Sunday, 29 November 2015

संकेत अनंत आता।

संकेत अनंत आता
अन्तराल शून्य भरता आता
उठने लगे अब ओर विस्तृत
बादलों का साम्राज्य लेकर
भाव देते रहस्य कहते
सिलसिले हैं अनंत के सब
श्याम वर्ण रंगे घने हैं
बादलो के रूप लेकर
कोई स्थिर कोई भार गंभीर
चंचल चित उमड ढकते तन चले अब
घेरते जाते उछाह भर
चित सागर के किनारे
उछाह भरी लहरों को धूमिल करते
बना रहे अब खुद के अनुरूप
चित सागर किनारे आकर
श्वेत सत उछाल देते बन जाते फेन
ढकते जाते उफान सीमा बन
संकेत आता अब किनारों को
रिसते हैं पिघलन सागर से
तरल अस्तित्व बन जाता प्रति पल
अचेतन गति अदृश्य बहती
स्थिर रहे इस भूतल मे
जन्म पाती यह गति
स्थिरता के आँगन मे
इसी आँगन से मिलती ऊर्जा
तरल बन उभरती आसमानो मे
घटा बन अब संकेत घना
रसधार बरसाती रेत हुए तन मे
चित दरिया बन बन निखर उठा हैं
विलय निमित्त अनंत तुझमे
ओर भी हुए हैं क्या
विलिन चिन्ह चित देख रहा
पदचिन्ह खोते रहे क्या
अनंत तेरे आगोश मे
हो रहा हूँ
मिट रहा हूँ पदचिन्ह पहचानता
ओर बन रहा हूँ
मैं अनंत
नहीं हैं यह करूणालय
रसानन्द का सागर बहता
न हूँ मैं
न कोई आभास भी
यह प्रकृति होती जाती
विलिन मुझमें मैं उसमें
मिट जाता हूँ मैं
अनंत का संकेत
नहीं अब मैं हुआ जाता हूँ अनंत ।
छगन लाल गर्ग।




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