Thursday, 24 December 2015

अंतिम पृष्ठ ।

अंतिम पृष्ठ लिखना
जिन्दगी तेरा
बाकी रहा
अतीत अब सफलता तेरी
समझा कि जी पाया तुझे
कि लिखना हुआ संभव
तेरे विभिन्न आयाम
गुजरा भी भोगा भी
ओर पाया मुकाम
ठहरा हूँ अंतिम पृष्ठ
लिखा नहीं जाता
यह अंतिम पृष्ठ
बाकी रहा
करता हूँ यत्न
कि लिख पाऊ
पर लिखना हिलाता जाता
संपूर्ण अस्तित्व
अनुभव की आस्था
बिखराव लेती घेरती हैं मुझे
कैसे समेटू
कि इकजाई हो
ओर तारतम्यता बने
पहले की तरह
अतीत जैसा ही पृष्ठ बने
संचित अनुभव
अब हो रहा नाकाफी
गहन सत्यता का बोध
उतरता आता है अंतिम पृष्ठ
कि योजित मान्यताऐ
ओर देखे सपने
बिखराव लिए विभत्स आकार
बरसते जाते
जिन्हें पाला समर्पण हुए
सामर्थ्य का बल असीम दिए
कि फूल महके
पर यह महक अपनत्व की नहीं
सभ्य विवेकमय नीजता की
मूल से अनजान
उसी को नकारती सी
ओर लिखे सारे पृष्ठ
मेरी इस जीवन पुस्तक के
इस अंतिम पृष्ठ से
मेल नहीं खाते
लगने लगा अब
नहीं हैं यह पृष्ठ
इस पुस्तक का
ओर ऐसे मे
मुश्किल होता जाता
अंतिम उपसंहार लिखना
यह बाकी ही रहा।
छगन लाल गर्ग।

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