वह ठीक कहता हैं
कहने दो
शब्द मैल धोते हैं
पवित्र होने दो
संगीत सुर अखरता हैं
पर राग झरने दो
अंधेरा काला घना हैं
छिपी रौशनी आने दो
नारकीय पीड़ा आती हैं
उसी ताप निखरने दो
धन मद चमकता घना हैं
मद मार से बचने दो
सता मोह अंकुर लेता हैं
भक्ति नमन पनपने दो
वर्चस्व साबित प्रबल चाह हैं
नहीं हूँ का भाव आने दो
प्रसिद्धि चाह की हलचल हैं
जीवंत कर्म परामर्थ होने दो
छल कपट जंजाल घेरता हैं
आत्मावलोकन शुद्धि होने दो
बनावट प्रदर्शन तन मन छाया हैं
कहने दो
शब्द मैल धोते हैं
पवित्र होने दो
संगीत सुर अखरता हैं
पर राग झरने दो
अंधेरा काला घना हैं
छिपी रौशनी आने दो
नारकीय पीड़ा आती हैं
उसी ताप निखरने दो
धन मद चमकता घना हैं
मद मार से बचने दो
सता मोह अंकुर लेता हैं
भक्ति नमन पनपने दो
वर्चस्व साबित प्रबल चाह हैं
नहीं हूँ का भाव आने दो
प्रसिद्धि चाह की हलचल हैं
जीवंत कर्म परामर्थ होने दो
छल कपट जंजाल घेरता हैं
आत्मावलोकन शुद्धि होने दो
बनावट प्रदर्शन तन मन छाया हैं
No comments:
Post a Comment