मानव हूँ
पूछता अपने से
जवाब नहीं पाता
हाँ सच यह
आकार मानव सम
रूप सौन्दर्य निखरा सा
पर संचय
हृदय करता
विवेक नहीं करता
कहता जाता
हाँ अति सभ्य
सुसंस्कृत हूँ मैं
नहीं कोई तर्क
जो नकारे मानवता
पर यह विरोधी हृदय
कहां मानता
परख तो उसी की
स्वयं का अहसास
आत्मावलोकन उसी का
नहीं मानव नहीं मैं
गिर चुका
मानवता से
यह युग विवेक भरा
हृदय संवेदना नहीं जीता
यह पुरानपंथी बनाता
असभ्य ही रखता
आज मैं
विवेकी हूँ
अपना हित सर्वोत्तम
पर हित का प्रश्न
विवेक नहीं मानता
झिझकता नहीं कहता
अब मैं
मानव हूँ
कह देता हूँ
मैं हूँ सभ्य
मैं हूँ विकसित
मैं हूँ प्रगतिशील
नहीं जीता मानवता
कैसे कह दू
मानव हूँ ।
छगन लाल गर्ग।
पूछता अपने से
जवाब नहीं पाता
हाँ सच यह
आकार मानव सम
रूप सौन्दर्य निखरा सा
पर संचय
हृदय करता
विवेक नहीं करता
कहता जाता
हाँ अति सभ्य
सुसंस्कृत हूँ मैं
नहीं कोई तर्क
जो नकारे मानवता
पर यह विरोधी हृदय
कहां मानता
परख तो उसी की
स्वयं का अहसास
आत्मावलोकन उसी का
नहीं मानव नहीं मैं
गिर चुका
मानवता से
यह युग विवेक भरा
हृदय संवेदना नहीं जीता
यह पुरानपंथी बनाता
असभ्य ही रखता
आज मैं
विवेकी हूँ
अपना हित सर्वोत्तम
पर हित का प्रश्न
विवेक नहीं मानता
झिझकता नहीं कहता
अब मैं
मानव हूँ
कह देता हूँ
मैं हूँ सभ्य
मैं हूँ विकसित
मैं हूँ प्रगतिशील
नहीं जीता मानवता
कैसे कह दू
मानव हूँ ।
छगन लाल गर्ग।
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