Monday, 28 December 2015

देता हूँ ।

देता हूँ आवाज
हो जाता हूँ नीरव घना
मन चेतना दोनों से
भीतर की रोशनी
हो जाती विलुप्त
बाहर भीतर का अंधकार
सम काल बना बहता
अंधकार साम्राज्य
मेरा अपना हो जाता
अचेतन मे आते तुम
रोशनी लिए
आभा का आकार बने
देखता हूँ तुम्हें
देता हूँ आवाज
नहीं होती गुन्जार कंठ से
रूड़घ जाता हैं गला
सूजन पाता हूँ कंठ
स्फूट स्वर नहीं बनता ध्वनि
उतरी सी जाती
भीतर ही भीतर
तुम्हारी आभामय आकृति
घेरती हो हृदय मेरा
विरह गाथा
कहता हूँ भीगी वेदना
देता हूँ आवाज
नहीं पाता कोई प्रत्युतर
प्राण का रूदन
हो जाता है सघन
शब्द नहीं बनते बिम्ब
पर यह अमूक स्वर
तुम्हारा ओर मेरा नहीं
हम दोनों का
जहां स्वर नही
भाव देते हैं अर्थ
ओर यह विराग काल
बन जाता
अमूल्य धरोहर हम दोनों का
मत सुनो
केवल दे दो संकेत
अहसास का
कि प्रेम
प्रार्थना बन जाय हमारा।
छगन लाल गर्ग।

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