Monday, 14 December 2015

स्वीकार्य ।

मेरे अंतर
निढाल हुआ
अब नहीं कोई ऊहापोह
न अति
न महत्वाकांक्षा
जगह नहीं रही
परिणाम सारे पा चुका
सार हीन सारा पाया
प्यास वहीं की वहीं
सुख आया गया
अतृप्ति का घडा अभी भी खाली
ओर हूँ क्या
अभी भी अज्ञात
चाहत गुम्फन मे उलझा उलझा
अनजान इच्छाओ की बेतहाशा तडप
रहता हूँ भार लदा
एक उतरते ही
ओर आ जाता
महत्वाकांक्षा का विचार
ओर इसे क्या विचार कहूँ
नहीं यह हैं वासना
नहीं जीता विचार युग
कहां हैं ठहराव
दौड ओर संघर्ष
बेभान हुआ जाता जीना
सत्य केवल जीत
तरीका नहीं सच्चाई
यह जीवन नहीं रहा गाँधीवादी
या कि अहिंसावादी
कोई वादो का जाल नहीं
महत्वाकांक्षाओ का जीवन
उठा पटक ओर चालाकी का सत्य
यही तो जीया
पर दौडा दौडी के इस खेल
खूब हाँफता रहा
पाया भी नकारा हुआ
पाते ही पाये की चमक
फीकी
कीमत जाती रही
जो भी पाया
रंगत फीकी
पर यह भीतर रहा
हमेशा खाली
इस खालीपन के चक्रव्यूह
तमाम मानवीयता
भूलता रहा
दौडता रहा
पाया न बहुत
 बेसकिमती
पर हाथ आते ही
होता रहा कद्रहीन
भरता रहा वस्तुएँ
होता जाता नित शून्यमय
अंतहीन निराशा लिए
आज भी भरा नहीं
न नेह न गेह ओर न देह
हारा थका जीवन
ओर अंतर
अब तू जैसा भी
स्वीकार्य मुझे ।
छगन लाल गर्ग।




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