Tuesday, 29 December 2015

अचेतन काल।

घनत्व घीरा मानव
विशाल चेतना का धनी
विवेक की अतिशयता जाल
घीरता जाता प्रतिपल
विस्तृत अवबोध
चिन्तन करता सिद्धांत
अवधारणाओ का निचोड देता
गूथता जाता विचारों की कड़ी
कि अहमियत बने
विश्लेषण किये विचारों का संपूट
दे अधिक गुम्फन जीवन को
ओर लगे जीवन अधिक विकट
जटिलतम सुलझते पाया पैनापन
नहीं आत्मसात स्वयं
विचार ओर जीवन
केवल समीक्षा तर्क का ताना बाना
नहीं होता जीवन संसर्ग
गहरा अंतराल विचार व जीवन
ओर चिन्तक भ्रमित स्वयं भी
पर मापता जाता असीम विचार
तारतम्य हीन
ओर यह जीवन बना देता
अधिक विषम ओर जटिल
नहीं बडा सरल हैं जीवन
अगर हम जीने दे सरलता
चेतन हैं  जीना जीवन
यथार्थ अनुभव ही सत्य
अचेतन विचार
भ्रमित करते मानव
कल्पनाओ के गगन से
चेतन धरातल जीना ही
जीवन हैं
छोडना होगा अगम्य
अचेतन काल।
छगन लाल गर्ग।

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