Saturday, 26 December 2015

सामर्थ्य मेरा।

अब अधिक महसूस होता
प्रकृति  सामर्थ्य
संभवतः जानने के बाद
सामर्थ्य मेरा
नकारता रहा हर तेरा रूप
अपनी सामर्थ्य की सीमा तक
इससे पहले भी
ओर जीता रहा लिए अवलम्ब
कृत्रिम संसाधनों का
पर आज
वहीं संसाधन होते जाते
नाकारा
नहीं दे पाते ऊर्जा भरा सामर्थ्य
भीतरी ऊर्जा की रिक्ततावस
ओर यह सर्द झोके
कर जाते प्रवेश
बंद कमरे के भीतर तक
बंद किया शरीर भी
आत्मसात हुआ जाता
तुमसे
अब हर सर्दी का पल
जीना होता
ठिठुरन भरा
प्रयासो का गणित
नहीं ले पाता हिसाब
विवशता मे उठाता जाता निगाहें
करता हूँ अवलोकन भी
पुनरावलोकन भी
ढूँढता हूँ छिद्र
जहां से सर्द हवाओं
प्रवेश होती मेरे भीतर
नही पाता सार
मात्र अहसास ठिठुरन
कि तुम हो
होना तुम्हारा साबित हुआ
बाहरी सूर्य रश्मिया
हो चुकी हैं तिरछी
लगता हैं घुली मिली हैं तुमसे
एक मौन समझौता
तुम दोनों का
केवल देते हो अहसास
अपने होने का
सर्द हवाओं
पहचानने लगा तुम्हें
महसूस करता हूँ तुम्हें
भीतर बहती हो
मेरी धड़कनो की तरह
स्वतः चेतना मयी
आया हूँ मिटाने तुम्हें
अलाव जलाये
बुझाने लगती हो आग
झपटो के बल
ओर पाता हूँ तुम दोनों के
बीच छिडता संग्राम
अधकच्चा प्रयास मेरा
नहीं दे पाता ठावस
कि ऊर्जा बटोरू
निकल आया हूँ
सूर्य की तिरछी किरणों बीच
आश्रय ढूँढता हूँ उष्मा का
अच्छा हैं
थोड़ा संतुष्ट हूँ
पर यह संतुष्टि
ठीक वैसी ही
जैसे ऑखो की काजल
सौन्दर्य देती
पर रोशनी नहीं
प्रकृति का यह रूप
नया कहां
हर बार का आना जाना
सर्दी के दिनों
नहीं शिकवा मेरा
कि क्यों हो तुम
शिकवा हैं जीवन से
कि तुम्हे जाने बिना
अहं जीता रहा होने का
वस्तुतः तुम भी तो
हो इसी प्रकृति का अंश
नहीं पृथक अस्तित्व
कि करते जाओ अहंकार
नीजता का।
छगन लाल गर्ग।



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