Tuesday, 15 December 2015

यह नेह।

यह नेह
अंतर का स्पंदन
धमनियों का तीव्र उतेजना प्रवाह
ऊर्जा का घनत्व
बहता रहता नेह
तेरी ओर
संपूर्ण अस्तित्व ही
अपनत्व लिए
घनाकार हुए
 प्रतिफलन चाहता
नेह तेरा
कि इस ऊर्जा का उफान
झेले पात्र
उसी घनत्व घेरे
भाव देह ओर मन
यह अतिरेक
विस्फोट सा प्रवाहित
सारे राग एकाकार हुए
जीवन धारित मनोभाव
गुम्फन हुआ
गुजरने लगा हैं मध्य
अंतराल मिटाता
हृदय बीच
दोनों ओर
यह नेह पुञ्ज
अदृश्य करता जाता
दब जाते अन्य भाव
अहसास पाता परिमल
नेह का
पल उभरा हैं नेह बस
पावन परम प्रार्थना सा
कतरे दबे
द्वन्द घृणा अहं के भी
नहीं प्रकट प्रतीती
पर हैं अंश
मरे कहां
हैं इसी मे अंतर्लीन
यह पल हैं शास्वत
पर संसारी प्रकृति
मिटता भी हैं
फिर देता जाता
अपनी असली पहचान
जिसमें हैं राग द्वेष
छिपी छिपी घृणा
यही तो हैं
मेरे संसार का नेह
शुद्ध पावनता देता
आवेशित पल
चाहे हो गरज भरी
पर अहसास
वहीं वहीं शास्वत नेह का
वहीं पल जीवन
पकड आता नहीं
समर्पण हुआ यदि हृदय
बन जाता
जीवन हमारा पावन
यह पल की घटना
यदि बहे मानव मन
नित झरे
गति भरे
अंतर स्पंदन चले
प्रभु की प्रार्थना हैं यही
रस अंबार
परम नेह भीगे जीवन
जीवन सार केवल
यही नेह का पल ।
छगन लाल गर्ग।




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