जलते देखा मैंने
भावनाओं को
मेरी अपनी
हृदय का बिखरापन समेटे
जीती रही
बिखरे कागजो मे
सिमटी सिमटी
झिझकती रही
अभिव्यक्ति पाने से
विवश रही अव्यक्त रही
अधूरापन लिए भी
जीना चाहती रही
विकल दशा मे भी
करती रही पूर्णता पाने का अभ्यास
हृदय के कोरे कागज पर
अमिट हुई
अंकित हुई
समूचा सतह घेरे जमी रही
कैसे मिटती
मुश्किल था मिटा देना
हृदय का कागज
नष्ट होता
यदि प्रयास मिटाने का होता
लंबा अर्सा बिता
अंकित भावों को इकजाई करने मे
पर हर भावना रखती अस्तित्व
प्रथक अपना
स्थाई अस्थाई भावों का मेल
बेमेल बनता
जुडने का परिणाम कैसे पाता
होता रहता
नित संघर्ष एक दूसरी के साथ
भीषण बंवडर
उमडने का भय
बोझिल हुआ जाता कि जी सकू
थोड़ा सा
खूब आजमाता रहा
पिरोने मे एक लय होने मे
समूचा अस्तित्व
कि पा जाऊ भावनामय
जिन्दगी
हो जाय जीवन कविता मय
अधूरा ही रहा मैं
ओर मेरा प्रयास
न हो सका सपना पूरा
नेह भी प्राण भी अस्तित्व भी
समर्पित करता रहा
काम नहीं आया
भावनाएँ अपूर्ण रही
जिन्दगी कविता नहीं हुई
विवेक उभरता रहा
अस्तित्व बताता
देता जाता मुझे संबल
नया रंग नया रूप
कि बन जाय मिसाल
विवेक भावना का समन्वय
संगम हो घना
तोल मोल बिना का
न हो सका
हारा सा
स्वीकार था अपूर्णता जीऊ
आधी अधूरी भावना संग
जीना चाहता था मैं
पर यह विवेक
वर्चस्व लिए चाहता हैं जीना
चकाचौंध भरी जिन्दगी
समय बंध प्रयास के पल
बख्शे मुझे
ओर अब हारा हूँ भावना से भी
विवेक से भी
जडवत हैं अस्तित्व
दर्द संजोये
अपने ऑखो के सामने
विवेक जलाता जाता
मेरी आधी अधूरी भावनाएँ
भावनाओं के जलते पुलिन्दे की तपन
भीतर तक सेकती हैं
मुस्कराते विवेक को देखता हूँ
यह तपन ओर बढती हैं
असंभित हूँ मैं
कि जीता भी हूँ ।
छगन लाल गर्ग।
भावनाओं को
मेरी अपनी
हृदय का बिखरापन समेटे
जीती रही
बिखरे कागजो मे
सिमटी सिमटी
झिझकती रही
अभिव्यक्ति पाने से
विवश रही अव्यक्त रही
अधूरापन लिए भी
जीना चाहती रही
विकल दशा मे भी
करती रही पूर्णता पाने का अभ्यास
हृदय के कोरे कागज पर
अमिट हुई
अंकित हुई
समूचा सतह घेरे जमी रही
कैसे मिटती
मुश्किल था मिटा देना
हृदय का कागज
नष्ट होता
यदि प्रयास मिटाने का होता
लंबा अर्सा बिता
अंकित भावों को इकजाई करने मे
पर हर भावना रखती अस्तित्व
प्रथक अपना
स्थाई अस्थाई भावों का मेल
बेमेल बनता
जुडने का परिणाम कैसे पाता
होता रहता
नित संघर्ष एक दूसरी के साथ
भीषण बंवडर
उमडने का भय
बोझिल हुआ जाता कि जी सकू
थोड़ा सा
खूब आजमाता रहा
पिरोने मे एक लय होने मे
समूचा अस्तित्व
कि पा जाऊ भावनामय
जिन्दगी
हो जाय जीवन कविता मय
अधूरा ही रहा मैं
ओर मेरा प्रयास
न हो सका सपना पूरा
नेह भी प्राण भी अस्तित्व भी
समर्पित करता रहा
काम नहीं आया
भावनाएँ अपूर्ण रही
जिन्दगी कविता नहीं हुई
विवेक उभरता रहा
अस्तित्व बताता
देता जाता मुझे संबल
नया रंग नया रूप
कि बन जाय मिसाल
विवेक भावना का समन्वय
संगम हो घना
तोल मोल बिना का
न हो सका
हारा सा
स्वीकार था अपूर्णता जीऊ
आधी अधूरी भावना संग
जीना चाहता था मैं
पर यह विवेक
वर्चस्व लिए चाहता हैं जीना
चकाचौंध भरी जिन्दगी
समय बंध प्रयास के पल
बख्शे मुझे
ओर अब हारा हूँ भावना से भी
विवेक से भी
जडवत हैं अस्तित्व
दर्द संजोये
अपने ऑखो के सामने
विवेक जलाता जाता
मेरी आधी अधूरी भावनाएँ
भावनाओं के जलते पुलिन्दे की तपन
भीतर तक सेकती हैं
मुस्कराते विवेक को देखता हूँ
यह तपन ओर बढती हैं
असंभित हूँ मैं
कि जीता भी हूँ ।
छगन लाल गर्ग।
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