Thursday, 31 December 2015

नमन तुझे ।

विख्यात शिल्पी
स्वीकारो ना नमन मेरा
तेजस्विता समाती नहीं
चित मेरे
शब्दों का रहस्य
नहीं झेल पाता अर्थ
गुम्फित भावों का जाल
चक्रव्यूह बना फसाता मुझे
स्वीकारो ना नमन मेरा
खूब खेलते हो खूबसूरती से
भावों की क्रीड़ाऐ पाती हैं विस्तार
परमाणु से शरीर मे
फूँक देते हो प्राण
बिम्ब उतारते जाते सशरीर चित मेरे
कि नहीं हो पाता चेतन
डूबता हूँ अनंत के तल
निर्मोही बने निहारो ना मुझे
स्वीकारो ना नमन मेरा
भूतल घना निर्मम
अंगडाई लेती
घेरती तन्हाईयो मे
पिघलते प्राण मे
व्यथा कर जाते हो लघु
सौन्दर्य के छाये मे
सुला देते हो भाव मेरे
नहीं पाता फिर चेतना
अचेतन का राग बने तुम
आ जाते हो
स्वीकारो ना नमन मेरा
रहस्यमय जीवन के स्वामी
किस पाठ का स्तवन करते
शैली तुम्हारी आम नहीं
पर जीवन भी क्या
आम नहीं
किस माटी के गढे हो शिल्पी
स्थूल तुम्हारा तन भी नहीं
मन मर्म मानव होकर
जान ना पाऊ मेरे शिल्पी
कैसे जीवन मानव बनकर
जी लेते अब रहस्य यही
बार बार मिटने का शरणो मे
भाव गहराता अचेतन घना
स्वीकारो ना नमन मेरा
हाँ यह सत्य
नासमझ घना हूँ
राहे अलौकिक जहाँ चलते हो
मिट मिट अस्तित्व
चलना होता हैं
कडवे सारे घूट विष सम
जान बूझ कर पीने पडते हैं
तब कही तेजस्विता तुम्हारी
हम तक आकर
रश्मिया देती हैं
बडे त्यागी तपस्वी से तुम
मेरे शिल्पी
नमन तुझे ।
छगन लाल गर्ग।




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