हुआ हैं ।
उजडा उजडा जीवन तेरा
व्यर्थ रहा हैं जन्म का फेरा
पाया सब कुछ रहेगा तेरा
खो रहा जीवन जो था तेरा ।।
छगन लाल गर्ग।
पिघलना कसक हैं
जतन जीवन कम हैं
लगन भीतर तडप हैं ।
दमन नियंत्रण हारा हैं
बेकरार घना हृदय हैं
बदन भिगा दर्द भार हैं
ताप बढा छाया कहां हैं ।
बंधन कब तक तनाव झेल सका हैं
कसक कसाव सहना सामर्थ्य ही हैं
एकाग्र अस्तित्व संकल्पित लडा हैं
जिन्दगी पिघल बंधन घनीभूत हुआ हैं ।
उजडा उजडा जीवन तेरा
व्यर्थ रहा हैं जन्म का फेरा
पाया सब कुछ रहेगा तेरा
खो रहा जीवन जो था तेरा ।।
छगन लाल गर्ग।
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