Wednesday, 16 December 2015

छाया कहां हैं ।

तपन क्या सत्य हैं
पिघलना कसक हैं
जतन जीवन कम हैं
लगन भीतर तडप हैं ।
दमन नियंत्रण हारा हैं
बेकरार घना हृदय हैं
बदन भिगा दर्द भार हैं
ताप बढा छाया कहां हैं ।
बंधन कब तक तनाव झेल सका हैं
कसक कसाव सहना सामर्थ्य ही हैं
एकाग्र अस्तित्व संकल्पित लडा हैं
जिन्दगी पिघल बंधन घनीभूत हुआ हैं ।
उजडा उजडा जीवन तेरा
व्यर्थ रहा हैं जन्म का फेरा
पाया सब कुछ रहेगा तेरा
खो रहा जीवन जो था तेरा ।।
छगन लाल गर्ग।

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