Saturday, 12 December 2015

वाहन का पहिया ।

स्थिर मूर्त गोलाकार
वाहन का पहिया
अस्त होते सूर्य की किरणों से
लेते हैं लम्बोतरी छाया
फिर भी झलकता जाता
छाया मे भी खुद के
अस्तित्व का असली आकार
मूल आकार से मिलता हुआ
आती हैं पहचान
कि छाया हैं यह पहिया की
पर यही पहिया
लेता हैं जब गति अपनी
पहिये का स्वरूप
अपना आकार छोड़ देता
स्वरूप बनता हैं गति का
गोलाकार छाया बनती जाती
गति सी लम्बी लकीर
अब नहीं रहे पहिये
एक लकीर बने उभरे
गति की रफ्तार कहते
अंकित भी करते जाते
चित्रवत छाया अपनी
वहीं जहां हैं कच्चापन
सड़को का
वहीं दौडते पहिये
बना जाते हैं लकीर
अपनी गति की
पर जहां हैं पक्की सड़के
नहीं छोड़ पाते अपनी लकीर
हमारी पहियो की प्रगति के पहिये
चलते हैं पक्की राहो
जहां लकीर उभरती नहीं
छायाऐ दिखती हैं
क्षणिक
कच्ची राहो पर प्रगति के पहिये
चलना नहीं करते पसंद
उबड खाबड रास्ते
पहियो की चमक फीकी होती जाती
ओर अस्तित्व का जोखिम
प्रगति बाधक बना
पक्की सडको सी सुविधा
मखमली रास्ते
मोहित करते दौडाते हैं वहीं
अब इन्तजार करना होगा
कच्चे रास्तों को
योजना को आकार लेने दो
अलग बात हैं
कि विवादों मे योजनाओं के
पृष्ठ फाडे जायेगे
आस्था रखो जीवन सी
अभी
प्रगति के पहियो को
पक्की सड़को पर चलने दो ।
छगन लाल गर्ग ।

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