Sunday, 27 December 2015

खिचकते रिस्ते।

अपनत्व अंतिम पड़ाव
ढूँढता रहता अस्तित्व
कि कहीं स्नेह का कतरा
अवशेष मिल पाये अपनों से
कि होता रहे मन का कोना स्नेहिल
घनत्व अरमान नित देते अवरोध
नीजता लालायित संबंध
जहां स्वयं का मोह पालता सपने
अपने नीजी स्वार्थ के
नहीं हो पाता सामंजस्य
अपने रक्त संबधो बीच
भीतरी मनोमेल चढता जाता
मस्तिष्क ओर मन
ओर होने लगता
दिखावे का पाखण्ड
जहां रूटिन जीते रिस्ते
अपना अपना जीवन
जितने पास पास दिखते जाते
होते जाते भीतरी दूर उतने
एक लाचारी जीते हैं रिस्ते
नहीं रहा लगाव कोई
जो बन सके आलम्बन
सुख दुख पल झेलने
एक ऊपरी आवरण शब्द जीते
निभाने होते हैं रिस्ते
यह सीमा परम्परा तक
हृदय जगत हैं सूना सूना
गहरा अंतराल नहीं पाटता दूरिया
मतलब जीते मतलब निभते
आज के रिस्ते
लगता हैं निरंतर
खिचकते हैं रिस्ते।
छगन लाल गर्ग।




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