Saturday, 26 December 2015

मेरे नेही।

मेरे नेही
मत स्वीकारो मुझे
मेरा होना ही
मूल बाधा मेरे नेह की
लिपट जाता हैं राग
द्वी अर्थ देता
कि रूक जाता हैं मिलन
ओर जीवन जलता
विरह की ताप
नेह धार हो जाती अवरुद्ध
दीवार बन जाता द्वेत
विलय हुआ भी
कहां हुआ एकरस
स्वीकार करो
यह नेह मिलन
 अधूरा अधूरा
काम भरा
नहीं हो पाता संतुष्ट
नहीं पाता संपूर्णता
जहां घेरती तल्लीनता
क्षण बनी
नहीं पाता आकार
ममत्व पात्र बने
नेह नहीं झेल पाता दुराव
मिट मिट जाता तन
यही लयबद्ध स्नेह का सच
यह नेह
हुआ चाहता घना विरल
अति सूक्षम
जहां रह जाते केवल
आभास के परमाणु
बंद ऑखो को
चिरती रौशनी की तरह
जहां अस्तित्व के धब्बे
सूक्षम आकार बनते
अपनी कालिमा लेते
नहीं चाहता
मेरा नेह कालिमा
अरूण आभा के रहते
नहीं रे नेह
रहने दो
मत स्वीकारो मुझे
स्वतः होने दो
अचेतन को समा लेने दो
चेतन मे
यह एकाकार
बनने दो निर्मल
जहाँ होता जाता
नेह निर्मल
अधिक उज्ज्वल
सृजन के बीज
बोने दो
कि सृष्टि पा जाये
अमूल्य स्नेह का राग
बहने दो नेह मेरा
इसी धार अटूट
कि मिट जाना मेरा
दे जाये
अद्वेत का सार।
छगन लाल गर्ग।



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