Thursday, 24 December 2015

चलता हूँ ।

चलता हूँ
गहरे निश्वास
कहता हूँ
माँ की खोयी खोयी ऑखे
शून्य गगन मे
निहारती हैं
ठीक हैं
अस्फूट शब्दों से
माँ की अनुमति के बोल
कानों मे गून्जते हैं
एक कतरा ऑसू
भीतर ही भीतर
उमडते महसूसता हूँ
नहीं आते बाहर
भीतर सूखते भी नहीं
तन की एक एक धमनी मे
प्रवाहित हुआ बहता हैं
माँ की बाहरी खटिया
छाया घेरती जाती हैं
सर्दी का समय
सर्द हवाओं के झौके
जर्जर तन चिरते होंगे
महसूसता ताकने लगता हूँ
अपने सूने मकान की ओर
देखता हूँ ताला लगा
शायद ही खुले
विवादित जिरह मे फसा
भाइयों के बँटवारे का सच
झेलता सूनापन
उधर पाता हूँ
घूरती हुई पत्नी
एकबार फिर
माँ से कहता हूँ
तुम चलो ना
हमारे साथ
माँ के स्वर डूबते जाते
कहीं दूर से पायी ऊर्जा बटोरते
नहीं यही रहने दो
मेरे पति की स्मृतियो तले
कैसे छोडू
अनचाही ठेठ भीतर से
निश्वास लिए भाइयों से कहता हूँ
देखभाल की
फिर अपना जीवन
अपने परिवार के साथ
जीने चलता हूँ
अपनी गाड़ी मे
बैठता हूँ
युग के सत्य से
कदमताल करती
रफ्तार लेती हैं गाड़ी
ओर मैं
महसूस करता हूँ
मेरी जिन्दगी की रफ्तार
थम सी ग ई हैं
माँ की तरह।
छगन लाल गर्ग।


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