Sunday, 6 December 2015

पिरोया धागा।

पिरोया  धागा हूँ मैं
सुई के खीचते तनाव के साथ
बढ़ता जाता हूँ
देता जाता हूँ क्षमता का बलिदान
कपडो को छेदती सुई
मुझे पिरोती जाती
गूथती रहती छेदो बीच
बड़ा अजीब हैं जीवन
बान्धता जाता हूँ
टूटे अपनों के जर्जर रिस्ते
परिवार के भी मानवता के भी
अर्पित करता जाता नीजपन
ओर लेने लगता हैं आकार
कि बनते हैं पहनने के वस्त्र
ढकते हैं शरीर
बचाते हैं तन की आबरू
मेरे प्राणों का धागा
ठीक सरकता हुआ
अर्पित मानवता
मानव की विकृति  के बिखरे  टुकड़े
जोडता जाता
कि सौम्य रूप ले सके
मनुष्य की मानवता
यह धागे सा अस्तित्व
अति महिन
नमनीयता संग
सर्वाग अर्पित करता
बनाता हैं भावमय संसार
कि मानव की दैत्यता
नहीं ले पाये असली स्वरूप
यह सुंदर भावों की सिलाई
निमित्त बने मानवता
कि श्वास टूटे विकृत मानसिकता की
ससीम हैं धागे का विस्तार
फिर मशीनी युग झटके
नही कह सकता
कितना हो पाऊगा सफल
पर अभी हूँ
ओर होने का अहसास
गति देता हैं
निरंतर
धागे ओर भावों की
शात्विक साम्यता
जीवन रहते ।
छगन लाल गर्ग।

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