क्यों नहीं स्वीकारते
मेघावी मन अपनी तुच्छता
अवान्छित ज्ञान के पुञ्ज
दंभ का आवरण तुम्हारा
बहुत हैं ढीला
अनेको छिद्र झान्कते हैं भीतर
ओर वहीं से प्रवेशता अंधकार
ओर मिटाते जाते हो तुम
चतुराई भरे
चमक देते शब्दों से
सत्य का भीतरी आकार
ढाकते जाते हो तर्को के जाल
दावे शब्दों के भरते हैं हूकार
करते वहीं हो जो होता
तुम्हारे हित
भीतर तुम्हारा खोखला सा
निराधार
प्रकृति के तनिक से वार
वाकशक्ति तुम्हारी भौथरा जाती
फिर ढूँढते हो आधार
तर्को का
पुस्तकें बनती हैं साथी
देते रहते अनर्गल तर्क
सर्वज्ञता का दंभ
कहां छोडते हो मेरे मन
प्रकृति ओर मेघा की
छिपा छिपी का खेल
सरकती जाती हैं जिन्दगी
स्वीकार करो ना
तुच्छता अपनी
कि कठपुतली हो तुम
समय का पहेलु बदलते
बदल जाती अनुभूतिया
तुम्हारी
तुम केवल स्पंदन हो समय का
जीवन्त रूप तुम्हारा
तुम्हारे चाहे का नहीं
प्रकृति की चमक हो
तुम्हारी तार्किक अभिव्यक्ति
अधूरी अपरिमार्जित
मेघा निर्मित मापदंड
विशाल विराट का केवल अंश
रजनी का अंधकार
जाने बिना
मेरे मन तुम्हारी मेघा
सवेरा चाहती
यह होगा कैसे
क्यों नहीं स्वीकारते
मेरे मेघावी
अपनी तुच्छता।
छगन लाल गर्ग।
मेघावी मन अपनी तुच्छता
अवान्छित ज्ञान के पुञ्ज
दंभ का आवरण तुम्हारा
बहुत हैं ढीला
अनेको छिद्र झान्कते हैं भीतर
ओर वहीं से प्रवेशता अंधकार
ओर मिटाते जाते हो तुम
चतुराई भरे
चमक देते शब्दों से
सत्य का भीतरी आकार
ढाकते जाते हो तर्को के जाल
दावे शब्दों के भरते हैं हूकार
करते वहीं हो जो होता
तुम्हारे हित
भीतर तुम्हारा खोखला सा
निराधार
प्रकृति के तनिक से वार
वाकशक्ति तुम्हारी भौथरा जाती
फिर ढूँढते हो आधार
तर्को का
पुस्तकें बनती हैं साथी
देते रहते अनर्गल तर्क
सर्वज्ञता का दंभ
कहां छोडते हो मेरे मन
प्रकृति ओर मेघा की
छिपा छिपी का खेल
सरकती जाती हैं जिन्दगी
स्वीकार करो ना
तुच्छता अपनी
कि कठपुतली हो तुम
समय का पहेलु बदलते
बदल जाती अनुभूतिया
तुम्हारी
तुम केवल स्पंदन हो समय का
जीवन्त रूप तुम्हारा
तुम्हारे चाहे का नहीं
प्रकृति की चमक हो
तुम्हारी तार्किक अभिव्यक्ति
अधूरी अपरिमार्जित
मेघा निर्मित मापदंड
विशाल विराट का केवल अंश
रजनी का अंधकार
जाने बिना
मेरे मन तुम्हारी मेघा
सवेरा चाहती
यह होगा कैसे
क्यों नहीं स्वीकारते
मेरे मेघावी
अपनी तुच्छता।
छगन लाल गर्ग।
No comments:
Post a Comment