Monday, 30 November 2015

उघडे नहीं हो।

उघडे नहीं हो
सुरक्षित रहे हो
बाहर की तपन
हवा ओर बरसात का बरसना
छुआ नहीं तुम्हें
बना हूँ आवरण
मैं तुम्हारा
मोटा हूँ
अहसास नहीं होने देता तुम्हें
ताप वर्षा ओर तपन का
सहता हूँ मैं
कि तुम्हारी चमक कायम रहे
नये ताजे बने रहो
आवरण हूँ मैं तुम्हारा
पर अब लंबे अर्से बाद
जर्जर हुआ हूँ
कट फट गया हूँ
कहां छोड़ते हो मुझे
उघड रहा हूँ मैं
अस्तित्व उपयोगी नहीं रहा मेरा
पर ओढा हैं अब भी तुमने
अंतिम श्वास तक इस्तेमाल का इरादा तुम्हारा
गिनती श्वास लिए
विपदाओ से झूझता हूँ
तुम्हारे लिए
हर बार की तरह
सहन हो पाएगा
प्रखर आती हैं ऑधी
विनाश लिए
मिटना तय हैं
पर तुम भरोसा कहां छोड़ते हो
तुम्हारा अस्तित्व
सोचते काम्पता हूँ
क्या होगा
तुम्हारी चमक तुम्हारा सौन्दर्य
भर जाता हैं मन
भीतरी जीना तुम्हारा
कैसे हो पायेगा
कहां से आयेगा विश्वस्त आवरण
अच्छा होता
आवरण नहीं होता मैं य
स्वयं झुझते परिपक्व होते
परिपक्व हुए बिना
अबोध मिट जाना
क्या त्रासदी नहीं हैं मेरी
सुनो अगर जीवन चाहते
आवरण हटाओ
जीवन खुद के संघर्ष तले जीओ
समय रहते सुविधा जीना छोड़ो
बनो खुद के लिए
खुद ही आवरण
निकलो बाहर
उघडो संपूर्ण अस्तित्व के साथ
जीओ खेत के अनाज की तरह
यह जीना ही सार्थक होगा
अस्तित्व साबित किए बिना
जीवन जीना कैसे कहूँ ।
छगन लाल गर्ग।


Sunday, 29 November 2015

जला दी भावनाएँ ।

जलते देखा मैंने
भावनाओं को
मेरी अपनी
हृदय का बिखरापन समेटे
जीती रही
बिखरे कागजो मे
सिमटी सिमटी
झिझकती रही
अभिव्यक्ति पाने से
विवश रही अव्यक्त रही
अधूरापन लिए भी
जीना चाहती रही
विकल दशा मे भी
करती रही पूर्णता पाने का अभ्यास
हृदय के कोरे कागज पर
अमिट हुई
अंकित हुई
समूचा सतह घेरे जमी रही
कैसे मिटती
मुश्किल था मिटा देना
हृदय का कागज
नष्ट होता
यदि प्रयास मिटाने का होता
लंबा अर्सा बिता
अंकित भावों को इकजाई करने मे
पर हर भावना रखती अस्तित्व
प्रथक अपना
स्थाई अस्थाई भावों का मेल
बेमेल बनता
जुडने का परिणाम कैसे पाता
होता रहता
नित संघर्ष एक दूसरी के साथ
भीषण बंवडर
उमडने का भय
बोझिल हुआ जाता कि जी सकू
थोड़ा सा
खूब आजमाता रहा
पिरोने मे एक लय होने मे
समूचा अस्तित्व
कि पा जाऊ भावनामय
जिन्दगी
हो जाय जीवन कविता मय
अधूरा ही रहा मैं
ओर मेरा प्रयास
न हो सका सपना पूरा
नेह भी प्राण भी अस्तित्व भी
समर्पित करता रहा
काम नहीं आया
भावनाएँ अपूर्ण रही
जिन्दगी कविता नहीं हुई
विवेक उभरता रहा
अस्तित्व बताता
देता जाता मुझे संबल
नया रंग नया रूप
कि बन जाय मिसाल
विवेक भावना का समन्वय
संगम हो घना
तोल मोल बिना का
न हो सका
हारा सा
स्वीकार था अपूर्णता जीऊ
आधी अधूरी भावना संग
जीना चाहता था मैं
पर यह विवेक
वर्चस्व लिए चाहता हैं जीना
चकाचौंध भरी जिन्दगी
समय बंध प्रयास के पल
बख्शे मुझे
ओर अब हारा हूँ भावना से भी
विवेक से भी
जडवत हैं अस्तित्व
दर्द संजोये
अपने ऑखो के सामने
विवेक जलाता जाता
मेरी आधी अधूरी भावनाएँ
भावनाओं के जलते पुलिन्दे की तपन
भीतर तक सेकती हैं
मुस्कराते विवेक को देखता हूँ
यह तपन ओर बढती हैं
असंभित हूँ मैं
कि जीता भी हूँ ।
छगन लाल गर्ग।



संकेत अनंत आता।

संकेत अनंत आता
अन्तराल शून्य भरता आता
उठने लगे अब ओर विस्तृत
बादलों का साम्राज्य लेकर
भाव देते रहस्य कहते
सिलसिले हैं अनंत के सब
श्याम वर्ण रंगे घने हैं
बादलो के रूप लेकर
कोई स्थिर कोई भार गंभीर
चंचल चित उमड ढकते तन चले अब
घेरते जाते उछाह भर
चित सागर के किनारे
उछाह भरी लहरों को धूमिल करते
बना रहे अब खुद के अनुरूप
चित सागर किनारे आकर
श्वेत सत उछाल देते बन जाते फेन
ढकते जाते उफान सीमा बन
संकेत आता अब किनारों को
रिसते हैं पिघलन सागर से
तरल अस्तित्व बन जाता प्रति पल
अचेतन गति अदृश्य बहती
स्थिर रहे इस भूतल मे
जन्म पाती यह गति
स्थिरता के आँगन मे
इसी आँगन से मिलती ऊर्जा
तरल बन उभरती आसमानो मे
घटा बन अब संकेत घना
रसधार बरसाती रेत हुए तन मे
चित दरिया बन बन निखर उठा हैं
विलय निमित्त अनंत तुझमे
ओर भी हुए हैं क्या
विलिन चिन्ह चित देख रहा
पदचिन्ह खोते रहे क्या
अनंत तेरे आगोश मे
हो रहा हूँ
मिट रहा हूँ पदचिन्ह पहचानता
ओर बन रहा हूँ
मैं अनंत
नहीं हैं यह करूणालय
रसानन्द का सागर बहता
न हूँ मैं
न कोई आभास भी
यह प्रकृति होती जाती
विलिन मुझमें मैं उसमें
मिट जाता हूँ मैं
अनंत का संकेत
नहीं अब मैं हुआ जाता हूँ अनंत ।
छगन लाल गर्ग।




Saturday, 28 November 2015

अचेतन मेरे ।

अचेतन मेरे
निर्मलता का घनापन छिपाये
रहते हो भीतर
अथाह पायी हैं गहराई
सागर सी
रहस्यमय हो तुम
अव्यक्त हैं अस्तित्व
संकेत देते जाते
ओर अनुकरण का अनुगामी बना
मैं तलाशता जाता हूँ
जीवन के मायने
रह रह जाता हूँ अबूझ
चेतन संसार के आशक्ति मे फसा
रहस्य का बिम्ब उभरता
अति सूक्ष्म
भीतरी दृश्य महसूसता हूँ मैं
परमाणु बन लेते हो आकार
अति कोमल सुगंध निर्मित
तन मन हो जाता सुरभित मेरा
असीम सौन्दर्य का पारावार
लहराता देता हैं भावनाओं  की तंरग
खिलते जाते अनंत कुसुम
असीम सौन्दर्य लिए
हो जाता अस्तित्व मेरा
द्रव्य सा नमनीय
तभी पाता हूँ मैं व्यक्तित्व का आकार
राग विराग मंथन लेता हैं अंकुर
देता जाता जीवन नवनीत
ओर उभरने लगते हैं राग
वहीं देते मुझे जीवन लय
लेने लगता प्राण ऊर्जा
उतरने लगता हैं घना संगीत
हो जाता हूँ अति विरल
द्रव्य सा
उठती जाती सतरंगी हिलोरे
मादकता गाती रस मदमाती
ऊँचाई नापती अनंत की
दीदार करती हैं दिव्य का
बाहरी बिम्ब होते रहते धूमिल
परिवर्तित होते अलौकिक आकार
निर्लिप्त हो जाता मेरा चेतन संसार
अचेतन मेरे
बान्धता जाता हूँ डोर तेरी
स्थूल सृष्टि से
ओर होता जाता स्थूल भी
अलौकिक सौन्दर्य आगार
यह दृष्टि
अचेतन पल निधि मेरी
कि हो जाता हूँ मैं सृष्टि पार
डूबता हूँ विरल नेह सागर
गून्थता जाता हूँ
पावन भावों का संसार
हो जाता हूँ ससीम पार
पर यह चेतन घेरता
बार बार
परिणिति का आभास
देता जाता तुम्हारा ही
विराग राग
महसूस होता फिर
हुआ जाता हूँ मैं
अस्तित्व विहिन
न देह न सृष्टि
अपरिमित पसरा घना
सन्नाटा
सार हीन अर्थ हीन
हो जाता हूँ
अचेतन तेरा विराग बिम्ब
उमडा संसार रीता हो जाता
नहीं पाता हूँ ठौर
हल्का हुआ बहता हूँ
पवन संग
नापने लगता
चेतन अन्तराल
मिट मिट जाता अस्तित्व
अचेतन हुआ हैं
मेरी चेतना का राग
उभरने लगी रे संगीत वीणा
राग लहरियो मे
खो खो जाता अस्तित्व मेरा
मेरे अचेतन आओ
कि जले
मन मंदिर के पावन दीप
ना घेरे चेतन मुझे
राग महासागर मिलू
अचेतन ले चलो मुझे ।
छगन लाल गर्ग।






Friday, 27 November 2015

संध्या आमन्त्रण ।

आओ संध्या
असीम कालिमा लिए
प्रवेश करो धीरे धीरे
आने दो धुन्धलापन
घर के भीतर
सूर्य की रश्मियो का मद
उतरता जाता
उतरने दो
फैलाओ धुन्धलका
करो अपने काल अंधेरे को साकार
पर मैं बूझने नहीं दूँगा
प्राणों का दीया
लघु अस्तित्व ही सही
अपनी गरिमा देता
जल उठेगा मेरा रोशन  दीया
नहीं रखता अपनी ज्वाला
तो क्या हुआ
अस्तित्व क्षमता रखता
जगाता हैं भीतरी रोशनी
नहीं करता प्रखरता का दावा
पर रखता हूँ दम
मिटाता हूँ भीतर का अंधकार
मेरे घर की कालिमा
बाहर के अंधेरे
नहीं डरा पाते मुझे
नही क्षमता
बाहर अंधकार मिटाऊ
तो क्या हुआ
संकेत हूँ मैं
तुम्हारे नाश का
देखते हो रूप मेरा
निखरा सा कंचन सा
जलता हुआ
तुम्हें जलना निखरना कहां आया
फर्क हैं
हम दोनों बीच
साफ साफ़ सतही
मेरा जलना उष्मा बनती
प्राणों की
टिमटिमाना मेरा संघर्ष
तुमसे
रोशनी जिन्दगी हैं मेरी
अंधेरे का खेल कहां
केवल सन्नाटा तुम्हारा
मौत सा
जीवन के लक्षणो से हीन
जड हो तुम
तुम्हारी क्रिया केवल एक
अंधकार
मैं हूँ क्रिया
संघर्ष ओर जीवन का चेतन
हारता कहां मेरा उजाला
आंशिक ही सही
देता हूँ चुनौती तुम्हें
जो करती हैं भयभीत तुम्हें
मैं हूँ
प्रकृति सूर्य का अंश
मानव चेतना का दीपक
मुझसे ही तपीस पाता हैं मानव
मिटाता जाता जीवन का अंधेरा
सूर्य के इन्तजार तक
देखो मेरा संघर्ष
एक काल सीमा के उजाले का बिम्ब
अंधेरे को मिटाते
सूर्य के अंश मे
रूपान्तरित होता हूँ
फर्क हैं ना
मेरे तुम्हारे का।
छगन लाल गर्ग।

कहां हो तुम ।

  कहां हो तुम
पद चिन्हो को तलाशता
मिथ्या हुआ मेरा चेतन
भ्रमित जीवन पवन सा
टकरता जाता शैल अचेतन बना
निस्सारता गहन बीहड का भटकाव झेले
निहारता जाता हूँ
सामर्थ्य की सीमा तक सृष्टि का हर कोण
कहीं बिम्ब दिखता नहीं
कहां तुम
आ पहुँचा हूँ सागर तट
जहां विरल हिलोरे
उमडती हैं अनंत की ओर
अपार हलचल बीच
अटक अटक जाता हैं चेतन मेरा
तन भिगोता हैं लहरों का नीर
यह उठाव ठहरा सा बसता जाता
चित मेरे
हाथों की अंजलि बीच
भरता जाता हूँ  सागर का विस्तार
सामर्थ्य को नकारता सा
बसाता जाता हूँ हृदय स्थल
यह भराव अनूठा तजूर्बा देता मुझे
नासमझी की समझ बनाता जाता अपनी
कहीं इस रूप तो नहीं हो तुम
द्रवित हूँ मैं
वेदना की अतिशयोक्ति का प्रमाण बना
हुआ हूँ विरल
बनना चाहता हूँ हम रूप तुम्हारा
विलय चाहता हूँ
जहां तुम हुए
चेतना को लिए लहरों का सौन्दर्य
भाया था तुम्हें
मेरे प्राण अपने मूल से प्रथक
विलग हुए एकलय नीर संग
मेरे जीवन की अविस्मरणीय
त्रासदी का सूत्र धार बने
ढूँढता हूँ तुम्हें
कहां हो तुम
सागर की लहरे ऊँची उठती
गगन छूती
मेरे अंश तुम साथ ही हो
लहरों भीगे बादल घेरना चाहते हैं मुझे
ऐसा तुम्हारे होने से होता हैं
आओ इसी रूप आओ
मिलो मुझे
एकमेक करो मुझे भी
लो तुम्हारे संग
बिना तुम्हारे अस्तित्व
अकारण हैं मेरा
देखते हो हवाओं का बहना
तुम्हें साथ लिऐ
ओस ढकती जाती मुझे
मेरे चेतन को
घनीभूत हुए हो तुम
प्रकृति के हर अंश मे समाहित
नहीं हूँ चेतन स्वरूप
मिला हूँ तुमसे
एकाकार हुआ हूँ
अंतराल मिटा मिटा सा
नहीं होता बिखराव
मेरा कि तुम्हारा
स्वप्नवत मैं भी
तुम सा।
छगन लाल गर्ग।



Thursday, 26 November 2015

विवेक रस ।

यह अच्छा हुआ
नहीं जीता अंतर्द्वंद
नहीं हैं मार
संवेदनाओ की भीतर
कि विवेक ओर आशक्ति बीच
होता रहे संघर्ष
श्रम तो झूझा
पर अब काबू मे हूँ
सपाट भाता हैं जीना
यह राग संवेदना
नहीं बहता भीतर
उलझन मिटी
स्त्रोत रोका हैं मैंने
अब निश्चित
विवेक जीता हूँ
अपनी क्षमताऐ जानने लगा हूँ
विचारों का
जगमगाता पूञ्ज
रोशनी के कतरे
चारों ओर से प्रकाशित
घेरे हैं मुझे
पहुँच पहुँच हुआ हूँ
ऊँचाई के शिखर
अभ्यास से पार हुआ
संवेदनाओ के जाल से
नहीं होता अब
लाचारो के शोषण का दर्द
विवेक की चिन्गारिया
जलती हुई
उजाडती जाती बस्तियों
गरीबों की
संतोष होता हैं अपने विवेक पर
तर्को का सामर्थ्य
बसाता जाता नये भव्य भवन
चर्चित हुआ बेखटके
घनी आबरू जीता हूँ
अब तुम्ही सोचो
स्मार्ट क्या यूँ ही होंगे
बिना गरीबों को नष्ट किये
विवेकियो का अन्वेषण
हो चुका
मानव सुविधा ऐसे ही आती हैं
मानव की बली पर
दिव्य होने का सपना
विवेक ही करेगा
तुम्हें सीखने होंगे गुर
सभ्यता के
अभी वक्त माहोल बना हैं
मानवता का
आओ जीए तब तक विवेक
जब तक जागरण न हो
आम का
भीतरी सत्य जानने मे
समय मत लगाओ
अंधेरा रहने दो यहाँ
अन्यथा विवेक रस
जल जाएगा
संसार संजोया बनावटी विवेक
मिथ्या करोगे क्या
पागल मत बनो
स्वार्थ रस मीठा
विवेक रस पीओ
निन्द खुलने तक ही सही ।
छगन लाल गर्ग।



Wednesday, 25 November 2015

बदलता दृश्य ।

नहीं रहा
कभी रहा
परिदृश्य प्रति पल
बदल देता समूचा
अस्तित्व मेरा
दृश्य हूँ मैं
अब नहीं कर पाता
अन्तर्मन आभासित तुम्हारे
दृश्य सौन्दर्य की अनूठी
अभिव्यक्ति
नहीं दे पाता रस डूबे
शब्दों की अभिव्यक्ति
अब दृश्य बदला
तुम्हारा
कलोल कल्पनो का घेरा
नहीं घिरता हैं हृदय
कि दू कोई दिव्य उपमा
असाधारण व्यक्तित्व भरे
सौन्दर्य को
अब दृश्य बदला हैं
खूब कहा
रमणीयता का भंडार तुम्हें
भीतर तक पहुँचने का दावा
करता रहा
प्रकट कहां सत्य
छलावा ही देता रहा
तुम्हें भी
स्वयं को भी
सारी अभिव्यक्ति
 बाहरी दृश्य की रही
यह नयी अनुभूति
दृश्य की नहीं
भीतर से महसूसता हूँ
मुश्किल हैं
क्या नाम दू इसे
फिर नाम देना भी
क्या सत्य होगा
बेनाम ही रहने दो
सत्य केवल अंश बना
उभरता जाता
कि अभिव्यक्ति मे प्रेम नहीं
छलावा हैं खुद जन्मा
आशक्ति का अधूरापन
निशब्द भीतर प्रवेश
अदृश्य की झलक पाता
जहां सत्य बदलता नहीं
दृश्य रज्जू के बिना ही
मेरे मित
आने दो भीतर
पाने दो किनारा
रहने दो अव्यक्त मुझे
यह दृश्य दूषित करता जाता
निश्छल सौन्दर्य
आधुनिक जीवन की तरह
मेरे मित
उभरता हैं अहो भाव
भीतर होता जाता प्रार्थना
होने दो
प्रेम यह
अदृश्य ही रहने दो।
छगन लाल गर्ग।










टहनियो की टीस।

 तरल जीवन की टीस
पाता हूँ
समर्पित प्रिय को
टहनिया
इनका सच
अप्रकट्य रहता
भोगती रहती मौन साधे
पीड़ा का अंबार
नहीं लेता कोई टोह
जानते भी
उपेक्षा कर जाते
माना हैं नियति इनकी
काम इनका
सृजन
कोमल कपोलो को
अपनी प्राण ऊर्जा देकर
ऊर्जा स्वयं की न सही
हो वितरण मात्र
संचय नहीं रखती
भीतर अपने खातिर
कि स्वयं हो सके
पुष्ट ओर सबल
नहीं हैं नसीब उसके
ओर अगर
पुष्टि की अभिलाषा
होती हैं विस्तृत
काट दी जाती हैं समूल
अस्तित्व संग कहीं
स्वयं की भावना
कि विस्तार स्वयं का हो
भूलना भाग्य हैं इनका
कार्य मात्र सृजन
कोमल कान्त पल्लव सहित
जन्म दे पुष्प व फल
जीवन मात्र
सृजन समर्पित
सृष्टि हैं स्वयं का बोध
स्वयं की इच्छा
ओर अस्तित्व
हाथों पराये
यह सच
रौदता जाता
हृदय की अस्मिता को
कि समाज हमारा
निर्दयी घना
रौदता जाता
नारी का सृजन
सृजक की पीडा की
गहरी कसक
टीस बनी सालती जाती
यह सच का चिन्तन
समाज को
स्वीकार करना होगा ।
छगन लाल गर्ग।





नहीं कारण।

नहीं कारण
मेरे आंशिक बिम्ब
कि तुम नहीं आते
पास मेरे
नहीं होते सहारा
मेरे जर्जर बुढ़ापे का
ओर इसी कारण
हृदय उथला हो गया हैं
या कि मेरे स्नेह की हिलोरे
नहीं लेती अंगडाईया
नहीं हैं कारण
होता हैं यह सब
तुम्हारा अपना भी परिवार हैं
अपने लिए जीना
प्रवृत्ति हैं हर इन्सान की
यह सब
अच्छा लगता हैं
सोचना तुम्हारे बारे मे
तुम्हारी सेहत
तुम्हारा संघर्ष ओर मिले परिणाम
तुम्हारे बाल बच्चे
अटकता हैं मन
वहां भी
दूर हो तुम
यह अंतराल भी सालता हैं
तुम्हारी तरक्की की
रफ्तार का वेग
मुझ तक भी पहुँचता हैं
होता रहता हूँ तरंगित
ओर गरिमा पाता हूँ
अपने होने का
आभास भी
भीतर ही भीतर
संवेदित भी होता हूँ
बाहर नहीं हूँ मैं पात्र
तुम्हारी चर्चाओ मे
तुम्हारा रूतबा महसूसता हूँ मैं
पर दुनिया को बताऊ कैसे
तुमसे छोटा होने का भीतरी अहसास
दुनिया पुत्र समझती हैं मेरा
मैं मूल रहते भी
आज अमूर्त जीता हूँ
सागर की अनंत लहरे
आज घनी ऊँचाई पर हैं
जो अवहेलना करती जाती
सागर की
निहारता हूँ अपनी ही लहरों को
ऊँची उठी
मोहक लगती
सूर्य रश्मियो के
सतरंगी नजारो मे लिपटी
भाता हैं मुझे
हर दर्शक लेता रहता
सौन्दर्य बोध
पर नासमझ भीतर मेरा
सूना सा
शान्त सा
भूला सा
कि तुम कभी मेरे भी थे
ये सतरंगी हिलोरे
उपजी मेरे
विस्तार पायी मुझसे
चेतना का मूल रहा हूँ
मैं कभी
भूल चुके तुम
चौधिया रोशनी के सच तले
अच्छा लगता हैं
पर फिर भी
तुम्हारे न होने से
कारण इसी
विशाल जल पाये भी
ऑखे स्तम्भित
रोती नहीं  हैं
मन का यह सागर
सुख गया हैं ।
छगन लाल गर्ग।

Tuesday, 24 November 2015

ऑसू मेरे ।

ऑसू मेरे
छोड़ो भीतर
उफान घनेरा
झेल न पाऊ
दुनिया देखे
बहना छोड़ो
रहो भीतर पर
बिन देखे ही
बहना जानो
विरल हृदय
मत छोड़ो रीता
उपजो नित नित
हृदय समाओ
भाव उफानमय
झिलमिल करते
समाओ घनेरे
जीवन मेरे
आमंत्रण नहीं यह
मेरे अपने
जीवन मेरा
तरल मोती बनाओ
विपदाओ के सागर मेरे
लहरों से नित
उन्माद भरो रे
मत रहना तुम
दुख से उपजे
अति सुख मे भी
चेतन बन जाओ
व्याकुल चित मत
करो बसेरा
भाव विभाव मे
बहते जाओ
निर्मल होता
आते जब हो
विनम्र हृदय हुआ
तनिक द्वार खुलने दो
अस्तित्व बसो तुम
प्रार्थना बन जाओ
उभरो घनेरे
अलौकिक बनो रे
जीवन जब तक
बरसो जी भर
कहां जुदा हो
मेरे बने हो
मुझको नित
पिघलाते जाओ
रहे ना जरा भी
अहंकार की शिला
हिम खंड यह जीवन
पिघलाते जाओ
द्वार खोलो मेरी
पावनता का
बसू करू विश्राम घनेरा
ऑसू मेरे
हो तुम सुख देय
दुनिया ले रही
प्रतीक हैं दुख के
तुम हो विवेकी
झुठलाते जाओ
प्रभु विरह का
माध्यम रहो तुम
घेरो रे घेरो
हृदय जगत का
द्रव्य भरी इन
महिन धारो मे
मिलता दिखता
मुझे किनारा
पहुँच पहुँच हुआ हूँ
पावनधार सहारे तेरे
द्वार प्रभु तक
ऑसू मेरे
छोड़ो भीतर ।
छगन लाल गर्ग।



हारा हूँ ।

हारा हूँ जिन्दगी तुझे
भाता हैं हारना मुझे
जीत हैं एक दीवा स्वप्न
फिसलता नित हाथ मेरे
हारा हूँ जिन्दगी तुझे
बनावट हैं अनोखी तुम्हारी
भाये बिना जीता रहा हूँ
समझ आती नहीं अभी भी
तू हार हैं कि जीत हैं
आई जहां से भी तुम
अबूझा सा जीता रहा मैं
लगता समूचे काल खण्ड
बनती जाती मेरी प्रति छाया
हारा हूँ जिन्दगी तुझे
अवगुणो की जीत तुम
भागता हूँ अवगुणो से
पाया भी जीत जब भी
खटकती हर श्वास मेरी
महसूसता हूँ रात दिन
अटकती जिन्दगी मंझधार हो
अपनाता जाता जिन्दगी तुम्हारी
हार का साम्राज्य घना
हारता मैं जिन्दगी तुझे
पावनता की चाह मे
जीत हार रूप तेरा
आकार तेरा वस्त्र सा
अवगुञ्ठित तुम
जीत हार डोर हो
अवगुण आडे सदगुण सीधे
ताने बाने से निर्मित हो
हार जीत का मर्म जिन्दगी
पाता जाता अभी जीता हूँ
झूठ फरेब का राह चमकीला
हृदय भीतर ही टूट जाता
टूटे चित नहीं सुहाता
छोड़ राह यह जीता हूँ
आओ हार स्वागत तुम्हारा
प्रार्थना उठती हैं भीतर से
इसका तनिक सा मर्म समझ लो
तंत्रीनाद यह सुनो तो
निर्मल सी महिन धारा हैं यह
राग उसी मे खोने दो
स्वीकार्य हैं हार जिन्दगी
हारा हुआ ही जीने दो।
छगन लाल गर्ग।

Monday, 23 November 2015

तिनका हूँ मैं ।

तिनका हूँ मैं
भावनाओं की नदी का
बहाव तेज
दौडती हैं पागल नदी
घना उन्माद लिए
आस पास के मर्यादित किनारे
ढहाती बहती जाती
प्रबल वेगमय
उतावलापन झलकता जाता
एकलय होने को असीम से
भावूक आवेग देता हैं प्रगाढता
प्रेम की
नेह नीर नाहक तिनका हूँ मैं
रोकना चाहता हूँ यह
भावो का बहाव
कूदा हूँ विवेक का संघर्ष लिए
बहती भाव धारा बीच
रोकना चाहू बार बार
बुद्धि बल के हथकण्डो से
बाधक आडा अस्तित्व लिए
जूटा हूँ संघर्ष रत हूँ
बुद्धि हथियार लेकर
बड़ा कठिन महसूसता हूँ
स्वयं की अस्मिता
आश्वस्त हूँ
नकारा परिणामों से भी
भावना के आवेग का
प्रतिरोधी हूँ मैं
पर भाव नदी बहा ले जाती मुझे
अपनी दिशा
नकारती हुई अस्तित्व मेरा
असमझ की पराकाष्ठा हूँ मैं
बहता ही जाता मायिक वेग मे
अबाधित नदी के जीवन प्रवाह के साथ
रोकना रूकना हाथ कहां मेरे
स्वीकारना होगा कटु सत्य
जीवन मेरे
कि तिनका हूँ मैं ।
छगन लाल गर्ग।



जीवन यात्रा ।

महसूस करता हूँ क्षण तुझे
धव्यन्यात्मकता पाता हूँ तेरी
जीवन राग व उन्मादो का मिलन
कर्मण्यता हुई परिवर्तित करती जाती
जीवन मेरा
महसूस करता जाता
चलती हैं जीवन यात्रा
जीया हूँ
जीवन तुझे हर क्षण रीता
विवेक ओर भावों बीच
संघर्ष पाया निरंतर
महसूस करता जाता
अतीत मेरा
बेपरिणाम गुजरा हैं
पदार्थ संग्रहण की यात्रा
अंजाम शून्य
सालता अतीत सालती हैं जिन्दगी
महसूस होता बार बार
रही कहां यात्रा यह
आनन्द विहिन जिन्दगी
क्षण की गहराई अछूती रही
होता जाता संचय जीया
यात्रा समय चाहे
क्षण नहीं
पर मैं क्षण मोह रहा
जो हुआ अविलम्ब नष्ट
क्षण समय कहां हुआ मेरा
कास कुछ लंबाई पाती जिन्दगी
अब विसर्जन चाहता हूँ
क्षण तुझमे
समूचा व्यक्तित्व लेकर
डूबना चाहता हूँ
क्षण तेरी गहराई मे
अथाह गहराई
सत्य के मोती
बेबूझ बना
चाहता हूँ पाना
यात्रा की अंतिम मंजिल ।
छगन लाल गर्ग।


अनसीखा हैं सत्य ।

जीना चाहता
अनसीखी जिन्दगी
मुझे जीने दो
भर गया हैं मन अब
तर्को के व्यूह से
मुक्ति चाहता हूँ
घनी आकार हो गयी
शुष्कता
नही पाता आनन्द का एक भी कतरा
रस की महीन सी धार
कहां उतरी जीवन मेरे
जग के उपाय तुले हैं
विवेकी बनाने
ओर गुजारता हूँ
तमाम उम्र
तर्को के घने बियावन बीच
भीतर हो चुका
तूफानो का मंजार घना
जहां टकराते हैं तर्क
एक दूसरे से
कि स्नेह झील गंदली हो चुकी
जग बनता जाता
सभ्य ओर विवेकी लगातार
खुलते जाते हैं
नित नये तर्क के विद्यालय
ओर भरते जाते नित
नये नये तर्को का अंबार
उलझा हैं मेरा अस्तित्व
विचारों की गाँठो के गुम्फन बीच
भीतर हैं खालीपन
अत्याचार हैं यह
छोड़ दो ना
अब अकेला मुझे
कि भीतर के द्वार खोलू
अपनी श्वास लेने दो
तनिक तो
तर्को की मुर्दा हवा से
घूटता हूँ नित
आने तो दो थोड़ा सा
भोलेपन का नेह
सत्य का द्वार वहीं से
खुलता हैं
खिल उठते हैं नवल कुसुम
देते जाते महक घनी
अलौकिक
वहीं से सत्य आता
दिव्य सा
बन बन जाता हैं प्रार्थना
परमात्मा की
ओर टूटने लग जाते
भवो के बन्धन
अनसीखा ही रहने दो मुझे ।
छगन लाल गर्ग।

Sunday, 22 November 2015

गयात्मक हूँ मैं ।

गयात्मक हूँ मैं
धारणा देखो मुझे
क्यों दिखने लगता हूँ मैं
केवल पदार्थ
क्या ठीक होगा यह
नहीं हैं सत्य यह
हाँ अन्य पदार्थो सा
साँसारिक हूँ मैं
ठीक देखते हो
पर भीतर भीतर
चैतन्यता का
टिमटिमाता हैं दीया
प्रकृति के झंझावतो बीच
डरा सहमा जलता तो हैं
अंधेरो को अपनी
सामर्थ्य सीमा तक
हटाता तो हैं
धारणा सत्य तुम्हारा
टिमटिमाना मेरा
जूगनू सा मात्र
रोशनियो के पूण्ज
नहीं बसते मुझमें
पर रखता हूँ अंश ही सही
उजालो का
सही पहचानो तो मुझे
मेरी टिमटिमाहट भी
एक गति हैं
अंधेरे मिटाने की ओर
क्या यह कम हैं
कि चेतनता का संकेत
देता हूँ
गुजारिस हैं मेरी
देखो मुझे
हृदयहीन जड कहां हूँ मैं
स्वरूप बाहरी हूँ
पदार्थ आभासित
भीतर तह
आत्मसात हुए बिना
पाओगे कैसे
छोडो ग्रंथी पूर्वाग्रह
देखना होगा तुम्हें
पदार्थ समझे बिना ।
छगन लाल गर्ग।

संयमित रश्मिया।

संयमित रश्मि आभा मेरी
मानव हूँ मैं
ससीम दायरा हैं मेरा
निषेध की दशा नहीं
संध्या काल पसरा हुआ
ओर सन्नाटा इसका
घेरे हैं मुझे
पुष्प की खुली खुली
पाखूरी
सिमट रही अपनी पाखूरिया
पर होना होगा
संयमित
जीवन श्वास लेता हैं
विकसता जाता
मेरा संयम
अधिक फैलाव पाता
अंतर्मन की संगीत धारा
उकेरती हैं अनेको राग
तंरगित होते जाते
बजने लगती हैं
भीतरी वीणा
मेरा संयम
फैलाव हैं अन्नंत विराम का
ओर पहुँचना चाहता
संगीत लहरियो के साथ
पवन सुरभित झौको के साथ
सूर्य की असीम रश्मियो का
सहारा लेता
पहुँच पहुँच जाता
अन्नंत के वैभव मंडल मे
ओर पाता जाता
अपना अन्नंत विस्तार
निषेध नहीं हैं मेरा संयम
कि मुरझाया जीए जिन्दगी
पाता यह घनत्व
विस्तार का वैभव
जिसमें खिलते अन्नंत
भावों के सुकुमार पुष्प
झरते पराग कण
कि सुगंधित हो जाता
मेरा भीतरी चित
अनन्त गहराईयो से उठता
निषेध धुआँ बन
विलिन होता जाता
तृप्तियो की कन्दराओ मे
जहाँ अचेतन को विस्तार देता
पाता अपना स्व
कातरता नहीं हैं इसका लक्षण
सृजन का अंकुर फूटा हैं इसमें
जो करता जाता
नित
भावों का विस्तार
ओर गढता हैं सत्य के बिम्ब
हैं यह महा विलक्षण
प्रेम बीज से अंकुरित
प्रस्फूटित हुआ हैं जीवन मेरा।
छगन लाल गर्ग।

Thursday, 19 November 2015

मेरे कपड़े ।

मेरे कपड़े
सिलवाता हूँ
मंजे अनुभवी टेलर से
मजबूरी हैं
नहीं बना पाता
सामान्य टेलर
असामान्य विस्तार पाया
शरीर मेरा
आकृति नहीं दे पाते
कपडो को शरीर ढाँचे मे
शरीर संग गजब हूँ मैं
विशिष्टता लिए
बेकाम लगता
पर बड़ा काम का हूँ
अच्छे अच्छे ढूँढते ही पाते मुझे
छोटे बड़े सभी की
आस्था का केन्द्र हूँ मैं
बेढंगा हूँ बेढंगे काम को
अंजाम देता हूँ
काम औकात देख
दाम लेता हूँ
बूरे वक्त बाबू से लेकर
ऊँचे अफसरान तक
स्तुति करते हैं मेरी
गरजमंदो का भगवान हूँ मैं
श्रृद्धा से भैट चढाते हैं
आम आस्थावान भी
मेरी भी
ऊँचे ओहदेदारो की भी
इस भैट से ही रौनक हैं
जानते हैं आस्थावान
कीमत हमारी
जाने भी दो
अब कहना ठीक नहीं होगा
पर्दे मे रहना मजबूरी हैं
प्रजातंत्र हैं
अभिनय आता हैं
नियत ओर भाषा
अंग अंग बसी हैं
रस पच गयी हैं हमसे
दोनों का भौपू अच्छा बजाते हैं
सामर्थ्य से ज्यादा
जनता मे
सपने ओर क्रांति बीज
हमी तो बौते हैं
तकलीफ यही हैं
विस्तार हुआ हैं हमारा
हमारे बोये बीज
वृक्ष बन रहे हैं
बेढंगेपन का विस्तार
आम की मौत हैं
सुनते हो हमारा दर्द
रहस्यमयी घना हैं
उपाय हो तो बताओ
मानवता को छोडकर
वह डराती हैं हमें ।
छगन लाल गर्ग।

Wednesday, 18 November 2015

आग्रह नहीं मेरा।

आग्रह नही हैं मेरा
तुम्हारी अपनी दुनिया
जिसे जीना चाहते तुम
ओर मेरा आग्रह
तुम्हारे जीने की अडचन बने
नहीं चाहता
अस्मिता तुम्हारी
आबाद रहे
अनाग्रही हूँ मैं
उधर तुम्हारी बुद्धिमता का
कायल भी हूँ
खूब निछोडते हो
स्वार्थ सत्यो का
हर पल की वसूल लेते
कीमत
त्यागी हो
मानवता के
घने पुजारी हो
विवेक के
बहुत बढ़ चुके तुम
आगे
प्रगति तुम्हारी प्रशंसनीय
जटिल हो तुम
तर्क वितर्क का ताना बाना
बडा गुम्फनीय
चक्कर आते हिलता हूँ मैं
अनुकरण भी अकथनीय
जीवन मूल्यों की पुर्नस्थापना मे
बड़े प्रवीण तुम
नये तर्को के पैबन्द
अच्छे लगाते
झुंझारू व्यक्तित्व हैं तुम्हारा
अच्छी कर लेते हो
व्याख्या जीवन की
भरा भरा दिखता
तुम्हारे सुख का किला
साधनों का भीड़ भरा मेला
घेर चुका तुम्हें
बनना चाहता हूँ मैं
तनिक सा
अनाग्रही
कहना तो पडेगा
सुनना तुम्हारी मर्जी हैं
मात्र एक आग्रह
नहीं दूँगा
तुम्हारी अस्मिता पर चौट
भीतर बहता
एक भाव का स्त्रोत
संवेदना की निर्मल धार
जहां स्नेह बहता हैं
अमिट जीवन देय
मत रोको उसे
मत बनाओ तर्को की ऊँची दीवार
बोद्धिकता तुम्हारी
मात्र शब्दों का जंजाल
ढहाओ उसे
बहने दो निर्मल
संवेदना की नेह धार
जीवन धरातल
बुद्धि का रेगिस्तान
मत होने दो
मुक्त करो मानवता
बनने दो मानव को मानव
आग्रह नहीं हैं मेरा
छोडता हूँ विवेक
तुम्हारे ।
छगन लाल गर्ग।


Tuesday, 17 November 2015

अटका हैं मन।

अटका हैं मन
तृष्णा विवर मे
खोजता जाता
रंगिनियो के तार
जो दे सके
हृदय तंत्री मे स्वाद
खुले द्वार अतृप्त वासनाओ के
बेमेल भाव मिले
कहें विगत
खोले पिटारा
वितृष्णाओ का
ओर
होता रहे भाव मिश्रण
अटका हैं मन
सुनहरे पल विगत मे
जहाँ पाया
व्यक्तित्व हीन अस्तित्व
अंहकार विसर्जित जीवन
राग रागिनियो की बहती
सरिताये
लहरों संग भावनाओ ने
गीत गाये
अटका हैं मन
नेह बहे सपनों मे
जहां सुख का दरिया
वेदना ताप जलता
रीता रहा
निष्ठुर दीप विरह के
नित जलते रहे
स्मृति खाती रही
दर्द की दवा
अटका हैं मन
यौवन की मदिरा मे
पीते रहे
स्पर्श रूप ओर रस का
प्याला
ओर जीना हुआ
सुरभि के मादक
वातायन मे
अटका हैं मन
अतीत की पराजय मे
जहां मन हारा थका
शिथिल हुआ
अंहकार तुष्टि मे
पराजित हुआ
अटका हैं मन
सौन्दर्य जंजीर मे
हृदय ने संजोये
हीरक नेह हार
आशक्ति के
जो स्पर्श करने से
टूटे
अटका हैं मन
ओरो के वैभव मे
जहाँ ईर्ष्या की आग
धधकी घनी
करती हृदय का
विरोध
देती रही मस्तिष्क को
गति
वैभव जीने की
अटका हैं मन
शीतल मदहोश
चाँदनी मे
जहां मिलती अतृप्त
भावों को ठंडक
एक विश्रान्त दशा
अर्थ जीवन देती सी
हैसियत आदमी
बताती समझाती सी
कि जीवन अपना
अर्थ पाये।
छगन लाल गर्ग।


Monday, 16 November 2015

कृत्य हूँ मैं ।

हर क्षण व्यस्तता मे सलंग्न
विश्राम विलग कर्मठ व्यक्तित्व
लिए सरकती हैं मेरी जिन्दगी
एक अहसास कर्ता का
हर पल संधर्ष को समर्पित
तपन ताप स्पर्श अनुभूति लेते
बितती जाती हैं  मेरी जिन्दगी
कर्म जाल का निर्मम शिकंजा
घेरता हैं मुझे
होता हैं अहसास
यह जिन्दगी बन चुकी समस्या
पल पल लेने लगता
अपने रूप नये नये
जो होते अजनबी
बिना परिचय
करता जाता हूँ  संघर्ष
कृत्य हूँ मैं
मेरा होना ही
समस्याओ को जन्म देता हैं
कर्मठ बनाती हैं
समस्याऐ मुझे
किनारे का दर्शक नहीं मैं
कि रूका रहू शैल बनकर
आमन्त्रण स्वीकारता
कूदता हूँ
समस्याओ के सागर मे
टकराव हैं मेरा
समस्या की लहरों से
कृत्य हूँ मैं
यह संघर्ष मेरे होने का
मेरे व्यक्तित्व निर्माण का
नहीं हैं नियोजित
स्वयं निर्माता हूँ मैं
अधिकार चाहता हूँ जीवन पर
अधीन रहे
हावी होना हैं हर समस्या पर
प्रयास यही मकसद यही
जिन्दगी का
प्रयासो पर समय का वार
अब घना भारी पाता हूँ
लडते हुए ससीम जीवन
ऊर्जा शिथिल पाता हूँ
लहरों का उन्माद
 अधिक उन्मुक्त हुआ हैं
पर अंहकार बढ़ा हैं
कृत्य हूँ मैं
बड़ी अजीब जीजीविषा
पिघलती देह से बेपरवाह
लालसा का यह बिम्ब
मानव की पहचान का सत्य
बना हैं मेरा जीवन
हे चेतनता देख मुझे
घेर मुझे
विवश हुआ हूँ अब
कहना होगा
अकृत्य हूँ मैं ।
छगन लाल गर्ग।


होता रहेगा ।

होता रहेगा
अरमानो का बिखराव
बिखरी जिन्दगी तले
जो ठौर तलाशती हैं विश्वासो का
विश्वास चाहती हैं जिन्दगी
हम छाया बने अपनों का
जो छिपकते जाते जौक बन
चूसते हैं जिन्दगी
होता रहेगा
अरमानो का बिखराव
विवेक जीते शीर्षस्थो के तले
जो नित देते अकाट्य तर्क
आदर्श व अधिकारो का
कि भावना जीते अबोध
निरीह बन जीने
हो जाते विवश
निर्जीव जिन्दगी
होता रहेगा
अरमानो का बिखराव
कि लेखनी के धनी
ऑख मूदे करते रहेंगे
शास्त्रो का बखान
देते रहेंगे
चान्द तारों को नित नयी उपमाये
कि यथार्थ जीवन होगा
रैगने को विवश
आम आदमी दम घूटता
जीता रहेगा
मौत झेलती जिन्दगी
होता रहेगा
अरमानो का बिखराव
कि विश्वास ढूँढता
सरल मानव
खाता जायेगा नित नयी
अनजानी ठोकरे
विश्वासो की
कि भाव जगत होता रहेगा
विरान हताश
तलाशता मानव की जिन्दगी
स्वार्थों की बहती नदी
लेती जाती बाढ़ का आकार
तबाही कगार खड़ी
मानवता
बान्धना होगा इस नदी पर
पूल नया मानवीय इंजीनियरों को
विश्वासो का
कि अरमान पूरे अहसास पाये
भूली भटकी मानवता
मन चाही मंजिल पाये
यह जिन्दगी ।
छगन लाल गर्ग।


Saturday, 14 November 2015

अन्वेषण हुआ ।

निकलता जाता
अथाह भ्रम सागर से उठाता हुआ सिर
भीतर की ओर
जहां कई अपरिचित भावों के चेहरे
कुंडली मारे जमा हैं
आकार विमोह करते
कुछ लुभाते बुलाते से
अधिकांश भय देते
अपरिचित हूँ
दबदबा इनका जीवन पर
चलते चलाते हैं मुझे
बिना अपनत्व सरकता हैं
ढलान की ओर
जीवन मेरा
प्रज्ञा की रश्मिया किनारा करती
चुप रहती सरकती जाती
विपरीत दिशा
तृष्णा का विकृत चेहरा
झंकझोरता मुझे
ओर ले चलता विकल्पो की तलाश
मृग तृष्णा बिहड विरान
शून्य बन टकराता जाता
कठोर शैल
बिखर बिखर जाता
 अस्तित्व  का पुलिन्दा
गदराई मोहक आकाक्षा संकेत करती
इठलाती रस देती वाणी स्वर
फिर फिर बुलाती
भ्रमित अस्तित्व मोहिनी मंत्र फसा
गिरता जाता फिर गर्त नये
पहचान प्रवृत्ति स्वप्नवत जीता
क्षण भंगुर जीवन
अन्वेषण भीतर का
बहुत कसक भरा निरर्थक
सार विलग हुआ अतीत
सत्य असत्य बीच का अन्वेषण
मेरे जीवन
अंततः अनजाना रहा हैं
प्रयास ही शब्द का अर्थ हैं ।
छगन लाल गर्ग।



मेरा कब रहा।

नहीं पाया आज तक
पूर्णता का अहसास
खालीपन जडता का
खोखला हूँ वृक्ष
टहनी ओर पत्तों का हरापन
बनावट की आभा
यान्त्रिक खरीदी हुई
हृदय सागर उथला शुष्क
चटखती मिट्टी की घनी दरारे
विभक्त करती जाती
नित प्रखर भाव तपन विखण्डित
हृदय मेरा
अतृप्ति का सुखा सागर
भ्रमित विवेक तलाशता जाता
रस जीवन
नव ऊर्जा प्रकृति दान
प्रातः ताजगी रश्मि लेता हुआ
पाना चाहता हूँ संचय सुख रस
ओर जीने लगा
तृष्णा पूर्ति जीवन
हो तल्लीन
होता जाता शुभ अशुभ के पार
पाप पुण्य के पार
मुक्त हुआ  शास्वत जीवन
दोहराता हूँ एक ही भाषा
हो घने संचित सुख मेरे
यान्त्रिक सुख
वितृष्णा का क्षणिक भराव
बार बार रीता भरता
पर संचित डराता हैं अब
निरंतर घूरता जाता
उसका बदलाव
भीतर वेदना देता हैं
सत्य मुखरित हुआ
कहता रहता
सुनो
संचित न भूत न भविष्य
 न ही वर्तमान
असल पाया कहां
संचित कब रहा
तुम्हारा।
छगन लाल गर्ग।





Friday, 13 November 2015

अवगुण्ठित हो सत्य ।

अवगुण्ठित ही रखता
सत्य तुझे
तभी पाता व्यक्तित्व पहचान
प्रबुद्ध मनुष्य बनता
सत्य छिपाये
दिखता हूँ सीधा सपाट
बाहर बाहर
बहुत सरल समझदार
भीतर के मतलबी सत्यो का जंजाल
बाहर नहीं लाता
संयमी बन जाता
तपस्वी सा
भीतरी आपा रोकता हूँ
मजबूती से
तभी गुम जाता
मेरा असलीपन
होता रहता
सौम्य ओर सुशील
दिखता हूँ सीधा सपाट
समझदार
बेहतरीन जी लेता हूँ
जिन्दगी दोहरी
छाया मेरी पीछे चलती हैं
सूर्य रखता हूँ सामने
दिखने लगता हूँ साफ साफ
ओरो के प्रकाश का होता सहारा
ओर सूर्य रश्मिया हारती जाती
भीतरी सत्य जाने बिना
मुझे ओर निखारती
करती अस्तित्व मेरा उज्ज्वल
छाया सूक्ष्म का
सत्य हारता
पीछे छोडता व्यक्तित्व
छाया
सुनो सत्य तुझे रोकता मैं
सूर्य का प्रकट सत्य मेरा
भीतर सूक्ष्म छाया मात्र
बाहरी बिम्ब निखरा सत्य
जो मैं प्रकट करता
मूल सत्य
कहां देखती दुनिया
रोशनी रहते भी
सूर्य ओर छाया मेरी
दोनों सत्य हैं
सूर्य को पीठ दिये
कभी चलता हूँ
तभी असलियत पाता
जिन्दगी तेरी
छाया सूक्ष्म बनी आती हैं आगे
दीदार होते ही
ठावस पाता हूँ
दिखता जाता
जीवन नद का किनारा
ओर बन जीता जाता
आदमी ।
छगन लाल गर्ग।

Monday, 9 November 2015

अब नहीं होता ।

अब नहीं होता
फिसलते अरमानो का बहाव
नहीं होते सपने ऊँचाईयो मे गुम
आकाक्षाऐ एकाकार हुई अस्तित्व लीन
नहीं मिलते अरमानो के पद चिन्ह
कि कभी जीवन धरातल मे रखें हो कदम
अब जीवन होने का अर्थ हैं खोया खोया
गुमनाम होता सम्पूर्ण व्यक्तित्व घनी भीड़ बीच
व्यक्तित्व का हर पल खोया सा
जीता जाता अपना सत्य
जिसका निर्माता रहा वह खुद
ओर यह सत्य अजीब सुनहरी रंगिनियो मे भ्रमित सा
ढूँढता नित अपना बिम्ब
जिसे पाते पाते सरकती जाती खामोश जिन्दगी
बिना कुछ पाये बिना सत्य पहचाने
हाथ रीते ही अहसास पाता स्वयं भरा भरा
मोह मादक संसार का साक्षी
फिसलता मृगतृष्णा के भंवर तले
विलय पाता स्वयं अंश बन वासना के राग मे
चेतन तत्व विकल हो बार बार ढूँढता किनारा
जीवन का
अब नहीं होता कि जताऊ अपना विशिष्ट प्रकार
जमाने का सत्य खुला खुला आतुर बताने को
कि लो जागता जीवन मेरा
जहाँ नहीं भावनाओं का ठहराव
अंतहीन दौड़ का अभ्यास करता
कि पा पा जाऊँ
सम्पूर्ण सुख सौन्दर्य का पारावार
कडवा यथार्थ बना जीवन
बेचता हैं भाव
ओर बिकता जाता व्यक्तित्व
घने बाजार की चौन्धिया रोशनी मे
चलता जाता सुख लेन देन का व्यापार
यह काम चलाऊ तो हैं इसे सुख ही कहती दुनिया
अब नहीं होता
मन की भावनाओं का संसार बिके
ओछी मानवता से परहेज करता जाता मन
सुख खरीदने निमित
सामर्थ्य सीमा के अंतिम छोर तक
अब नहीं होता
भीतर के नेह का रूदन शास्वत
कि नेह हो राधा कि मीरा का
स्नेह के शास्वत पलो की कद्र
दफन हुई ताजमहल की नीव तले
आज का नेह कंगूरा बना ऊँचाई कहता हैं अपनी
यह वेदना की कसक सभ्य बन विकास पाई हैं
वेदना का इन्तजाम आधुनिक हैं
अतिशय बाजारू
सुख की ललक दौडता हाफता
शैतान की सारी प्रतिभा लिए
अंतर रहा पर तनिक अदृश्य रहा
मानव ओर शैतान बीच
केवल संवेदना ओर रूदन की शाश्वता का
जिसे पहचान परख जीना ही
सत्य जीना हैं ।
छगन लाल गर्ग ।

अपनों की छाँव ।

मन करता हैं
अंतराल बीच कटता जीवन
कभी कभी विगत भटकता हैं
ओर चाहता अपनों की छाँव
जहाँ जीवन खेला था नित नयी अठखेलिया
अपनों के साथ घनी आत्मीयता लिए
स्वार्थ का बवंडर अंधी बाढ़ लिए
निश्छल स्नेह सरिता को गंदला कर बहा
भयानक विध्वंस लिए
कठोर निर्मम चित अडे रहे विध्वंस बीच
नदी के द्वीप की तरह
बने रहे अडिग देखते गर्व भरे
कोमल गात वृक्षों कच्ची दीवारों बने घरों को बहाते
आनन्द प्रभुता के मद मे इतराये से
जो कि कभी रहे हिमायती
वर्चस्व मोह सम्पत्ति एकाधिकार स्वार्थ मे
खुद धक्का देते
धकेला दोनों हाथों से
बहती विनाश धारा मे
उस विध्वंस धारा का बचा अवशेष हूँ मैं
जिसने पड़ाव पा बनाया नया नीड आशा का
विश्वास संग श्रृद्धा का नेह निर्माण का
संचित स्नेह अब गहराया हैं
ओर चाहने लगा हैं बार बार
दुखद विगत पलो की वापसी
जहाँ संबंधों की ज्वाला स्वार्थ अग्नि जली
रक्त संबंध तार तार हो बिखरे जले
समय की परते लाख ढके
उभर उभर टीस कसक देते
फिर भी
यह मन भटकता हैं
पाना चाहता फिर फिर अपनों की छाँव ।
छगन लाल गर्ग।

Saturday, 7 November 2015

नहीं भाता संगीत ।

नहीं भाता संगीत
बजता हुआ रेडियो की संगीत धुने
उभरते स्वर धक्का देते सम्पूर्ण चित
अचकचाये सुनना नियति मेरी
लगता तौड फौड देंगे भीतरी राग
जो चित भरी निर्मल नेह झील गहरी
जहाँ खिलते नित सपनों के कुसुम
नित नया सौन्दर्य लिए
पराग कण केसर संग विचरते सम्पूर्ण अस्तित्व
मिट मिट जाते दबे से दमित राग भाव सारे
यह संगीत राग उथला घना बेचैनी भरा
वह राग हैं कहां
जोडता जीवन के सुर
दर्शन जीवन बना जीता जागता संगीत राग
अब वह नहीं रहा
यादों की खाई मे सोया पडा हैं
वक्त की रफ्तार ने दबोचा हैं उसे
मिटते अरमानो की तरह
अब संगीत भी घनी भीड़ सा
ऊहापोह भरा जीवन जीता
विकल हुआ सा विवश हूँ संगीत झेल जीने को
ओर यह भीतरी चित तन्हाई की अनुभूति पाता
लिपटना चाहता खोये सुरों से
जिसमें राग मेरा रहा जीवन मेरा रहा
इस अंधी दौड़ का गुजरा वक्त हूँ मैं
जिसे मुँह उठाने की इजाजत नहीं
मात्र विस्मृतियो की घनी कालिमा मे
मौन साधे सोते रहने की इजाजत हैं
यान्त्रिक मानव का यह युग
जो मात्र तन सार जीता हैं
 नाम बदलाव चाहे युग मनुष्य का
शायद अंतिम दौर मानव रहने का
फिर तो रौबर्ट बने जीना ही
आज के युग का सत्य हैं ।
छगन लाल गर्ग।










अब सोने दो।

अब सोने दो इन्हें
शिथिल रूग्ण तन घना
चौट मस्तिष्क खाया
प्राण रोते होंगे
टकटकी बान्धे भीतर निहारने दो
रूदन यह अदृश्य प्रकृति बीच
पवन सा अचेतन घेरता हैं
घिर घिर घना हो जाने दो
भ्रम अंबार भाव भीगता हमारा
पल संवेदना राग उभरे
भीतरी पावन भावों से निखरने दो
निखरा रूप भीतरी आद्रता हैं
यह पावन दरिया भीतर रहने दो
मानव अस्तित्व का का यह दीप
अपनी रोशनी टिमटिमाने दो
विकारहीन पावनता लिए अस्तित्व
खुली ऑखो से निकलने दो
लो दृश्य चेतना मे जीओ
जीवन नद पहुँचा मुहाने
खटके आत्मा खटकने दो
चाहत जीए दुनिया
अछूती जीए तो जीने दो
प्रार्थना स्वर पीघले अदृश्य हुए
प्रातः सौन्दर्य नहीं ध्वनि राग
सोती हैं सामर्थ्य सीमा सोने दो
यात्रा पूरी दोष प्रतिकार मत कहो
हमारी हैं दशा सारी
ओरो की मत कहो
ईश्वरीय गणित हैं यह
मस्तिष्क गूम्फन भंवर सा
व्याख्या रहने दो
रूदन रागिनी समाया हृदय मेरा
विकसित चेतन अंकुर फूटता
चेतन राग अबोध सा बहने  दो
मौन मुखर एकाग्र हैं चित
लीन हुआ महाविलय
निश्छल राग बनी प्रार्थना
दुआओ का भीतरी काफिला चेतन हैं
अदृश्य शक्ति संग सरकता सरकने दो।
छगन लाल गर्ग।



Friday, 6 November 2015

घर तो वहीं हैं ।

घर तो वही हैं वैसा का वैसा
अंतर ढूँढे मिलता नही
न दीवारे बदली न दरवाजा
चिर स्थापित
वहीं साजो सामान पहचाना पहचाना
नीम के वृक्ष छाया देते आते जातो को
घर के सामने जाती सड़क पर जाते हुए लोग
आते हुए लोग पल भर रुकते छाया तले
हाल चाल पूँछ आगे बढ़ते
ठीक वहीं वहीं जो भोगा कभी
अंतर केवल यह
कि अब घर भीतर का प्रवेश वर्जित हुआ हैं
ऑगन मे खाट पर मुडा बिस्तर
सूत डोरी से बुनी ढीली ढाली खटिया
शून्य ताकता मित्र का चेहरा देखता हूँ
गहन काली उदासियो का अंबार चेहरे को ढके हैं
उठने की कोशिश मे
देखा मैंने बल नकारा होते
कई दिनों से बीमार अचकचाये जीते हैं
पैशन का पैसा घर चलाता हैं
बीमारी झैलना ही नियति हैं
बच्चे शादीशुदा बेरोजगार हैं
ठंडी आह के अतिरिक्त मित्र मैं तुम्हे क्या दू
संवेदना देना भी वेदना ही हैं ।
छगन लाल गर्ग।




द्वार खोलो।

अंतर मेरे हारा थका
वापसी चाहता हूँ तेरे भीतर
अलगाव अन्तराल अब विलुप्त हुआ
पहुँचा तेरे द्वार जिसे छोड़ा कभी
तुम्हारी पुकार बार बार वापसी की
सुनी अनसुनी बार बार करता रहा
जीवन के उतराफाल्गुनी नक्षत्र आने तक
मैं ही हूँ अजनबी मत बनो
खोलो खटखटाता हूँ द्वार तेरे
भीचे भीचे लगते द्वार मुझे अब तेरे
जैसे युगों से मेरी चेतना के द्वार बंद हो
अब खड़ा हूँ मेरे चेतन के भीतर
अजनबी मेहमान की तरह पहचान खोये
सुनते हो आवाज मेरी जो कभी तेरी ही रही
आस बान्धे पुकारता हूँ चेतन मेरे
कि आवाज पहुँचे घुल मिल जाय भीतर तक
सामर्थ्य की सम्पूर्ण क्षमता लिए
क्रिया का समूचा बल लिए देता हूँ आवाज
कि बंद कपाट खुले चेतन जाग रश्मिया बिखरे
घने अंधकार का आदी जीवन मेरा
रसा बसा क्षणिक सुखो के काल्पनिक मोहपाश मे
भ्रामक रस सागर मे इतराया मदमार रहा
ओर टिमटिमाता रश्मि कतरा कल्पना के तिमिर भी
पर मैं हर बार बंद ऑखो परहेज करता रहा तुझसे
कभी ऑख खोले चाहा भी कि भीतरी कालिमा का आवेग
मेरे समूचे अस्तित्व को बहा ले चला अपनी गति
ओर यह अंधेरा निर्मल कोरे चित को दागित कर जीता रहा बार बार
वितृष्णा का हल्का सा तिनका अंधेरे चित टकराया कभी
यह चेतन दशा केवल आधी अधूरी रही
वासना झंझावत चेतन डूबा रहा गहन अंधेरे की कंद्राओ बीच
जहां डूबना मानव नियति हैं
मन प्राण जख्म पाये लौटा हूँ मेरे चेतन
क्या द्वार खोलोगे मना मत कर देना
अस्तित्व रहा कहां केवल विसर्जन चाहता हूँ
द्वार खोलो न अब यह देरी वेदना कसक बढाती हैं
सुनता हूँ बहुत दूर मंदिर के घंटों के स्वर घने हुए हैं
वातावरण एकरस एकलय एक राग हुआ हैं
प्रार्थना के स्वर भीतर से गूँज देते सृष्टि समाते हैं
विस्मृत हुआ हूँ मैं चेतन
क्या तुम ही हो।
छगन लाल गर्ग।

Wednesday, 4 November 2015

आवाज उभरी हैं ।

आवाज उभरी हैं
अंतर की चेतना भटकते प्रश्न पालती हैं
जो निरूतर रहे भटकते घने वीवर
हर चित टकराये ओर जख्मी हुए हैं
सारहीन धूमिल अंधेरो की परत परत के दबे थके
ओर यह चेतना थकी पर मिटी कहां
रह रह उभरते घने प्रश्न विकल करते
यह देह ओर चेतन प्राण का दृष्टव्य बिम्ब
चलायमान सा गतिमान सा भरता फूलता
अस्तित्व ओर मेरा व्यक्तित्व
कि मैं हूँ
एक दृढ़ता यह भी कि मेरा हैं
यह तन यह मन यह जीवन सब मुझमें अन्तर्लीन
होता हुआ सा जीता हूँ मैं
पर यह जीना तब भार बनता
जब प्रश्न उठता वहीं जो हैं अभी
निरूतर असीम हुआ सा
कि मेरा सब कुछ कहना
मेरे सम्पूर्ण अस्तित्व सहित
क्या कभी रहा मेरा
मेरी सामर्थ्य तले जीना हुआ साकार कभी
मेरा होना रहा हैं कि रहेगा
प्रश्न हैं पर जटिल नहीं
विवेक हमारा बहुत जटिल
चाह का अतिरंजन सुख राह जोहता यह जीवन
जानता बूझता पर मानता कहां
घनेरे जजबातो बीच दब दब जाता सत्य
अंधेरे के घने विवर मे
फिर फिर भटकने को आतुर
यह मन यह देह ओर अनगिनत सपनों का
अंतहीन रंगीन जज्बा
क्या हो इसका प्रश्न केवल यही ओर यही
जो हैं अनुतरित
जिसका उतर जानते भी
देना नहीं चाहते हम
विवशता हैं हमारी।
छगन लाल गर्ग।

Tuesday, 3 November 2015

पल काटता हैं ।

पल काटता हैं भीतर भीतर
उभरता एक अनचाहा दर्द
बिम्ब बनकर धुआँ सा
मस्तिष्क हो जाता असमर्थ
तनाव से भरा भरा
दर्द यह अजनबी सा घना हैं
अपने प्रभाव मेरे अस्तित्व को
फिर फिर जोडता हैं
ओर उतरने लगता चित मे
दर्द नीर दरिया
वेग प्रखर हिलोरे प्रचण्ड अनन्त
दिल छोर छुती हुई बाढ़ सी विनाशक
ओर टुटता जाता मेरा अस्तित्व
मूक विवश निहारता हूँ पल तुझे
वाणी ऐसी बनी कहां कि समझा पाऊ तुझे
फक्त देखते रहना खामोशी से
कातर नैनो से वक्त तेरा अंश झेलना
मेरी मजबूरी हैं
ओर देखे पाता हूँ
कि मेरी इस हृदय हारक खामोशी का
पात्र केवल मैं नहीं
ओर भी हैं
जो भोगते इस त्रासदी का दर्द
एक रिश्ता बनता हैं
चाहे खामोशी उनकी
नया रूप बनाये आई हो
पर दर्द वहीं पल वहीं खामोशी वहीं
ठीक वहीं
खामोशी तुम मुझे छल नहीं सकती
वहीं हो तुम जानी पहचानी हुई।
छगन लाल गर्ग।

असमझ ही हैं यह।

असमझ ही कहूँ इसे
विकल दशा का अभ्यस्त हूँ घना
कशीश तौडती हैं भीतर ही भीतर
छटपटाहट रह रह कर अंकुरित होने का चाहती सुराख
कि कहीं बहाव हो
समतल जमीन मिले कि बहु विरल उफान नहीं मंथर मंथर तल
आद्र हो पाये निर्मल रस से
ओर सोखे मुझे अस्तित्व लेकर
यह धरा
कुछ नया जन्मे अंकुर ले
पल्ल्वित हुआ सा इठलाये मादक सुगंध लिए
कि फैल फैल जाए चारों दिशा
नव कुसुम सी सुगंधित पवन
मेरे संचित अनुभव लिए बहे
हवा से निखरे समा
जहाँ तमाम दर्द इकजाई हुए भरे झोली मेरी
ओर मैं बहु तपन का सार लिए जीऊ
यह वेदना जीवन नहीं भाव हैं प्राण हैं
जिसमें शक्ति भरी ब्रह्माण्ड संरचना की
पारमार्थिक शात्विक जीवन दायी
गहराई अनन्त हैं इस पीर पाये जीवन की
शब्दों की औकात थकी थकी
निरस विवश होती जीवन समेट पाये
सृजक मेरे
अभ्यास के अवसर तक सिमटा जीवन हमारा
अन्यथा हमारे सृजन सपने अधूरे अधूरे जीते कैसे
शब्दों का यह चमत्कार मात्र
बिना विकल दशा के बोझ ही होता
जिसे हम अनवरत डूबे बिना ढोते हैं
ढोते जाते हैं ।
छगन लाल गर्ग।



Monday, 2 November 2015

कवि तुम ना होते।

असल शब्दों की घनी बहुतेरी परतो मे हैं
अब कितनी उघाडे श्रम व्यर्थ हैं
इतने ढेर लगते परतो के
कि सत्य तो दूर कल्पना तक ढकती जाती घनी परतो बीच
विभिन्न आकार विभिन्न रंग रूप लिए सतरंगी दुनिया का भव्य स्वर्ग
इन परतो का मोहक अन्दाज अदाये आकर्षण
कोमल कमनीय कामनाओ का कंचन बना पारावार
उघाडते उघाडते मोहक अदाओ की भूल भूलैया के भंवर मे फसा
इठलाता झूमता मदमार मदमस्त होता विस्मृत भूला भूला सा
एक एक उघडी परत का गीत गाता मादकता भरा
ओर तृष्णा के बियाबन की हर ठौर भटकने का भ्रामक सुख चेतना देता
परते प्याज के छिलको सी बेतरबीन होती
ठीक वैसा वेसा मैं भी आकार प्रकार से निहारता ओर लेता रस
कुछ खटा कुछ तीखा ओर कभी कभी बेस्वाद पाता
कल्पना भावना मीठास अहसास सौन्दर्य कोमल कमनीयता अब क्या कहूँ
कवि सुझाये सारे नाम प्यारी सी परतो को अर्पित करता
सब स्वाद चखा चखाया सुख का अहसास करता
केवल एक टीस रहती परते जिन्दगी खूब देखी तेरी
हर एक छिलका भोगा भाया
पर भीतर पाया तो नही तलाश  पूरी उम्र गयी
शब्दों ओर सौन्दर्य मोहपाश का भंवर जाल
रहा फसा वहीं  कोशिश असल की भूला भूला सा
मेरे कवि राग देते रहे तुम मेरी चेतना मे
सौन्दर्य खनक मोह माया का जिसमें रमते हो तुम
कल्पना के अंत हीन सागर मे
इस सागर की मात्र एक बूँद चखी मैंने
कि विस्मृत हुआ हूँ सत्य से असल से
कवि मेरे कहना पडेगा कल्पना सागर मे डूबना सिखाया तुमने
अन्यथा सत्य असल ढूँढ ही लेता
कास मेरे कवि तुम ना होते।
छगन लाल गर्ग।



Sunday, 1 November 2015

कहता रहूँगा ।

कहता रहूँगा
बिना ताजगी जर्जर मन तन लिए
चिर सत्य
समय की धार काटती नही
अशक्त रह जाती
कटे कहां सत्य
फिर फिर नये नये रूपों मे
घेरते जाते समूचा व्यक्तित्व मेरा
उम्र कहां रही की सत्य पछाडू
जैसे कि आज होता हैं
सत्य पछाडे जातेहैं झूठ के बल
यह कैसे होगा सामर्थ्य कहां इतना मेरा
कैसे हो विजेता होने का दावा
नये शब्दों के अवतार के साथ
बोलता हूँ शब्दों को
जो कई बार जुबान घसीटे गये हैं मेरे
ओर औरो के द्वारा भी
ताजगी कहां रह गयी मेरी तरह
शब्द ओर उसका प्रभाव समझे
कि उम्र गुजरती सी हैं
ताजी मुट्ठी भर हवा को तरसती
सरकती फिसलती रैगती जिन्दगी मेरी
हकीकत हूँ मैं समय की मार का
एक निछोडे निम्बू सा सत्य
कीमत हीन फिर भी खटास देता हूँ
सत्य की
कि किसी के नेह देह रूपी बर्तन मझे
चमके ओर निखर निखर जाय
पावन सार्थक मनुष्य बने
जग रोशन करे।
छगन लाल गर्ग।