प्रवाह की आधारशिला
खाई का चिर अंधकार
अमिट रहा
अनवरत घेरे जाता हैं
अंधकार मुझे
संपूर्ण अस्तित्व ही कसूरवार
कि अंकुरित हुआ
पौधा हुआ हूँ खाई का
निर्झरो की
निर्मल प्रवाहित धारा का
जल पीकर
पल्लवन हुआ हैं मेरा
निखारता रहा हूँ स्वयं को
खाई की
असीम चिर छाया मे भी
तलाशता जाता हूँ
स्वयं की छाया
जो सूक्ष्म बनी
प्रवाहित हैं तन की
महीन सिराओ बीच
बाहरी स्थूल तन
कहते हैं देता हैं छाया
रश्मिया सूर्य से स्पर्श पाकर
पर खाई ने नहीं पाई
जीवन काल
सूर्य की रश्मिया
तलाशता रहा बहते पानी मे
नहीं पाया
खुद की छाया
कभी कभी
दोपहरी मे
रश्मि का कोई कतरा
आ जाता भूला सा
इठलाता सा
ढूँढता मुझे
बौनेपन मेरे भी कर जाता
स्पर्श
उसी पुलकन की स्मृति मे
थोड़ी सी ऊर्जा का कतरा
पाये पनपा हूँ
लघुता लिए
पाना चाहता
पूर्णाकार
मिले जब रश्मिया
आज तक नहीं हो पाया
मन की आस्था का अंत
मेरा धरातल नीचा
खोह कन्दरा भरा
अंतिम धरातल का
सतही पौधा हूँ
पेड़ का आकार पाने की आस
हर पौधे की तरह
संजोता जीता हूँ
ओर यह जिन्दगी
सरकती जाती
ओर अंतिम अंधरो की ओर
पूछता हूँ
ऊपरी धरातल के पौधों से
जिन्होंने रश्मिया पायी
ऐठते नहीं कहते
अजीब हूँ मैं
जीवन भी
समता होते भी
धरातल का अंतराल
बदनसीब भी
नहीं पाया रोशनी
ऊष्मा से अपरिचित
पौधा तो हूँ पर नकारा
पछताता हूँ
कास ऊपरी हिस्से का
पौधा होता
थोड़ी ऊँचाई पर स्थित
उनकी तरह
जो हैं दिखते
इतराते हुए
रश्मिया मिलती
समान होते भी
धरातल का अंतराल
बाधक रहा
ओर यह खाई
ओर गहरी होती जाती
बहते निर्झर
बीतते समय के संग
अंधेरा घना हैं
खाई खाती हैं अस्तित्व
प्राण कंठ लिए
बचाता हूँ अस्तित्व
न जाने कब
अति प्रवाह बाढ़ बने
घेरे संपूर्ण खाई
कचोटे भीतर भीतर
विलय ही होना हैं
संपूर्ण अस्तित्व
ओर ये अंधेरे
ओर घने होते
घनी छाया तले
डूबो देते
अगर प्रश्न लेता हैं जन्म
तो करिश्मा ही हैं
खाई धरातल मे पनपे पौधे
रश्मियो के हकदार हैं
पहुँचने देंगे रश्मिया
उन तक
ऊँचाई स्थित विशाल पेड़
नहीं जानता
अंत हीन अंतराल का दंश
सत्य भी हैं
मिटेगा भी
वक्त के गर्भ का सत्य
आकार लेता हैं ।
छगन लाल गर्ग।
खाई का चिर अंधकार
अमिट रहा
अनवरत घेरे जाता हैं
अंधकार मुझे
संपूर्ण अस्तित्व ही कसूरवार
कि अंकुरित हुआ
पौधा हुआ हूँ खाई का
निर्झरो की
निर्मल प्रवाहित धारा का
जल पीकर
पल्लवन हुआ हैं मेरा
निखारता रहा हूँ स्वयं को
खाई की
असीम चिर छाया मे भी
तलाशता जाता हूँ
स्वयं की छाया
जो सूक्ष्म बनी
प्रवाहित हैं तन की
महीन सिराओ बीच
बाहरी स्थूल तन
कहते हैं देता हैं छाया
रश्मिया सूर्य से स्पर्श पाकर
पर खाई ने नहीं पाई
जीवन काल
सूर्य की रश्मिया
तलाशता रहा बहते पानी मे
नहीं पाया
खुद की छाया
कभी कभी
दोपहरी मे
रश्मि का कोई कतरा
आ जाता भूला सा
इठलाता सा
ढूँढता मुझे
बौनेपन मेरे भी कर जाता
स्पर्श
उसी पुलकन की स्मृति मे
थोड़ी सी ऊर्जा का कतरा
पाये पनपा हूँ
लघुता लिए
पाना चाहता
पूर्णाकार
मिले जब रश्मिया
आज तक नहीं हो पाया
मन की आस्था का अंत
मेरा धरातल नीचा
खोह कन्दरा भरा
अंतिम धरातल का
सतही पौधा हूँ
पेड़ का आकार पाने की आस
हर पौधे की तरह
संजोता जीता हूँ
ओर यह जिन्दगी
सरकती जाती
ओर अंतिम अंधरो की ओर
पूछता हूँ
ऊपरी धरातल के पौधों से
जिन्होंने रश्मिया पायी
ऐठते नहीं कहते
अजीब हूँ मैं
जीवन भी
समता होते भी
धरातल का अंतराल
बदनसीब भी
नहीं पाया रोशनी
ऊष्मा से अपरिचित
पौधा तो हूँ पर नकारा
पछताता हूँ
कास ऊपरी हिस्से का
पौधा होता
थोड़ी ऊँचाई पर स्थित
उनकी तरह
जो हैं दिखते
इतराते हुए
रश्मिया मिलती
समान होते भी
धरातल का अंतराल
बाधक रहा
ओर यह खाई
ओर गहरी होती जाती
बहते निर्झर
बीतते समय के संग
अंधेरा घना हैं
खाई खाती हैं अस्तित्व
प्राण कंठ लिए
बचाता हूँ अस्तित्व
न जाने कब
अति प्रवाह बाढ़ बने
घेरे संपूर्ण खाई
कचोटे भीतर भीतर
विलय ही होना हैं
संपूर्ण अस्तित्व
ओर ये अंधेरे
ओर घने होते
घनी छाया तले
डूबो देते
अगर प्रश्न लेता हैं जन्म
तो करिश्मा ही हैं
खाई धरातल मे पनपे पौधे
रश्मियो के हकदार हैं
पहुँचने देंगे रश्मिया
उन तक
ऊँचाई स्थित विशाल पेड़
नहीं जानता
अंत हीन अंतराल का दंश
सत्य भी हैं
मिटेगा भी
वक्त के गर्भ का सत्य
आकार लेता हैं ।
छगन लाल गर्ग।
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