Tuesday, 8 December 2015

लिखने मे तो आओ।

मूर्त प्राण आये
संबल बनकर
अंश मेरे
ओर मैं बसाता रहा
रंगीन दुनिया भीतर
स्वार्थो की
स्वाभाविक चेतन जीवन
आसरा तुम्हारा
चाहत की घनी बागडोर थामे
अर्पित हुआ तुममे
जीता रहा
विडंबना हैं मेरा जीवन
कि तुम बीच मंझधार
मुझे
तडप जीने को
अकेले छोड़
चल दिये अनंत
अब नहीं हो तुम मूर्त
पर मैं अभी
ठूठ बना जड जीता हूँ
अमूर्त ही सही
तुम हो
महसूसता हूँ हर पल
अपने मे
अब नहीं हो पाती तुमसे
अभिव्यक्ति
लिखने तो दो
चार पंक्तियाँ
तुम्हारे लिए
बिखरावो का दरिया
समेटना चाहता थोड़ा
स्मृति बने हो
कहने दो थोड़ा
अभिव्यक्ति का ढंग
बदलता हूँ
लिखने तो दो
कहने दो कुछ बोल
बहुत अर्सा बिता
प्रत्यक्ष न सही
आमने सामने का
वार्तालाप
अब सपने मे होगा
इतना लिखने दो
तुम बसते हो प्राण मेरे
भीतर ही
नहीं जाते तुम
चेतना से
अचेतन मे भी देते हो
सहारा
कि रहता हूँ नींद मे भी
साथ ही
संसर्ग तुम्हारा
जीवन निधि बना मेरा
चेतन गतिविधियों मे
कहां हो दूर
नहीं पाता हूँ
यादों की असुविधा
हर क्रिया मेरी
पाती हैं स्पंदन तुमसे
सवेरे नहाने का पानी
गर्मी की उष्मा
पाता हैं तुमसे
हो जाता हैं गुनगुना
तुम्हारी याद से
आकार लेते हो तुम
वाष्प बनकर
होता रहता हूँ
पावन वाष्प तुम्हारी
ऊर्जावान निखरता हूँ
स्मृति तुम्हारी
अमूर्त ही सही
मेरे जीवन
छाया हो तुम
यही सबूत मेरा
कि जिन्दा हूँ मैं
भीतर कहां हैं
खालीपन
भरा भरा हैं हृदय मेरा
हर पल
सूक्ष्म अति सूक्ष्म
परमाणु से
रचते बसते
मेरे अंग प्रत्अंग
नहीं हुआ तनिक भी
अस्तित्व तुम्हारा कम
अभिव्यक्ति के अतिरिक्त
अब यह वेदना भी
दूर करो
मेरे अंश
लिखने दो
चार पंक्तियाँ कि
टीस भरे भावों को
आने दो कागज पर।
छगन लाल गर्ग।


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