अचेतन मेरे
निर्मलता का घनापन छिपाये
रहते हो भीतर
अथाह पायी हैं गहराई
सागर सी
रहस्यमय हो तुम
अव्यक्त हैं अस्तित्व
संकेत देते जाते
ओर अनुकरण का अनुगामी बना
मैं तलाशता जाता हूँ
जीवन के मायने
रह रह जाता हूँ अबूझ
चेतन संसार के आशक्ति मे फसा
रहस्य का बिम्ब उभरता
अति सूक्ष्म
भीतरी दृश्य महसूसता हूँ मैं
परमाणु बन लेते हो आकार
अति कोमल सुगंध निर्मित
तन मन हो जाता सुरभित मेरा
असीम सौन्दर्य का पारावार
लहराता देता हैं भावनाओं की तंरग
खिलते जाते अनंत कुसुम
असीम सौन्दर्य लिए
हो जाता अस्तित्व मेरा
द्रव्य सा नमनीय
तभी पाता हूँ मैं व्यक्तित्व का आकार
राग विराग मंथन लेता हैं अंकुर
देता जाता जीवन नवनीत
ओर उभरने लगते हैं राग
वहीं देते मुझे जीवन लय
लेने लगता प्राण ऊर्जा
उतरने लगता हैं घना संगीत
हो जाता हूँ अति विरल
द्रव्य सा
उठती जाती सतरंगी हिलोरे
मादकता गाती रस मदमाती
ऊँचाई नापती अनंत की
दीदार करती हैं दिव्य का
बाहरी बिम्ब होते रहते धूमिल
परिवर्तित होते अलौकिक आकार
निर्लिप्त हो जाता मेरा चेतन संसार
अचेतन मेरे
बान्धता जाता हूँ डोर तेरी
स्थूल सृष्टि से
ओर होता जाता स्थूल भी
अलौकिक सौन्दर्य आगार
यह दृष्टि
अचेतन पल निधि मेरी
कि हो जाता हूँ मैं सृष्टि पार
डूबता हूँ विरल नेह सागर
गून्थता जाता हूँ
पावन भावों का संसार
हो जाता हूँ ससीम पार
पर यह चेतन घेरता
बार बार
परिणिति का आभास
देता जाता तुम्हारा ही
विराग राग
महसूस होता फिर
हुआ जाता हूँ मैं
अस्तित्व विहिन
न देह न सृष्टि
अपरिमित पसरा घना
सन्नाटा
सार हीन अर्थ हीन
हो जाता हूँ
अचेतन तेरा विराग बिम्ब
उमडा संसार रीता हो जाता
नहीं पाता हूँ ठौर
हल्का हुआ बहता हूँ
पवन संग
नापने लगता
चेतन अन्तराल
मिट मिट जाता अस्तित्व
अचेतन हुआ हैं
मेरी चेतना का राग
उभरने लगी रे संगीत वीणा
राग लहरियो मे
खो खो जाता अस्तित्व मेरा
मेरे अचेतन आओ
कि जले
मन मंदिर के पावन दीप
ना घेरे चेतन मुझे
राग महासागर मिलू
अचेतन ले चलो मुझे ।
छगन लाल गर्ग।
निर्मलता का घनापन छिपाये
रहते हो भीतर
अथाह पायी हैं गहराई
सागर सी
रहस्यमय हो तुम
अव्यक्त हैं अस्तित्व
संकेत देते जाते
ओर अनुकरण का अनुगामी बना
मैं तलाशता जाता हूँ
जीवन के मायने
रह रह जाता हूँ अबूझ
चेतन संसार के आशक्ति मे फसा
रहस्य का बिम्ब उभरता
अति सूक्ष्म
भीतरी दृश्य महसूसता हूँ मैं
परमाणु बन लेते हो आकार
अति कोमल सुगंध निर्मित
तन मन हो जाता सुरभित मेरा
असीम सौन्दर्य का पारावार
लहराता देता हैं भावनाओं की तंरग
खिलते जाते अनंत कुसुम
असीम सौन्दर्य लिए
हो जाता अस्तित्व मेरा
द्रव्य सा नमनीय
तभी पाता हूँ मैं व्यक्तित्व का आकार
राग विराग मंथन लेता हैं अंकुर
देता जाता जीवन नवनीत
ओर उभरने लगते हैं राग
वहीं देते मुझे जीवन लय
लेने लगता प्राण ऊर्जा
उतरने लगता हैं घना संगीत
हो जाता हूँ अति विरल
द्रव्य सा
उठती जाती सतरंगी हिलोरे
मादकता गाती रस मदमाती
ऊँचाई नापती अनंत की
दीदार करती हैं दिव्य का
बाहरी बिम्ब होते रहते धूमिल
परिवर्तित होते अलौकिक आकार
निर्लिप्त हो जाता मेरा चेतन संसार
अचेतन मेरे
बान्धता जाता हूँ डोर तेरी
स्थूल सृष्टि से
ओर होता जाता स्थूल भी
अलौकिक सौन्दर्य आगार
यह दृष्टि
अचेतन पल निधि मेरी
कि हो जाता हूँ मैं सृष्टि पार
डूबता हूँ विरल नेह सागर
गून्थता जाता हूँ
पावन भावों का संसार
हो जाता हूँ ससीम पार
पर यह चेतन घेरता
बार बार
परिणिति का आभास
देता जाता तुम्हारा ही
विराग राग
महसूस होता फिर
हुआ जाता हूँ मैं
अस्तित्व विहिन
न देह न सृष्टि
अपरिमित पसरा घना
सन्नाटा
सार हीन अर्थ हीन
हो जाता हूँ
अचेतन तेरा विराग बिम्ब
उमडा संसार रीता हो जाता
नहीं पाता हूँ ठौर
हल्का हुआ बहता हूँ
पवन संग
नापने लगता
चेतन अन्तराल
मिट मिट जाता अस्तित्व
अचेतन हुआ हैं
मेरी चेतना का राग
उभरने लगी रे संगीत वीणा
राग लहरियो मे
खो खो जाता अस्तित्व मेरा
मेरे अचेतन आओ
कि जले
मन मंदिर के पावन दीप
ना घेरे चेतन मुझे
राग महासागर मिलू
अचेतन ले चलो मुझे ।
छगन लाल गर्ग।
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