कहां हो तुम
पद चिन्हो को तलाशता
मिथ्या हुआ मेरा चेतन
भ्रमित जीवन पवन सा
टकरता जाता शैल अचेतन बना
निस्सारता गहन बीहड का भटकाव झेले
निहारता जाता हूँ
सामर्थ्य की सीमा तक सृष्टि का हर कोण
कहीं बिम्ब दिखता नहीं
कहां तुम
आ पहुँचा हूँ सागर तट
जहां विरल हिलोरे
उमडती हैं अनंत की ओर
अपार हलचल बीच
अटक अटक जाता हैं चेतन मेरा
तन भिगोता हैं लहरों का नीर
यह उठाव ठहरा सा बसता जाता
चित मेरे
हाथों की अंजलि बीच
भरता जाता हूँ सागर का विस्तार
सामर्थ्य को नकारता सा
बसाता जाता हूँ हृदय स्थल
यह भराव अनूठा तजूर्बा देता मुझे
नासमझी की समझ बनाता जाता अपनी
कहीं इस रूप तो नहीं हो तुम
द्रवित हूँ मैं
वेदना की अतिशयोक्ति का प्रमाण बना
हुआ हूँ विरल
बनना चाहता हूँ हम रूप तुम्हारा
विलय चाहता हूँ
जहां तुम हुए
चेतना को लिए लहरों का सौन्दर्य
भाया था तुम्हें
मेरे प्राण अपने मूल से प्रथक
विलग हुए एकलय नीर संग
मेरे जीवन की अविस्मरणीय
त्रासदी का सूत्र धार बने
ढूँढता हूँ तुम्हें
कहां हो तुम
सागर की लहरे ऊँची उठती
गगन छूती
मेरे अंश तुम साथ ही हो
लहरों भीगे बादल घेरना चाहते हैं मुझे
ऐसा तुम्हारे होने से होता हैं
आओ इसी रूप आओ
मिलो मुझे
एकमेक करो मुझे भी
लो तुम्हारे संग
बिना तुम्हारे अस्तित्व
अकारण हैं मेरा
देखते हो हवाओं का बहना
तुम्हें साथ लिऐ
ओस ढकती जाती मुझे
मेरे चेतन को
घनीभूत हुए हो तुम
प्रकृति के हर अंश मे समाहित
नहीं हूँ चेतन स्वरूप
मिला हूँ तुमसे
एकाकार हुआ हूँ
अंतराल मिटा मिटा सा
नहीं होता बिखराव
मेरा कि तुम्हारा
स्वप्नवत मैं भी
तुम सा।
छगन लाल गर्ग।
पद चिन्हो को तलाशता
मिथ्या हुआ मेरा चेतन
भ्रमित जीवन पवन सा
टकरता जाता शैल अचेतन बना
निस्सारता गहन बीहड का भटकाव झेले
निहारता जाता हूँ
सामर्थ्य की सीमा तक सृष्टि का हर कोण
कहीं बिम्ब दिखता नहीं
कहां तुम
आ पहुँचा हूँ सागर तट
जहां विरल हिलोरे
उमडती हैं अनंत की ओर
अपार हलचल बीच
अटक अटक जाता हैं चेतन मेरा
तन भिगोता हैं लहरों का नीर
यह उठाव ठहरा सा बसता जाता
चित मेरे
हाथों की अंजलि बीच
भरता जाता हूँ सागर का विस्तार
सामर्थ्य को नकारता सा
बसाता जाता हूँ हृदय स्थल
यह भराव अनूठा तजूर्बा देता मुझे
नासमझी की समझ बनाता जाता अपनी
कहीं इस रूप तो नहीं हो तुम
द्रवित हूँ मैं
वेदना की अतिशयोक्ति का प्रमाण बना
हुआ हूँ विरल
बनना चाहता हूँ हम रूप तुम्हारा
विलय चाहता हूँ
जहां तुम हुए
चेतना को लिए लहरों का सौन्दर्य
भाया था तुम्हें
मेरे प्राण अपने मूल से प्रथक
विलग हुए एकलय नीर संग
मेरे जीवन की अविस्मरणीय
त्रासदी का सूत्र धार बने
ढूँढता हूँ तुम्हें
कहां हो तुम
सागर की लहरे ऊँची उठती
गगन छूती
मेरे अंश तुम साथ ही हो
लहरों भीगे बादल घेरना चाहते हैं मुझे
ऐसा तुम्हारे होने से होता हैं
आओ इसी रूप आओ
मिलो मुझे
एकमेक करो मुझे भी
लो तुम्हारे संग
बिना तुम्हारे अस्तित्व
अकारण हैं मेरा
देखते हो हवाओं का बहना
तुम्हें साथ लिऐ
ओस ढकती जाती मुझे
मेरे चेतन को
घनीभूत हुए हो तुम
प्रकृति के हर अंश मे समाहित
नहीं हूँ चेतन स्वरूप
मिला हूँ तुमसे
एकाकार हुआ हूँ
अंतराल मिटा मिटा सा
नहीं होता बिखराव
मेरा कि तुम्हारा
स्वप्नवत मैं भी
तुम सा।
छगन लाल गर्ग।
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