यह अध्ययन
किताबों का
अनवरत गढता जाता विद्वानो को
ओर होती रहती हैं
नित नयी नयी समीक्षाऐ
मिलती जाती हैं नित नयी किताबों से ज्यादा
व्याख्याऐ
ओर विद्वान हमारे करते जाते हैं शौध
जीवन का नहीं
किताबों का
जिनके सत्य
आज के जीवन से बेमेल
करते जाते हैं अनुभूतियों पर
नित नये प्रहार
ओर जीवन खोया खोया
ढूँढता जाता अपना यथार्थ
कहीं नहीं पाता खुद को
न किताबो मे ओर न ही
शोध प्रबंधो मे
अब हर जीवन छटपटाहट लिए
जीता जाता अधूरा अधूरा
हर अनुभूति नहीं पाती
अभिव्यक्ति
ओर होते जाते हैं विवश
घुटने को भीतर ही भीतर
अभिव्यक्ति के आधार
मापदंड पुख्ता चाहिए
करना होता हैं साबित
प्रसिद्ध ग्रंथ का अन्वेषण
किए बिना
साबित तगमा पाये बिना
अभिव्यक्ति हो जाती निरर्थक
यह साबित होना
बहुत कुछ हैं निर्धारित
पहचान ओर रूतबा
सीढ़ीया निर्धारित
बहुत कुछ मिल जाता हैं
सब बहुत व्यवस्थित
मापदंड हैं पूर्व निर्धारित
कि सामान्य अभिव्यक्ति
नहीं उतरती खरी
सीढ़ी बन जाती सपना
ओर घूटती जाती
भीतर की भीतर
ओर टूटता जाता अभिव्यक्ति का दम
सामान्य की अनुभूति
मरती रहती बेमोत
यह कसक बहुत कम
अनुभूत करते हैं मापदंड
उन्हें खतरा हैं
अपने अस्तित्व का
शाश्वत जीवन भाता नहीं
बदलाव अस्मिता मिटाता हैं
पर यह क्या होगा
कि शाश्वत झुठलाया जाये
लेना होगा परिमार्जन का खतरा
स्थापित ढकोसले जर्जर हुए
फिर भी जी तोड़ करते हैं विरोध
देते जाते तर्क
मापदंडों का
संघर्ष गहराता हैं
सत्य अनुभूति के भाव
रेखाओं का आकार चाहते हैं
अपना मौलिक अस्तित्व लिए
तोड़ने होंगे सीमाओ के मापदंड
यान्त्रिक बनी किताबें
नहीं देती सत्य
यह युग चाहता हैं
अपना अस्तित्व अपना व्यक्तित्व
उपक्रमों का सत्य
पूर्णता का मापदंड कभी नहीं रहा
मापदंडों की चट्टाने तोड़
सामान्य व्यक्ति की अभिव्यक्ति
बहना चाहती हैं
धरातल तलाशती।
छगन लाल गर्ग।
किताबों का
अनवरत गढता जाता विद्वानो को
ओर होती रहती हैं
नित नयी नयी समीक्षाऐ
मिलती जाती हैं नित नयी किताबों से ज्यादा
व्याख्याऐ
ओर विद्वान हमारे करते जाते हैं शौध
जीवन का नहीं
किताबों का
जिनके सत्य
आज के जीवन से बेमेल
करते जाते हैं अनुभूतियों पर
नित नये प्रहार
ओर जीवन खोया खोया
ढूँढता जाता अपना यथार्थ
कहीं नहीं पाता खुद को
न किताबो मे ओर न ही
शोध प्रबंधो मे
अब हर जीवन छटपटाहट लिए
जीता जाता अधूरा अधूरा
हर अनुभूति नहीं पाती
अभिव्यक्ति
ओर होते जाते हैं विवश
घुटने को भीतर ही भीतर
अभिव्यक्ति के आधार
मापदंड पुख्ता चाहिए
करना होता हैं साबित
प्रसिद्ध ग्रंथ का अन्वेषण
किए बिना
साबित तगमा पाये बिना
अभिव्यक्ति हो जाती निरर्थक
यह साबित होना
बहुत कुछ हैं निर्धारित
पहचान ओर रूतबा
सीढ़ीया निर्धारित
बहुत कुछ मिल जाता हैं
सब बहुत व्यवस्थित
मापदंड हैं पूर्व निर्धारित
कि सामान्य अभिव्यक्ति
नहीं उतरती खरी
सीढ़ी बन जाती सपना
ओर घूटती जाती
भीतर की भीतर
ओर टूटता जाता अभिव्यक्ति का दम
सामान्य की अनुभूति
मरती रहती बेमोत
यह कसक बहुत कम
अनुभूत करते हैं मापदंड
उन्हें खतरा हैं
अपने अस्तित्व का
शाश्वत जीवन भाता नहीं
बदलाव अस्मिता मिटाता हैं
पर यह क्या होगा
कि शाश्वत झुठलाया जाये
लेना होगा परिमार्जन का खतरा
स्थापित ढकोसले जर्जर हुए
फिर भी जी तोड़ करते हैं विरोध
देते जाते तर्क
मापदंडों का
संघर्ष गहराता हैं
सत्य अनुभूति के भाव
रेखाओं का आकार चाहते हैं
अपना मौलिक अस्तित्व लिए
तोड़ने होंगे सीमाओ के मापदंड
यान्त्रिक बनी किताबें
नहीं देती सत्य
यह युग चाहता हैं
अपना अस्तित्व अपना व्यक्तित्व
उपक्रमों का सत्य
पूर्णता का मापदंड कभी नहीं रहा
मापदंडों की चट्टाने तोड़
सामान्य व्यक्ति की अभिव्यक्ति
बहना चाहती हैं
धरातल तलाशती।
छगन लाल गर्ग।
No comments:
Post a Comment