Sunday, 20 December 2015

भीतरी धुऑ।

 कचोटता कथन
सुसंस्कृत की अभिव्यक्ति
नहीं बनता
गरिमा व्यक्तित्व दोनों
खंडित करता हैं
ओर इसी संयम मे
यथार्थ अनदेखा किये
हमारी सभ्यता
विस्तार पाती हैं
पर यह विस्तार
क्या दमन का दूसरा
अकथनीय
भीतरी विस्तार लेता
दानव नहीं
जो मानवता का शोषण करता
फलता फूलता
सभ्य संस्कृत बना
वैभव जीता हैं
प्रश्न विषमता का
मूल बना
हमारे प्रबुद्धो को
मंथन शायद दे
प्रजातंत्र का यह सोच
ओर आम आदमी का
रेगता सरकता जीवन
जहां दिखता रहता
जीने की कसमकस मे
भीतरी अरमानो का
सुलगता जलता सा धुऑ
असंख्य नौकरी की तलाश मे
भटकते हमारे युवा
रोटी की जुगाड मे
काम ढूंढता मजदूर
ओर पाले की मार मरती फसले
खाद की मंहगाई झेलते किसान
व्यवस्था का कहीं कोई
न इरादा न इन्तजाम
क्या हो
चुनावी समय होता
शायद कुछ घोषणाओ की किस्त
मे टुकड़ों का बँटवारा होता
हैं तो बहुत अशोभनीय
पर यथार्थ भी
शायद वैभव के इरादों मे
हमदर्दी पनपे ।
छगन लाल गर्ग।



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