Monday, 30 November 2015

उघडे नहीं हो।

उघडे नहीं हो
सुरक्षित रहे हो
बाहर की तपन
हवा ओर बरसात का बरसना
छुआ नहीं तुम्हें
बना हूँ आवरण
मैं तुम्हारा
मोटा हूँ
अहसास नहीं होने देता तुम्हें
ताप वर्षा ओर तपन का
सहता हूँ मैं
कि तुम्हारी चमक कायम रहे
नये ताजे बने रहो
आवरण हूँ मैं तुम्हारा
पर अब लंबे अर्से बाद
जर्जर हुआ हूँ
कट फट गया हूँ
कहां छोड़ते हो मुझे
उघड रहा हूँ मैं
अस्तित्व उपयोगी नहीं रहा मेरा
पर ओढा हैं अब भी तुमने
अंतिम श्वास तक इस्तेमाल का इरादा तुम्हारा
गिनती श्वास लिए
विपदाओ से झूझता हूँ
तुम्हारे लिए
हर बार की तरह
सहन हो पाएगा
प्रखर आती हैं ऑधी
विनाश लिए
मिटना तय हैं
पर तुम भरोसा कहां छोड़ते हो
तुम्हारा अस्तित्व
सोचते काम्पता हूँ
क्या होगा
तुम्हारी चमक तुम्हारा सौन्दर्य
भर जाता हैं मन
भीतरी जीना तुम्हारा
कैसे हो पायेगा
कहां से आयेगा विश्वस्त आवरण
अच्छा होता
आवरण नहीं होता मैं य
स्वयं झुझते परिपक्व होते
परिपक्व हुए बिना
अबोध मिट जाना
क्या त्रासदी नहीं हैं मेरी
सुनो अगर जीवन चाहते
आवरण हटाओ
जीवन खुद के संघर्ष तले जीओ
समय रहते सुविधा जीना छोड़ो
बनो खुद के लिए
खुद ही आवरण
निकलो बाहर
उघडो संपूर्ण अस्तित्व के साथ
जीओ खेत के अनाज की तरह
यह जीना ही सार्थक होगा
अस्तित्व साबित किए बिना
जीवन जीना कैसे कहूँ ।
छगन लाल गर्ग।


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