नहीं हूँ ख्यात
अभी नयापन भी ओर नौसिखियापन
डरता हूँ अभिव्यक्ति देने से
प्रयास मे ही पडते हैं हथोडे
भावनाओं पर
ओर चौट खाती जाती अभिव्यक्ति
बिना पहचान
अभिव्यक्ति की गुणवत्ता के
बदल जाते हैं मापदंड
निरर्थक हो जाती सत्यता भी
अनुभूति की
यह एकाधिकार सृजको का
देता जाता दंश
ओर नहीं हो पाते
चौटिल अस्तित्व के भीतरी भाव
अभिव्यक्त
जब तक की नामचीन सृजक
नही
हजारों यथार्थ देती आहे
तौडती हैं दम
बिना अभिव्यक्त हुए
मेरी तरह
सामान्य व्यक्ति का दर्द
अभिव्यक्ति देने का हकदार नहीं
उनकी अभिव्यक्ति का सत्य
सत्य नहीं
नक्कार खाने की तूती
नकारा आवाज करती
परिपक्वता न सही
सत्य तो हैं
अब सुनना इसका
अपनी अस्मिता का सौदा हैं
हमारी आहो का दर्द
सामान्य कैसे
असामान्य सृजक हम
हमारी आहे काबिल हैं
अभिव्यक्ति की हकदार भी
बौने व्यक्ति का अनुभव
ओर अभिव्यक्ति
समझ मे नहीं आती
हम हैं ना परिपक्व
अर्से से इनकी आहो की
अभिव्यक्ति तो करते हैं
यही तो हैं सत्य
इनकी आहो के दम पर बनती
हमारी आहे
अन्यथा हमें कहां पहचान
क्या होते हैं दर्द
अभिव्यक्ति का हक हमारा
हमारे पास हैं तरकीबे
भावों के अनुरूप
सजाते हैं पोस्टर
उभारते हैं भाव
कविता का क्या
देती रहेगी भाव
पोस्टर के सहारे
नामचीनो की यही तो खासियत
अब ये नोसिखिए
अरे भाई हम हैं
कर लेंगे
कविता वविता
पहले पाठक बनो हमारे
वैसे ही आजकल
पाठक मिलते नहीं
तुम मत घिसो शब्दों को
हम हैं ।
छगन लाल गर्ग।
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