Friday, 11 December 2015

समय घिरा सूर्य ।

अब कहो
सूर्य तुम्हारी तेजस्विता
समय के हाथों
धूली धुलायी नहीं
अब तुम प्रखर तापी
क्यों नहीं रहे
ठंडक का मिजाज
क्या अच्छा भाता तुम्हें
या विवशता तुम्हारी
कि फिक्र करते
ठंडी के अस्तित्व की
रहे वह भी
साबित करे होना अपना
समदर्शी भावों का
बीज तो नहीं बोते
कि मानवता परिमार्जन पाये
वहीं करते हो
समय बद्ध
केवल भावों मे त्याग के मोती लिए
समेटते हो अपनी ऊर्जा
पर देखते हो हमें
पल्लवित हैं तुमसे
होना ही काफी तुम्हारा
बदला रूप ही सही
तुम हो
आभास ही जीवन हमारा
उदित होते ही
चाहत लिए
भीतर तक नहाना चाहते
ऊर्जा तुम्हारी
फिर नहीं चाहत
ओरो की छाया
जो ठोस कर दे हमें
नितान्त खुलापन भाता
जहाँ बिखरी हैं रश्मिया तुम्हारी
कोमलता से इठलाती
सेकती हैं हमें
भीतरी चेतना का प्रवाह
प्राण तन समाता जाता
नहीं हैं उबाल की विकलता
समरसता का यह ताप
अनसीखी सीख भरता
संतुलन देता
बहता नस नस
दिगभ्रान्त जीता जन जीवन
क्या पल की इस ठौर
रूकेगा
समय का पहिया
खींच ले जीवन
समरसता का पाठ
सूर्य सी उष्मा देगा
तनिक हमें भी
समय सीख भरे।
छगन लाल गर्ग।


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